कर जोड़ि नानकु दानु मांगै देहु अपना नाउ ॥2॥1॥6॥
प्रभ समरथ देव अपार ॥
कउनु जानै चलित तेरे किछु अंतु नाही पार ॥1॥ रहाउ ॥
इक खिनहि थापि उथापदा घड़ि भंनि करनैहारु ॥
जेत कीन उपारजना प्रभु दानु देइ दातार ॥1॥
हरि सरनि आइओ दासु तेरा प्रभ ऊच अगम मुरार ॥
कढि लेहु भउजल बिखम ते जनु नानकु सद बलिहार ॥2॥2॥7॥
मनि तनि बसि रहे गोपाल ॥
दीन बांधव भगति वछल सदा सदा क्रिपाल ॥1॥ रहाउ ॥
आदि अंते मधि तूहै प्रभ बिना नाही कोइ ॥
पूरि रहिआ सगल मंडल एकु सुआमी सोइ ॥1॥
करनि हरि जसु नेत्र दरसनु रसनि हरि गुन गाउ ॥
बलिहारि जाए सदा नानकु देहु अपणा नाउ ॥2॥3॥8॥6॥14॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
धनि धंनि ओ राम बेनु बाजै ॥
मधुर मधुर धुनि अनहत गाजै ॥1॥ रहाउ ॥
धनि धनि मेघा रोमावली ॥
धनि धनि क्रिसन ओढै कांबली ॥1॥
धनि धनि तू माता देवकी ॥
जिह ग्रिह रमईआ कवलापती ॥2॥
धनि धनि बन खंड बिंद्राबना ॥
जह खेलै स्री नाराइना ॥3॥
बेनु बजावै गोधनु चरै ॥
नामे का सुआमी आनद करै ॥4॥1॥
कर धरे चक्र बैकुंठ ते आए गज हसती के प्रान उधारीअले ॥
दुहसासन की सभा द्रोपती अंबर लेत उबारीअले ॥1॥
गोतम नारि अहलिआ तारी पावन केतक तारीअले ॥
ऐसा अधमु अजाति नामदेउ तउ सरनागति आईअले ॥2॥2॥
राम बिना को बोलै रे ॥1॥ रहाउ ॥
एकल माटी कुंजर चीटी भाजन हैं बहु नाना रे ॥
असथावर जंगम कीट पतंगम घटि घटि रामु समाना रे ॥1॥
एकल चिंता राखु अनंता अउर तजहु सभ आसा रे ॥
प्रणवै नामा भए निहकामा को ठाकुरु को दासा रे ॥2॥3॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
नामदेव के बारे में परम्परा कहती है कि उनके स्पर्श से एक मन्दिर का दरवाज़ा घूम कर उनकी ओर हो गया। आदि ग्रंथ में उनकी कई रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! माया के मोह के जंजाल छोड़ के विकार त्याग के सदा परमात्मा के गुण गाया कर।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।