रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: माली गउड़ा महला 4॥ हे भाई ! जिन सारे सिद्धों ने। साधिकों ने। मुनियों ने अपने मन में (गुरू चरणों में) श्रद्धा बना के परमात्मा का ध्यान धरा। गुरू ने उनको वह अलख हरी उस अपरंपर पारब्रहम स्वामी (अंदर बसता) दिखा दिया। 1। रहाउ। हे भाई ! हम जीव नीचे और हल्के मेल के काम ही करते रहते हैं। कभी प्रभू-पातशाह का सिमरन नहीं करते। परमात्मा ने जिसको गुरू ला के मिला दिया। गुरू ने उसको एक छिन में माया के बँधनों से निजात दिला दी। 1। हे भाई ! प्रभू ने जिस मनुष्य के माथे पर (गुरू मिलाप का) लेख लिख दिया। उसने गुरू की मति ले के परमात्मा में सुरति जोड़ ली; जिस परमात्मा की हजूरी में हर वक्त (मानो) पाँचों किस्मों के साजों के राग हो रहे हैं (गुरू की कृपा से) उस मनुष्य को वह परमात्मा मिल गया। वह मनुष्य सदा सिफत-सालाह के गीत ही गाता रहता है। 2। हे भाई ! परमात्मा का नाम विकारियों को भी पवित्र करने वाला है। पर बद्-किस्मत लोगों को हरी-नाम प्यारा नहीं लगता। जैसे नमक पानी में पड़ा हुआ गल जाता है। वैसे ही वह (अभागे) लोग (नाम-हीन रह के) अनेकों जूनियों में गलाए जाते हैं। 3। हे दास नानक ! (कह-) हे हरी ! हे अपहुँच प्रभू ! हे ठाकुर ! मुझे ऐसी मति दे कि मैं गुरू के चरणों में अपना मन जोड़े रखूँ। (गुरू की कृपा से) मैं हरी-नाम में ही जुड़ा रहूँ। मैं हरी नाम में ही लीन रहूँ। 4। 3।
माली गउड़ा महला 4 ॥ मेरा मनु राम नामि रसि लागा ॥ कमल प्रगासु भइआ गुरु पाइआ हरि जपिओ भ्रमु भउ भागा ॥1॥ रहाउ ॥ भै भाइ भगति लागो मेरा हीअरा मनु सोइओ गुरमति जागा ॥ किलबिख खीन भए सांति आई हरि उर धारिओ वडभागा ॥1॥ मनमुखु रंगु कसुंभु है कचूआ जिउ कुसम चारि दिन चागा ॥ खिन महि बिनसि जाइ परतापै डंडु धरम राइ का लागा ॥2॥ सतसंगति प्रीति साध अति गूड़ी जिउ रंगु मजीठ बहु लागा ॥ काइआ कापरु चीर बहु फारे हरि रंगु न लहै सभागा ॥3॥ हरि चार्हिओ रंगु मिलै गुरु सोभा हरि रंगि चलूलै रांगा ॥ जन नानकु तिन के चरन पखारै जो हरि चरनी जनु लागा ॥4॥4॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: माली गउड़ा महला 4॥ मेरा मन प्रभू के नाम में जुड़ा रहता है हरि-नाम के स्वाद में मगन रहता है; हे भाई ! जबसे (मुझे) गुरू मिला है मेरे (हृदय-) कमल फूल का खिलाव हो गया है। मैं परमात्मा का नाम जप रहा हूँ। और (मेरे अंदर से) हरेक किस्म की भटकना हरेक किस्म का डर दूर हो गया है। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू की मति की बरकति से मेरा सोया हुआ मन जाग उठा है। मेरा हृदय अदब से। प्रेम से प्रभू की भक्ति में लगा रहता है। बहुत बड़े भाग्यों से मैंने परमात्मा को अपने अंदर बसा लिया है। अब मेरे सारे पाप नाश हो गए हैं और मेरे अंदर ठंडक बरत रही है। 1। हे भाई ! जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है। वह कच्चे रंग वाला कुसंभ (का फूल) ही है। कुसंभ के फूल का रंग चार दिन ही चटख रहता है। (उसके अंदर से) सुख एक छिन में ही नाश हो जाता है। वह (सदा) दुखी रहता है। सिर पर धर्मराज का डंडा कायम रहता है। 2। हे भाई ! साध-संगति में रह कर गुरू (के चरणों) से बहुत गाढ़ा प्यार बनता है (वह प्यार इस प्रकार ही पक्का होता है) जैसे मजीठ का रंग बहुत पक्का होता है। (मजीठ से रंगे हुए) कपड़े फट चाहे जाएं (पर रंग नहीं उतरता)। शरीर-कपड़ा नाश चाहे हो जाए। पर इसका हरी-नाम वाला भाग्यशाली रंग नहीं उतरता। 3। हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू मिल जाता है। गुरू उसको परमात्मा का नाम-रंग चढ़ा देता है। वह मनुष्य हरी-नाम के गाढ़े रंग में रंगा रहता है (लोक-परलोक में वह) शोभा (कमाता है)। जो जो सेवक-भगत परमात्मा के चरणों में जुड़ा रहता है। दास नानक उनके चरण धोता है। 4। 4।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: माली गउड़ा महला 4॥ हे मेरे मन ! जगत के पालनहार प्रभू का नाम सदा जपा कर। (हे भाई ! नाम जपने की बरकति से ही) मेरा मन मेरा तन (भाव। सारी ज्ञानेन्द्रियां) परमात्मा के नाम में ही लीन रहती हैं। मेरी मति गुरू की मति में लीन हो गई है। परमात्मा मुझे सारे रसों का खजाना दिखाई दे रहा है। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू की मति ले के परमात्मा का नाम सदा सिमरना चाहिए। मन में हरी का जाप जपना चाहिए। जगत का मालिक प्रभू उन लोगों को (ही) मिलता है जिनके माथे पर ये लेख लिखा होता है। 1। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम जपा। उनके सारे मायावी बँधन समाप्त हो गए। (आत्मिक) मौत उनके नजदीक नहीं फटकती। गुरू ने उनको बचा लिया। परमात्मा (स्वयं उनका) रखवाला बना। 2। हे भाई ! हम जीव तो बच्चे हैं (हम अपना हानि-लाभ) कुछ नहीं समझते; पर परमात्मा माता-पिता की तरह हमारी पालना करने वाला है। (बच्चे सदा आग में हाथ डालते हैं। पर माता-पिता बचाते हैं) हम माया की आग में हाथ डालते रहते हैं (मन फसाते रहते हैं)। पर दीनों पर दया करने वाले गुरू ने सदा हमारी रक्षा की है। 3। (हे भाई ! परमात्मा के नाम से) बड़े-बड़े विकारी पवित्र हो गए हैं; हरी-यश ने (उनके) सारे पाप जला दिए हैं। हे दास नानक ! जिस मनुष्य को गुरू मिल गया। उसके मन में आनंद पैदा हो गया। गुरू के शबद की बरकति से वह निहाल हो गया। 4। 5।
माली गउड़ा महला 4 ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: माली गउड़ा महला 4॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “माली गउड़ा महला 4॥ हे भाई ! जिन सारे सिद्धों ने।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।