राग कल्याण
रात की धुन, ध्यानमग्न और श्रेष्ठ।
कल्याण रात का राग है, ध्यानमग्न और श्रेष्ठ। यमन-कल्याण, शुद्ध-कल्याण, श्याम-कल्याण इत्यादि कई स्वरूप हैं, सब रात की गोष्ठियों के मुख्य राग हैं।
नाम का अर्थ ही "शुभ" या "श्रेष्ठ" है। ग्रंथ में कल्याण की रचनाएँ अंग तेरह-सौ-एक के क़रीब से शुरू होती हैं।
"रामा रम रामै अंतु न पाइआ ॥" कल्याण M4
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 4 (12)
- रामा रम रामै अंतु न पाइआ ॥अंग 1319
- हरि जनु गुन गावत हसिआ ॥अंग 1319
- मेरे मन जपि हरि गुन अकथ सुनथई ॥अंग 1320
- हमरी चितवनी हरि प्रभु जानै ॥अंग 1320
- प्रभ कीजै क्रिपा निधान हम हरि गुन गावहगे ॥अंग 1321
- छका 1 ॥अंग 1321
- रामा रम रामो सुनि मनु भीजै ॥अंग 1323
- राम गुरु पारसु परसु करीजै ॥अंग 1324
- रामा रम रामो रामु रवीजै ॥अंग 1324
- रामा रम रामो पूज करीजै ॥अंग 1325
- रामा मै साधू चरन धुवीजै ॥अंग 1325
- रामा हम दासन दास करीजै ॥अंग 1326
महला 5 (10)
- हमारै एह किरपा कीजै ॥अंग 1321
- जाचिकु नामु जाचै जाचै ॥अंग 1321
- मेरे लालन की सोभा ॥अंग 1322
- तेरै मानि हरि हरि मानि ॥अंग 1322
- गुन नाद धुनि अनंद बेद ॥अंग 1322
- कउनु बिधि ता की कहा करउ ॥अंग 1322
- प्रानपति दइआल पुरख प्रभ सखे ॥अंग 1322
- मनि तनि जापीऐ भगवान ॥अंग 1322
- प्रभु मेरा अंतरजामी जाणु ॥अंग 1323
- हरि चरन सरन कलिआन करन ॥अंग 1323
अन्य भगत (1)
- छका 1 ॥अंग 1326