राग माली गउड़ा
अपराह्न का राग, पुष्प-गन्ध का।
माली गौड़ा पुष्पों से जुड़ा राग है, अपराह्न के झुकाव का। नाम "माली" (फूल-वाला) से आया, और स्वर में एक तरह की सुगन्ध-सी मिठास है।
ग्रंथ में माली गौड़ा की रचनाएँ कम हैं, मगर हर एक में एक हल्की उत्सव-भावना झलकती है।
"रे मन टहल हरि सुख सार ॥" माली गउड़ा M5
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 4 (5)
महला 5 (8)
- छका 1 ॥अंग 986
- राम नाम कउ नमसकार ॥अंग 986
- ऐसो सहाई हरि को नाम ॥अंग 986
- इही हमारै सफल काज ॥अंग 987
- सभ कै संगी नाही दूरि ॥अंग 987
- हरि समरथ की सरना ॥अंग 987
- प्रभ समरथ देव अपार ॥अंग 988
- मनि तनि बसि रहे गोपाल ॥अंग 988