प्रभ कीजै क्रिपा निधान हम हरि गुन गावहगे ॥
हउ तुमरी करउ नित आस प्रभ मोहि कब गलि लावहिगे ॥1॥ रहाउ ॥
हम बारिक मुगध इआन पिता समझावहिगे ॥
सुतु खिनु खिनु भूलि बिगारि जगत पित भावहिगे ॥1॥
जो हरि सुआमी तुम देहु सोई हम पावहगे ॥
मोहि दूजी नाही ठउर जिसु पहि हम जावहगे ॥2॥
जो हरि भावहि भगत तिना हरि भावहिगे ॥
जोती जोति मिलाइ जोति रलि जावहगे ॥3॥
हरि आपे होइ क्रिपालु आपि लिव लावहिगे ॥
जनु नानकु सरनि दुआरि हरि लाज रखावहिगे ॥4॥6॥
कलिआनु भोपाली महला 4
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पारब्रहमु परमेसुरु सुआमी दूख निवारणु नाराइणे ॥
सगल भगत जाचहि सुख सागर भव निधि तरण हरि चिंतामणे ॥1॥ रहाउ ॥
दीन दइआल जगदीस दमोदर हरि अंतरजामी गोबिंदे ॥
ते निरभउ जिन स्रीरामु धिआइआ गुरमति मुरारि हरि मुकंदे ॥1॥
जगदीसुर चरन सरन जो आए ते जन भव निधि पारि परे ॥
भगत जना की पैज हरि राखै जन नानक आपि हरि क्रिपा करे ॥2॥1॥7॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हमारै एह किरपा कीजै ॥
अलि मकरंद चरन कमल सिउ मनु फेरि फेरि रीझै ॥1॥ रहाउ ॥
आन जला सिउ काजु न कछूऐ हरि बूंद चात्रिक कउ दीजै ॥1॥
बिनु मिलबे नाही संतोखा पेखि दरसनु नानकु जीजै ॥2॥1॥
कलिआन महला 5 ॥
जाचिकु नामु जाचै जाचै ॥
सरब धार सरब के नाइक सुख समूह के दाते ॥1॥ रहाउ ॥
केती केती मांगनि मागै भावनीआ सो पाईऐ ॥1॥
सफल सफल सफल दरसु रे परसि परसि गुन गाईऐ ॥
नानक तत तत सिउ मिलीऐ हीरै हीरु बिधाईऐ ॥2॥2॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “कलिआनु महला 4 ॥ हे कृपा के खजाने प्रभू ! मेहर कर।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।