जलत अगनी मिलत नीर ॥
जैसे बारिक मुखहि खीर ॥1॥
जैसे रण महि सखा भ्रात ॥
जैसे भूखे भोजन मात ॥
जैसे किरखहि बरस मेघ ॥
जैसे पालन सरनि सेंघ ॥2॥
गरुड़ मुखि नही सरप त्रास ॥
सूआ पिंजरि नही खाइ बिलासु ॥
जैसो आंडो हिरदे माहि ॥
जैसो दानो चकी दराहि ॥3॥
बहुतु ओपमा थोर कही ॥
हरि अगम अगम अगाधि तुही ॥
ऊच मूचौ बहु अपार ॥
सिमरत नानक तरे सार ॥4॥3॥
इही हमारै सफल काज ॥
अपुने दास कउ लेहु निवाजि ॥1॥ रहाउ ॥
चरन संतह माथ मोर ॥
नैनि दरसु पेखउ निसि भोर ॥
हसत हमरे संत टहल ॥
प्रान मनु धनु संत बहल ॥1॥
संतसंगि मेरे मन की प्रीति ॥
संत गुन बसहि मेरै चीति ॥
संत आगिआ मनहि मीठ ॥
मेरा कमलु बिगसै संत डीठ ॥2॥
संतसंगि मेरा होइ निवासु ॥
संतन की मोहि बहुतु पिआस ॥
संत बचन मेरे मनहि मंत ॥
संत प्रसादि मेरे बिखै हंत ॥3॥
मुकति जुगति एहा निधान ॥
प्रभ दइआल मोहि देवहु दान ॥
नानक कउ प्रभ दइआ धारि ॥
चरन संतन के मेरे रिदे मझारि ॥4॥4॥
सभ कै संगी नाही दूरि ॥
करन करावन हाजरा हजूरि ॥1॥ रहाउ ॥
सुनत जीओ जासु नामु ॥
दुख बिनसे सुख कीओ बिस्रामु ॥
सगल निधि हरि हरि हरे ॥
मुनि जन ता की सेव करे ॥1॥
जा कै घरि सगले समाहि ॥
जिस ते बिरथा कोइ नाहि ॥
जीअ जंत्र करे प्रतिपाल ॥
सदा सदा सेवहु किरपाल ॥2॥
सदा धरमु जा कै दीबाणि ॥
बेमुहताज नही किछु काणि ॥
सभ किछु करना आपन आपि ॥
रे मन मेरे तू ता कउ जापि ॥3॥
साधसंगति कउ हउ बलिहार ॥
जासु मिलि होवै उधारु ॥
नाम संगि मन तनहि रात ॥
नानक कउ प्रभि करी दाति ॥4॥5॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि समरथ की सरना ॥
जीउ पिंडु धनु रासि मेरी प्रभ एक कारन करना ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरि सिमरि सदा सुखु पाईऐ जीवणै का मूलु ॥
रवि रहिआ सरबत ठाई सूखमो असथूल ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जैसे बुझ रहे दीए को तेल मिल जाए जैसे आग में जल रहे को पानी मिल जाए।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।