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अंग 1319

अंग
1319
राग कल्याण
राग: कल्याण · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु कलिआन महला 4
ੴ सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
रामा रम रामै अंतु न पाइआ ॥
हम बारिक प्रतिपारे तुमरे तू बड पुरखु पिता मेरा माइआ ॥1॥ रहाउ ॥
हरि के नाम असंख अगम हहि अगम अगम हरि राइआ ॥
गुणी गिआनी सुरति बहु कीनी इकु तिलु नही कीमति पाइआ ॥1॥
गोबिद गुण गोबिद सद गावहि गुण गोबिद अंतु न पाइआ ॥
तू अमिति अतोलु अपरंपर सुआमी बहु जपीऐ थाह न पाइआ ॥2॥
उसतति करहि तुमरी जन माधौ गुन गावहि हरि राइआ ॥
तुम॑ जल निधि हम मीने तुमरे तेरा अंतु न कतहू पाइआ ॥3॥
जन कउ क्रिपा करहु मधसूदन हरि देवहु नामु जपाइआ ॥
मै मूरख अंधुले नामु टेक है जन नानक गुरमुखि पाइआ ॥4॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: रागु कलिआन महला 4 ॥ वह अद्वितीय परमेश्वर केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, नाम उसका सत्य है, वह संसार को बनाने वाला है, सर्वशक्तिमान है, निर्भय है,वह कालातीत ब्रह्मा मूर्ति सदा अमर है, वह जन्म-मरण के चक्र से रहित है, वह स्वतः प्रकाशमान हुआ, स्वयंभू है, गुरु-कृपा से प्राप्त होता है। हे भाई ! सर्व-व्यापक परमात्मा (के गुणों) का अंत (किसी जीव द्वारा) नहीं पाया जा सकता। हे प्रभू ! हम जीव आपके बच्चे हैं। आपके पाले हुए हैं। आप सबसे बड़ा पुरख है। आप हमारा पिता है। आप हमारी माँ है। 1। रहाउ। हे भाई ! प्रभू-पातशाह के नाम अनगिनत हैं (प्रभू के नामों की गिनती तक) पहुँच नहीं हो सकती। हे भाई ! अनेकों गुणवान मनुष्य अनेकों विचारवान मनुष्य बहुत सोच-विचार करते आए हैं। पर कोई भी मनुष्य परमात्मा की महानता का रक्ती भर भी आकलन नहीं कर सका। 1। हे भाई ! (अनेकों ही जीव) परमात्मा के गुण सदा गाते हैं। पर परमात्मा के गुणों का अंत किसी ने नहीं पाया। हे प्रभू ! आपकी हस्ती को नापा नहीं जा सकता। आपकी हस्ती को तोला नहीं जा सकता। हे मालिक-प्रभू ! आप परे से परे है। आपका नाम बहुत जपा जा रहा है। (पर आप एक ऐसा समुंद्र है कि उसकी) गहराई नहीं पाई जा सकती। 2। हे माया के पति-प्रभू ! हे प्रभू-पातिशाह ! आपके सेवक आपकी सिफत-सालाह करते रहते हैं। आपके गुण गाते रहते हैं। हे प्रभू ! आप (मानो। एक) समुंद्र है। हम जीव आपकी मछलियाँ हैं (मछली नदी में तैरती तो है पर नदी की हस्ती का अंदाजा नहीं लगा सकती)। हे प्रभू ! कहीं भी कोई जीव आपकी हस्ती का अंत नहीं पा सका। 3। हे दैत्य-दमन प्रभू ! (अपने) सेवक (नानक) पर मेहर कर। हे हरी ! (मुझे अपना) नाम दे (मैं नित्य) जपता रहूँ। मुझ मूर्ख वास्ते मुझ अंधे के लिए (आपका) नाम सहारा है। हे दास नानक ! (कह-) गुरू की शरण पड़ कर ही (परमात्मा का नाम) प्राप्त होता है। 4। 1।
कलिआनु महला 4 ॥
हरि जनु गुन गावत हसिआ ॥
हरि हरि भगति बनी मति गुरमति धुरि मसतकि प्रभि लिखिआ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर के पग सिमरउ दिनु राती मनि हरि हरि हरि बसिआ ॥
हरि हरि हरि कीरति जगि सारी घसि चंदनु जसु घसिआ ॥1॥
हरि जन हरि हरि हरि लिव लाई सभि साकत खोजि पइआ ॥
जिउ किरत संजोगि चलिओ नर निंदकु पगु नागनि छुहि जलिआ ॥2॥
जन के तुम॑ हरि राखे सुआमी तुम॑ जुगि जुगि जन रखिआ ॥
कहा भइआ दैति करी बखीली सभ करि करि झरि परिआ ॥3॥
जेते जीअ जंत प्रभि कीए सभि कालै मुखि ग्रसिआ ॥
हरि जन हरि हरि हरि प्रभि राखे जन नानक सरनि पइआ ॥4॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: कलिआनु महला 4 ॥ हे भाई ! परमात्मा का भगत परमात्मा के गुण गाते हुए प्रसन्न-चित्त रहता है। गुरू की मति पर चल के परमात्मा की भक्ति उसको प्यारी लगती है। प्रभू ने (ही) धुर-दरगाह से ही उसके माथे पर ये लेख लिखे होते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! मैं दिन-रात उसके चरणों का ध्यान धरता हूँ। (गुरू की कृपा से ही) परमात्मा मेरे मन में आ बसा है। हे भाई ! परमात्मा की सिफतसालाह जगत में (सबसे) श्रेष्ठ (पदार्थ) है। (जैसे) चंदन रगड़ खा के (सुगंधि देता है। वैसे ही परमात्मा का) यश (सिफतसालाह मनुष्य के हृदय से) रगड़ खाता है (और। नाम की सुगंधि बिखेरता है)। 1। हे भाई ! परमात्मा के भगत सदा परमात्मा में सुरति जोड़े रखते हैं। पर परमात्मा से टूटे हुए सारे मनुष्य उनसे ईष्या करते हैं। (पर। साकत मनुष्य के भी क्या वश।) जैसे-जैसे पिछले किए कर्मों के संस्कारों के असर तले निंदक मनुष्य (निंदा वाली) जीवन-चाल चलता है (त्यों-त्यों उसका आत्मिक जीवन ईष्या की आग से) छू के जलता जाता है। (जैसे किसी मनुष्य का) पैर सपनी से छूह के (सर्पनी के डंक मारने से उसकी) मौत हो जाती है। 2। हे (मेरे) मालिक-प्रभू ! अपने भगतों के आप स्वयं रखवाले हैं। हरेक जुग में आप (अपने भगतों की) रक्षा करते आए हैं। (हर्णाकष्यप) दैत्य ने (भगत प्रहलाद के साथ) ईष्या की। पर (वह दैत्य भगत का) कुछ ना बिगाड़ सका। वह सारी (दैत्य सभा ही) ईष्या कर-कर के अपनी आत्मिक मौत सहेड़ती गई। 3। हे भाई ! जितने भी जीव-जंतु प्रभू ने पैदा किए हुए हैं। यह सारे ही (परमात्मा से विछुड़ के) आत्मिक मौत के मुँह में फसे रहते हैं। हे दास नानक ! अपने भगतों की प्रभू ने सदा ही स्वयं रक्षा की है। भगत प्रभू की शरण पड़े रहते हैं। 4। 2।
कलिआन महला 4 ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: कलिआनु महला 4 ॥

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु कलिआन महला 4 ॥ वह अद्वितीय परमेश्वर केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, नाम उसका सत्य है, वह संसार को बनाने वाला है, सर्वशक्तिमान है, निर्भय है,वह कालातीत ब्रह्मा मूर्ति सदा अमर है, वह ।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।