ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
अनिक जतन करि रहे हरि अंतु नाही पाइआ ॥
हरि अगम अगम अगाधि बोधि आदेसु हरि प्रभ राइआ ॥1॥ रहाउ ॥
कामु क्रोधु लोभु मोहु नित झगरते झगराइआ ॥
हम राखु राखु दीन तेरे हरि सरनि हरि प्रभ आइआ ॥1॥
सरणागती प्रभ पालते हरि भगति वछलु नाइआ ॥
प्रहिलादु जनु हरनाखि पकरिआ हरि राखि लीओ तराइआ ॥2॥
हरि चेति रे मन महलु पावण सभ दूख भंजनु राइआ ॥
भउ जनम मरन निवारि ठाकुर हरि गुरमती प्रभु पाइआ ॥3॥
हरि पतित पावन नामु सुआमी भउ भगत भंजनु गाइआ ॥
हरि हारु हरि उरि धारिओ जन नानक नामि समाइआ ॥4॥1॥
जपि मन राम नामु सुखदाता ॥
सतसंगति मिलि हरि सादु आइआ गुरमुखि ब्रहमु पछाता ॥1॥ रहाउ ॥
वडभागी गुर दरसनु पाइआ गुरि मिलिऐ हरि प्रभु जाता ॥
दुरमति मैलु गई सभ नीकरि हरि अंम्रिति हरि सरि नाता ॥1॥
धनु धनु साधु जिन॑ी हरि प्रभु पाइआ तिन॑ पूछउ हरि की बाता ॥
पाइ लगउ नित करउ जुदरीआ हरि मेलहु करमि बिधाता ॥2॥
लिलाट लिखे पाइआ गुरु साधू गुर बचनी मनु तनु राता ॥
हरि प्रभ आइ मिले सुखु पाइआ सभ किलविख पाप गवाता ॥3॥
राम रसाइणु जिन॑ गुरमति पाइआ तिन॑ की ऊतम बाता ॥
तिन की पंक पाईऐ वडभागी जन नानकु चरनि पराता ॥4॥2॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु माली गउड़ा महला 4 ऑकार केवल एक है, उसका नाम सत्य (शाश्वत) है, वह परमपुरुष संसार का रचयिता है, उसे कोई भय नहीं अर्थात् कर्म दोष से परे है, सब पर समान दृष्टि होने के कारण वह प्रे।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।