ੴ सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
रामा रम रामै अंतु न पाइआ ॥
हम बारिक प्रतिपारे तुमरे तू बड पुरखु पिता मेरा माइआ ॥1॥ रहाउ ॥
हरि के नाम असंख अगम हहि अगम अगम हरि राइआ ॥
गुणी गिआनी सुरति बहु कीनी इकु तिलु नही कीमति पाइआ ॥1॥
गोबिद गुण गोबिद सद गावहि गुण गोबिद अंतु न पाइआ ॥
तू अमिति अतोलु अपरंपर सुआमी बहु जपीऐ थाह न पाइआ ॥2॥
उसतति करहि तुमरी जन माधौ गुन गावहि हरि राइआ ॥
तुम॑ जल निधि हम मीने तुमरे तेरा अंतु न कतहू पाइआ ॥3॥
जन कउ क्रिपा करहु मधसूदन हरि देवहु नामु जपाइआ ॥
मै मूरख अंधुले नामु टेक है जन नानक गुरमुखि पाइआ ॥4॥1॥
हरि जनु गुन गावत हसिआ ॥
हरि हरि भगति बनी मति गुरमति धुरि मसतकि प्रभि लिखिआ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर के पग सिमरउ दिनु राती मनि हरि हरि हरि बसिआ ॥
हरि हरि हरि कीरति जगि सारी घसि चंदनु जसु घसिआ ॥1॥
हरि जन हरि हरि हरि लिव लाई सभि साकत खोजि पइआ ॥
जिउ किरत संजोगि चलिओ नर निंदकु पगु नागनि छुहि जलिआ ॥2॥
जन के तुम॑ हरि राखे सुआमी तुम॑ जुगि जुगि जन रखिआ ॥
कहा भइआ दैति करी बखीली सभ करि करि झरि परिआ ॥3॥
जेते जीअ जंत प्रभि कीए सभि कालै मुखि ग्रसिआ ॥
हरि जन हरि हरि हरि प्रभि राखे जन नानक सरनि पइआ ॥4॥2॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु कलिआन महला 4 ॥ वह अद्वितीय परमेश्वर केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, नाम उसका सत्य है, वह संसार को बनाने वाला है, सर्वशक्तिमान है, निर्भय है,वह कालातीत ब्रह्मा मूर्ति सदा अमर है, वह ।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।