महा अभाग अभाग है जिन के तिन साधू धूरि न पीजै ॥ तिना तिसना जलत जलत नही बूझहि डंडु धरम राइ का दीजै ॥6॥ सभि तीरथ बरत जग्य पुंन कीए हिवै गालि गालि तनु छीजै ॥ अतुला तोलु राम नामु है गुरमति को पुजै न तोल तुलीजै ॥7॥ तव गुन ब्रहम ब्रहम तू जानहि जन नानक सरनि परीजै ॥ तू जल निधि मीन हम तेरे करि किरपा संगि रखीजै ॥8॥3॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिन लोगों के भाग्य बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण होते हैं। उनको संत-जनों के चरणों की चरण-धूल नसीब नहीं होती। उनके अंदर तृष्णा की आग लगी रहती है। (उस आग में) हर वक्त जलते हुए के अंदर ठंढ नहीं पड़ती। (यह उनको) धर्मराज की सजा मिलती है। 6। हे भाई ! अगर सारे तीर्थों के स्नान। अनेकों व्रत। यज्ञ और (इस तरह के) पुन्य-दान किए जाएं। (पहाड़ों की खुंदरों में) बर्फ में गला-गला के शरीर नाश किया जाए। (तो भी इन सारे साधनों में से) कोई भी साधन परमात्मा के नाम की बराबरी नहीं कर सकता। परमात्मा का नाम ऐसा है कि कोई भी तोल उसको तोल नहीं सकता। वह मिलता है गुरू की मति पर चलने से। 7। हे दास नानक ! (कह-) हे प्रभू ! आपके गुण आप (स्वयं ही) जानता है (मेहर कर। हम जीव आपकी ही) शरण पड़े रहें। आप (हमारा) समुंद्र है। हमज ीव आपकी मछलियाँ हैं। मेहर करके (हमें अपने) साथ ही रखे रख। 8। 3।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: कलिआन महला 4 ॥ हे भाई ! सदा सर्व-व्यापक परमात्मा की भक्ति करनी चाहिए। अगर कोई मेरे हृदय में गुरमति के द्वारा परमात्मा के नाम का आनंद और आत्मिक जीवन की सूझ पक्की कर दे तो मैं अपना मन अपना तन सब कुछ उसके आगे भेटा रख दूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा ही (पूजनीय) देवता है। (परमात्मा के नाम-) रस में लग के परमात्मा की ही भगती करनी चाहिए। परमात्मा का नाम परमात्मा के गुण ही वृक्ष की शाखाएं हैं (जिनसे नाम और सिफत-सालाह के फूल ही) चुन-चुन के परमात्मा-देव की पूजा करनी चाहिए। 1। हे भाई ! (अन्य सभी चतुराईयों से) जगत में अच्छे-बुरे कर्म की परख कर सकने वाली बुद्धि (बिबेक) ही सबसे पवित्र है। (इसकी सहायता से परमात्मा के गुण मन में) बसा-बसा के (आत्मिक-जीवन देने वाला नाम-) रस पीना चाहिए। ये नाम-पदार्थ गुरू की कृपा से (ही) मिलता है। अपना ये मन गुरू के हवाले कर देना चाहिए। 2। हे भाई ! परमात्मा का नाम हीरा बहुत कीमती है बहुत ही सुंदर है। इस नाम-हीरे से (अपने मन-) हीरे को सदा परो के रखना चाहिए। गुरू के शबद से ये मन श्रेष्ठ मोती बन सकता है। क्योंकि शबद की बरकति से नाम-हीरे की कदर-कीमत की समझ पड़ जाती है। 3। हे भाई ! संत-जनों की संगति में रह के संत-जनों के चरणों में लग के ऊँचे जीवन वाले बना जा सकता है। जैसे छिछरे को पीपल अपने में लीन कर (के अपने जैसा ही बना) लेता है। (इसी तरह मनुष्य में) परमात्मा के नाम की सुगंधि बस जाती है। वह मनुष्य सब प्राणियों में से ऊँचे जीवन वाला बन जाता है। 4। हे भाई ! (गुरमति की बरकति से जिस मनुष्य ने) विकारों की मैल से बचाने वाले काम नित्य करने शुरू कर दिए। (उसके जीवन-वृक्ष पर। मानो। यह) हरी शाखा सदा उगती रहती है। (जिसको) धर्म-रूप फूल लगता रहता है। और गुरू से मिली आत्मिक जीवन की सूझ (का) फल लगता है। (इस फूल की) महक सुगन्धि (सारे) जगत में बिखरती है। 5। हे भाई ! (सारे जगत में) एक (परमात्मा) की ज्योति (ही बसती है)। एक परमात्मा ही (सबके) मन में बसता है। सारी लुकाई में सिर्फ परमात्मा को देखने वाली निगाह ही बनानी चाहिए। सारी सृष्टि में एक परमात्मा ही पसारा पसार रहा है। (इसलिए) सबके चरणों तले (अपना) सिर रखना चाहिए। 6। हे भाई ! देखो। जो मनुष्य परमात्मा के नाम से वंचित रहते हैं वे निरादरी ही करवाते हैं। उनकी नाक सदा कटती ही रहती है। परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य अहंकारी ही कहे जाते हैं। नाम के बिना जीया हुआ जीवन धिक्कारयोग्य ही होता है। 7। हे भाई ! जब तक मन में (भाव। शरीर में) एक साँस भी । तब तक पूरी श्रद्धा से परमात्मा के चरणों में पड़े रहना चाहिए। हे नानक ! (कह- हे प्रभू ! मेरे पर) मेहर कर। मेहर कर। मैं आपके संत-जनों के चरण धोता रहूँ। 8। 4।
कलिआन महला 4 ॥ रामा मै साधू चरन धुवीजै ॥ किलबिख दहन होहि खिन अंतरि मेरे ठाकुर किरपा कीजै ॥1॥ रहाउ ॥ मंगत जन दीन खरे दरि ठाढे अति तरसन कउ दानु दीजै ॥ त्राहि त्राहि सरनि प्रभ आए मो कउ गुरमति नामु द्रिड़ीजै ॥1॥ काम करोधु नगर महि सबला नित उठि उठि जूझु करीजै ॥ अंगीकारु करहु रखि लेवहु गुर पूरा काढि कढीजै ॥2॥ अंतरि अगनि सबल अति बिखिआ हिव सीतलु सबदु गुर दीजै ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: कलिआन महला 4 ॥ हे मेरे राम ! मैं गुरू के चरण (नित्य) धोता रहूँ (गुरू की शरण पड़े रहने पर) एक छिन में सारे पाप जल जाते हैं, हे मेरे ठाकुर ! मेरे ऊपर मेहर कर। 1। रहाउ। हे प्रभू ! (आपके दर के) निमाणे मँगते (आपके) दर पर खड़े हुए हैं। बहुत तरस रहों को (यह) ख़ैर डाल। हे प्रभू ! (इन पापों से) बचा ले। बचा ले। (हम आपकी) शरण आए हैं। हे प्रभू ! गुरू की मति से (अपना) नाम मेरे अंदर पक्का कर। 1। हे प्रभू ! (हम जीवों के शरीर-) नगर में काम-क्रोध (आदि हरेक विकार) बलवान हुआ रहता है। हमेशा उठ-उठ के (इनके साथ) युद्ध करना पड़ता है। हे प्रभू ! सहायता कर। (इनसे) बचा ले। पूरा गुरू (मिला के इनके पँजे में से) निकाल ले। 2। हे भाई ! (जीवों के) अंदर माया (की तृष्णा) की आग बहुत भड़क रही है। बर्फ जैसे गुरू के शीतलता भरे शबद दे।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिन लोगों के भाग्य बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण होते हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।