गुर उपदेसि हरि नामु धिआइओ सभि किलबिख दुख लाथे ॥1॥ रहाउ ॥
रसना एक जसु गाइ न साकै बहु कीजै बहु रसुनथे ॥
बार बार खिनु पल सभि गावहि गुन कहि न सकहि प्रभ तुमनथे ॥1॥
हम बहु प्रीति लगी प्रभ सुआमी हम लोचह प्रभु दिखनथे ॥
तुम बड दाते जीअ जीअन के तुम जानहु हम बिरथे ॥2॥
कोई मारगु पंथु बतावै प्रभ का कहु तिन कउ किआ दिनथे ॥
सभु तनु मनु अरपउ अरपि अरापउ कोई मेलै प्रभ मिलथे ॥3॥
हरि के गुन बहुत बहुत बहु सोभा हम तुछ करि करि बरनथे ॥
हमरी मति वसगति प्रभ तुमरै जन नानक के प्रभ समरथे ॥4॥3॥
मेरे मन जपि हरि गुन अकथ सुनथई ॥
धरमु अरथु सभु कामु मोखु है जन पीछै लगि फिरथई ॥1॥ रहाउ ॥
सो हरि हरि नामु धिआवै हरि जनु जिसु बडभाग मथई ॥
जह दरगहि प्रभु लेखा मागै तह छुटै नामु धिआइथई ॥1॥
हमरे दोख बहु जनम जनम के दुखु हउमै मैलु लगथई ॥
गुरि धारि क्रिपा हरि जलि नावाए सभ किलबिख पाप गथई ॥2॥
जन कै रिद अंतरि प्रभु सुआमी जन हरि हरि नामु भजथई ॥
जह अंती अउसरु आइ बनतु है तह राखै नामु साथई ॥3॥
जन तेरा जसु गावहि हरि हरि प्रभ हरि जपिओ जगंनथई ॥
जन नानक के प्रभ राखे सुआमी हम पाथर रखु बुडथई ॥4॥4॥
हमरी चितवनी हरि प्रभु जानै ॥
अउरु कोई निंद करै हरि जन की प्रभु ता का कहिआ इकु तिलु नही मानै ॥1॥ रहाउ ॥
अउर सभ तिआगि सेवा करि अचुत जो सभ ते ऊच ठाकुरु भगवानै ॥
हरि सेवा ते कालु जोहि न साकै चरनी आइ पवै हरि जानै ॥1॥
जा कउ राखि लेइ मेरा सुआमी ता कउ सुमति देइ पै कानै ॥
ता कउ कोई अपरि न साकै जा की भगति मेरा प्रभु मानै ॥2॥
हरि के चोज विडान देखु जन जो खोटा खरा इक निमख पछानै ॥
ता ते जन कउ अनदु भइआ है रिद सुध मिले खोटे पछुतानै ॥3॥
तुम हरि दाते समरथ सुआमी इकु मागउ तुझ पासहु हरि दानै ॥
जन नानक कउ हरि क्रिपा करि दीजै सद बसहि रिदै मोहि हरि चरानै ॥4॥5॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे मन ! जगत के नाथ (के नाम) का जाप जपा कर।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।