Lulla Family

अंग 988

अंग
988
राग माली गउड़ा
राग: माली गउड़ा · रचयिता: Bhagat Naam Dev Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आल जाल बिकार तजि सभि हरि गुना निति गाउ ॥
कर जोड़ि नानकु दानु मांगै देहु अपना नाउ ॥2॥1॥6॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! माया के मोह के जंजाल छोड़ के विकार त्याग के सदा परमात्मा के गुण गाया कर। दास नानक (तो अपने दोनों) हाथ जोड़ के (यही) दान माँगता है (कि हे प्रभू ! मुझे) अपन नाम दे। 2। 1। 6।
माली गउड़ा महला 5 ॥
प्रभ समरथ देव अपार ॥
कउनु जानै चलित तेरे किछु अंतु नाही पार ॥1॥ रहाउ ॥
इक खिनहि थापि उथापदा घड़ि भंनि करनैहारु ॥
जेत कीन उपारजना प्रभु दानु देइ दातार ॥1॥
हरि सरनि आइओ दासु तेरा प्रभ ऊच अगम मुरार ॥
कढि लेहु भउजल बिखम ते जनु नानकु सद बलिहार ॥2॥2॥7॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।

हिन्दी अर्थ: माली गउड़ा महला 5। हे प्रभू ! हे सब ताकतों के मालिक ! हे प्रकाश रूप ! हे बेअंत ! आपके करिश्मों को कोई भी नहीं जान सकता। आपके करिश्मों का अंत नहीं पाया जा सकता। परला छोर (उस पार को) नहीं पाया जा सकता। 1। रहाउ। हे भाई ! सब कुछ कर सकने वाला परमात्मा घड़ के पैदा करके (उसको) एक छिन में तोड़ के नाश कर देता है। हे भाई ! जितनी भी सृष्टि उसने पैदा की है। दातें देने वाला वह प्रभू (सारी सृष्टि को) दान देता है। 1। हे हरी ! हे प्रभू ! हे सबसे ऊँचे ! हे अपहुँच ! हे मुरारि ! आपका दास (नानक) आपकी शरण आया है। (अपने दास को) मुश्किल संसार-समुंद्र में से बाहर निकाल ले। दास नानक आपसे सदा सदके जाता है। 2। 2। 7।
माली गउड़ा महला 5 ॥
मनि तनि बसि रहे गोपाल ॥
दीन बांधव भगति वछल सदा सदा क्रिपाल ॥1॥ रहाउ ॥
आदि अंते मधि तूहै प्रभ बिना नाही कोइ ॥
पूरि रहिआ सगल मंडल एकु सुआमी सोइ ॥1॥
करनि हरि जसु नेत्र दरसनु रसनि हरि गुन गाउ ॥
बलिहारि जाए सदा नानकु देहु अपणा नाउ ॥2॥3॥8॥6॥14॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।

हिन्दी अर्थ: माली गउड़ा महला 5। आप ही मेरे मन में बस रहे हैं। हे सृष्टि के पालक ! गरीबों के सहायक ! हे भक्ति से प्यार करने वाले ! हे सदा ही कृपालु !् 1। रहाउ। हे प्रभू ! (जगत रचना के) आरम्भ में आप ही था। (जगत के) अंत में भी आप ही होंगे। अब भी आप ही है (सदा कायम रहने वाला)। हे भाई ! प्रभू के बिना कोई और (सदा कायम रहने वाला) नहीं। हे भाई ! एक मालिक प्रभू ही सारे भवनों में व्यापक है। 1। (हे भाई !) मैं कानों से हरी की सिफति-सालाह (सुनता हूँ)। आँखों से हरी के दर्शन (करता हूँ) जीभ से हरी के गुण गाता हूँ। (हे भाई ! प्रभू का दास) नानक सदा उससे कुर्बान जाता है (और उसके दर पर अरदास करता है- हे प्रभू !) मुझे अपना नाम बख्श। 2। 3। 8। 6। 14।
माली गउड़ा बाणी भगत नामदेव जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
धनि धंनि ओ राम बेनु बाजै ॥
मधुर मधुर धुनि अनहत गाजै ॥1॥ रहाउ ॥
धनि धनि मेघा रोमावली ॥
धनि धनि क्रिसन ओढै कांबली ॥1॥
धनि धनि तू माता देवकी ॥
जिह ग्रिह रमईआ कवलापती ॥2॥
धनि धनि बन खंड बिंद्राबना ॥
जह खेलै स्री नाराइना ॥3॥
बेनु बजावै गोधनु चरै ॥
नामे का सुआमी आनद करै ॥4॥1॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।

हिन्दी अर्थ: माली गउड़ा बाणी भगत नामदेव जी की सतिगुर प्रसादि॥ मैं सदके हूँ राम जी की बाँसुरी से जो बज रही है। बड़ी मीठी सुर से एक रस गुँजार डाल रही है। 1। रहाउ। सदके हूँ उस मेंढे की ऊन से। सदके हूँ उस कंबली से जो कृष्ण जी पहन रहे हैं। 1। हे माँ देवकी ! आपसे (भी) कुर्बान हूँ। जिसके घर में सुंदर राम जी। कृष्ण जी (पैदा हुए)। 2। धन्य है जंगल का वह भाग। वह वृंदावन। जहाँ श्री नारायण जी (कृष्ण रूप में) खेलते हैं। 3। नामदेव का प्रभू (कृष्ण रूप में) बाँसुरी बजा रहा है। गाएं चरा रहा है। और (ऐसे ही और भी) रंग बना रहा है। 4। 1।
मेरो बापु माधउ तू धनु केसौ सांवलीओ बीठुलाइ ॥1॥ रहाउ ॥
कर धरे चक्र बैकुंठ ते आए गज हसती के प्रान उधारीअले ॥
दुहसासन की सभा द्रोपती अंबर लेत उबारीअले ॥1॥
गोतम नारि अहलिआ तारी पावन केतक तारीअले ॥
ऐसा अधमु अजाति नामदेउ तउ सरनागति आईअले ॥2॥2॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।

हिन्दी अर्थ: हे मेरे माधव ! हे लंबे केसों वाले प्रभू ! हे साँवले रंग वाले प्रभू ! हे बीठुल ! आप धन्य है। आप मेरा पिता है (भाव। आप ही मुझे पैदा करने वाला और रखवाला है)। 1। रहाउ। हे माधो ! हाथों में चक्र पकड़ के बैकुंठ से (ही) आया था और हाथी के प्राण (तेंदूए से) तूने ही बचाए थे। हे साँवले प्रभू ! दुस्शासन की सभा में जब द्रोपदी के वस्त्र उतारे जा रहे थे तब उसकी इज्जत भी तूने ही बचाई थी। हे बीठल ! गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या को (जो ऋषि के श्राप से शिला बन गई थी) तूने ही मुक्त किया था; हे माधव ! तूने (अनेकों पतितों को) पवित्र किया और उनका उद्धार किया है। मैं नामदेव (भी) एक बहुत ही नीच हूँ और नीच जाति वाला हूँ। मैं आपकी शरण आया हूँ (मेरा भी उद्धार कर)। 2। 2।
सभै घट रामु बोलै रामा बोलै ॥
राम बिना को बोलै रे ॥1॥ रहाउ ॥
एकल माटी कुंजर चीटी भाजन हैं बहु नाना रे ॥
असथावर जंगम कीट पतंगम घटि घटि रामु समाना रे ॥1॥
एकल चिंता राखु अनंता अउर तजहु सभ आसा रे ॥
प्रणवै नामा भए निहकामा को ठाकुरु को दासा रे ॥2॥3॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! सारे घटों (शरीरों) में परमात्मा बोलता है। परमात्मा ही बोलता है। परमात्मा के बिना और कोई नहीं बोलता। 1। रहाउ। हे भाई ! जैसे एक ही मिट्टी से कई किस्मों के बर्तन बनाए जाते हैं। वैसे ही हाथी से ले के कीड़ी तक। निर्जीव और सजीव जीव। कीड़े-पतंगे हरेक घट में परमात्मा ही समाया हुआ है। 1। हे भाई ! और सबकी आशा छोड़। एक बेअंत प्रभू का ध्यान धर (जो सबमें मौजूद है)। नामदेव विनती करता है- जो मनुष्य (प्रभू का ध्यान धर के) निष्काम हो जाता है उसमें और प्रभू में कोई भिन्न-भेद नहीं रह जाता। 2। 3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नामदेव के बारे में परम्परा कहती है कि उनके स्पर्श से एक मन्दिर का दरवाज़ा घूम कर उनकी ओर हो गया। आदि ग्रंथ में उनकी कई रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! माया के मोह के जंजाल छोड़ के विकार त्याग के सदा परमात्मा के गुण गाया कर।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।