गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: (ताकि) तन में मन में बहुत शांति पैदा हो जाए। (गुरू का शबद जीवों के हरेक) रोग काट देता है। (गुरू के शबद की बरकति से) आत्मिक आनंद में मगन रह सकते हैं। 3। हे भाई ! जैसे सूरज (अपनी) किरण के द्वारा सब जगह पहुँचा हुआ है। (वैसे ही) परमात्मा सारी लुकाई में हरेक शरीर में व्यापक है। जिस मनुष्य को संत जन मिल जाते हैं। वह (मिलाप के) स्वाद को भोगता है। हे भाई ! (संत जनों की संगति से) प्रभू-चरणों में लीन हो के नाम-रस पीया जा सकता है। 4। हे भाई ! (परमात्मा के) भगत को गुरू से (इस प्रकार) प्रीति बनी रहती है। जैसे सूरज (के उदय होने) का इन्तजार कर-कर के चकवी (विछोड़े की रात गुजारती है)। देखते-देखते (चकवी) सारी रात देखती रहती है। (जब सूरज) मुँह दिखाता है (तब चकवे का मिलाप हासिल करती है। इसी तरह जब गुरू दर्शन देता है। तब सेवक) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी सकता है। 5। हे भाई ! परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य बहुत लोभी होते हैं। कुत्ते (के स्वभाव वाले) कहे जाते हैं। (उनके अंदर) दुर्मति की मैल (सदा) भरी रहती है। (साकत मनुष्य) अपने स्वार्थ के लिए बहुत सारी बातें करते हैं। पर उनका ऐतबार नहीं करना चाहिए। 6। हे हरी ! (मुझे अपने) संतजनों की भक्ति दे। संत जन (अपने) मुँह से दूसरों की भलाई के वचन बोलते रहते हैं। संत जन अनेकों गुणों वाले होते हैं। हे भाई ! संत जनों की संगति में मिल के परमात्मा का नाम रस प्राप्त किया जा सकता है। 7। हे प्रभू ! आप अपहुँच है। दया का श्रोत है। दया का मालिक है सब जीवों को दातें देने वाला है। मेहर कर के सब जीवों की रक्षा कर। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) सारे जीव आपके हैं। आप ही सारे जगत का सहारा है। (सबकी) पालना कर। 8। 5।
कलिआनु महला 4 ॥ रामा हम दासन दास करीजै ॥ जब लगि सासु होइ मन अंतरि साधू धूरि पिवीजै ॥1॥ रहाउ ॥ संकरु नारदु सेखनाग मुनि धूरि साधू की लोचीजै ॥ भवन भवन पवितु होहि सभि जह साधू चरन धरीजै ॥1॥ तजि लाज अहंकारु सभु तजीऐ मिलि साधू संगि रहीजै ॥ धरम राइ की कानि चुकावै बिखु डुबदा काढि कढीजै ॥2॥ भरमि सूके बहु उभि सुक कहीअहि मिलि साधू संगि हरीजै ॥ ता ते बिलमु पलु ढिल न कीजै जाइ साधू चरनि लगीजै ॥3॥ राम नाम कीरतन रतन वथु हरि साधू पासि रखीजै ॥ जो बचनु गुर सति सति करि मानै तिसु आगै काढि धरीजै ॥4॥ संतहु सुनहु सुनहु जन भाई गुरि काढी बाह कुकीजै ॥ जे आतम कउ सुखु सुखु नित लोड़हु तां सतिगुर सरनि पवीजै ॥5॥ जे वड भागु होइ अति नीका तां गुरमति नामु द्रिड़ीजै ॥ सभु माइआ मोहु बिखमु जगु तरीऐ सहजे हरि रसु पीजै ॥6॥ माइआ माइआ के जो अधिकाई विचि माइआ पचै पचीजै ॥ अगिआनु अंधेरु महा पंथु बिखड़ा अहंकारि भारि लदि लीजै ॥7॥ नानक राम रम रमु रम रम रामै ते गति कीजै ॥ सतिगुरु मिलै ता नामु द्रिड़ाए राम नामै रलै मिलीजै ॥8॥6॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: कलिआन महला 4 ॥ हे राम ! हमें (अपने) दासों का दास बनाए रख। हे भाई ! जब तक शरीर में साँसें आ रही हैं। तब तक संतजनों की चरण-धूड़ पीते रहना चाहिए (निम्रता से संत जनों की संगति में रह के उनसे नाम-अमृत पीते रहना चाहिए)। 1। रहाउ। हे भाई ! शिव। नारद। शेषनाग (आदि हरेक ऋषि-) मुनि संत जनों के चरनों की धूड़ की तमन्ना करता रहा है। हे भाई ! जहाँ संत-जन चरण रखते हैं। वे सारे भवन सारी जगहें पवित्र हो जाती हैं। 1। हे भाई ! लोक-लाज छोड़ के (अपने अंदर से किसी बड़प्पन का) सारा माण छोड़ देना चाहिए। और संत-जनों की संगति में मिल के रहना चाहिए। (जो मनुष्य संत जनों की संगति में रहता है। वह) धर्मराज का सहम खत्म कर लेता है। आत्मिक मौत लाने वाले जहरीले संसार-समुंद्र में डूबते हुए को (संत-जन) निकाल लेते हैं। 2। हे भाई ! (जो मनुष्य माया की) भटकना में पड़ कर आत्मिक जीवन की तरावट समाप्त कर लेते हैं। वे मनुष्य उन वृक्षों जैसे कहे जाते हैं। जो खड़े-खड़े सूख जाते हैं (पर ऐसे सूखे जीवन वाले मनुष्य भी) संत-जनों की संगति में मिल के हरे हो जाते हैं। इसलिए (हे भाई !) एक पल भर भी देर नहीं करनी चाहिए। (जल्दी) जा के संत जनों के चरणों में लगना चाहिए। 3। हे भाई ! परमात्मा का नाम। परमात्मा की सिफत-सालाह एक कीमती पदार्थ है। यह पदार्थ परमात्मा ने संत-जनों के पास रखा होता है। जो मनुष्य गुरू के उपदेश को पूरी श्रद्धा के साथ मानता है। (गुरू यह कीमती पदार्थ) उसके आगे निकाल के रख देता है। 4। हे संत जनो ! हे भाईयो ! गुरू ने (अपनी) बाँह ऊँची की हुई है और आवाज मार रहा है (उसकी बात) ध्यान से सुनो। हे संत जनो ! अगर आप अपनी जिंद के लिए सदा का सुख चाहते हैं। तो गुरू की शरण पड़े रहना चाहिए। 5। हे भाई ! अगर किसी मनुष्य की बहुत बड़ी किस्मत हो। तो वह गुरू की मति ले के (अपने अंदर) परमात्मा का नाम दृढ़ करता है। हे भाई ! माया का मोह- यह सारा बहुत ही मुश्किल संसार-समुंद्र है (नाम की बरकति से यह) तैरा जा सकता है। (इस वास्ते) आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा का नाम-रस पीना चाहिए। 6। हे भाई ! जो मनुष्य सिर्फ माया के ही बहुत प्रेमी हैं (वे सदा दुखी होते हैं। माया का प्रेमी मनुष्य तो) हर वक्त माया (की तृष्णा की आग) में जलता रहता है। (ऐसे मनुष्य के लिए) आत्मिक जीवन की ओर से बेसमझी एक घुप अंधेरा (बन जाता है। उस मनुष्य के लिए जिंदगी का) रास्ता मुश्किल हो जाता है (क्योंकि वह मनुष्य) अहंकार (-रूप) भार से लदा रहता है। 7। हे नानक ! सदा व्यापक राम का नाम सिमरता रह। व्यापक राम के नाम से ही उच्च आत्मिक अवस्था हासिल की जा सकती है। जब गुरू मिलता है वह (वह मनुष्य के हृदय में परमात्मा का) नाम दृढ़ करता है। (मनुष्य) परमात्मा के नाम में सदा के लिए लीन हो जाता है। 8। 6। छका = छक्का। छे अष्टपदियों का समूह।
छका 1 ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(ताकि) तन में मन में बहुत शांति पैदा हो जाए।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।