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अंग 1320

अंग
1320
राग कल्याण
राग: कल्याण · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मेरे मन जपु जपि जगंनाथे ॥
गुर उपदेसि हरि नामु धिआइओ सभि किलबिख दुख लाथे ॥1॥ रहाउ ॥
रसना एक जसु गाइ न साकै बहु कीजै बहु रसुनथे ॥
बार बार खिनु पल सभि गावहि गुन कहि न सकहि प्रभ तुमनथे ॥1॥
हम बहु प्रीति लगी प्रभ सुआमी हम लोचह प्रभु दिखनथे ॥
तुम बड दाते जीअ जीअन के तुम जानहु हम बिरथे ॥2॥
कोई मारगु पंथु बतावै प्रभ का कहु तिन कउ किआ दिनथे ॥
सभु तनु मनु अरपउ अरपि अरापउ कोई मेलै प्रभ मिलथे ॥3॥
हरि के गुन बहुत बहुत बहु सोभा हम तुछ करि करि बरनथे ॥
हमरी मति वसगति प्रभ तुमरै जन नानक के प्रभ समरथे ॥4॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: हे मेरे मन ! जगत के नाथ (के नाम) का जाप जपा कर। (जिस मनुष्य ने) गुरू के उपदेश से परमात्मा का नाम सिमरा। उसके सारे पाप सारे दुख दूर हो गए। 1। रहाउ। हे प्रभू ! (मनुष्य की) एक जीभ (आपका) यश (पूरे तौर पर) गा नहीं सकती। (इसको) बहुत जीभों वाला बना दे। हे प्रभू ! सारे जीव बार-बार हरेक पल आपके गुण गाते हैं। पर आपके (सारे) गुण बयान नहीं कर सकते। 1। हे मेरे मालिक प्रभू ! मेरे अंदर आपके प्रति बहुत सारी प्रीति पैदा हैं चुकी है; मैं आपको देखने की तमन्ना रखता हूँ। हे प्रभू ! आप सारे जीवों को जिंद देने वाला है। आप ही हम जीवों के दिल की पीड़ा जानता है। 2। हे भाई ! अगर कोई (संत जन मुझे) प्रभू (के मिलाप) का रास्ता बता दे। तो ऐसे (संत-) जनों को क्या देना चाहिए। अगर प्रभू को मिला हुआ कोई प्यारा मुझे प्रभू से मिला दे तो मैं तो अपना सारा तन सारा मन सदा के लिए भेट कर दूँ। 3। हे भाई ! परमात्मा के गुण बहुत ही बेअंत हैं। बहुत बेअंत हैं। हम जीव बहुत ही कम बयान करते हैं (पर जीवों के वश की बात नहीं है)। हे दास नानक के समर्थ प्रभू ! हम जीवों की मति आपके वश में है (जितनी मति आप देता है उतनी ही आपकी शोभा हम बयान कर सकते हैं)। 4। 3।
कलिआन महला 4 ॥
मेरे मन जपि हरि गुन अकथ सुनथई ॥
धरमु अरथु सभु कामु मोखु है जन पीछै लगि फिरथई ॥1॥ रहाउ ॥
सो हरि हरि नामु धिआवै हरि जनु जिसु बडभाग मथई ॥
जह दरगहि प्रभु लेखा मागै तह छुटै नामु धिआइथई ॥1॥
हमरे दोख बहु जनम जनम के दुखु हउमै मैलु लगथई ॥
गुरि धारि क्रिपा हरि जलि नावाए सभ किलबिख पाप गथई ॥2॥
जन कै रिद अंतरि प्रभु सुआमी जन हरि हरि नामु भजथई ॥
जह अंती अउसरु आइ बनतु है तह राखै नामु साथई ॥3॥
जन तेरा जसु गावहि हरि हरि प्रभ हरि जपिओ जगंनथई ॥
जन नानक के प्रभ राखे सुआमी हम पाथर रखु बुडथई ॥4॥4॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: कलिआनु महला 4 ॥ हे मेरे मन ! उस परमात्मा के गुण याद किया कर जो अकथ सुना जा रहा है। धर्म अर्थ काम मोक्ष- (यही है) सारा (मनुष्य का उद्देश्य। पर इनमें से हरेक ही परमात्मा के) भगत के पीछे-पीछे लगा फिरता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य के माथे पर बड़े भाग्य (जाग उठते) हैं। वह भगत-जन परमात्मा का नाम सदा सिमरता है। जहाँ (अपनी) दरगाह में परमात्मा (मनुष्य के किए कर्मों का) लेखा माँगता है परमात्मा का नाम सिमर के ही वहाँ मनुष्य सुर्ख-रू होता है। 1। हम जीवों के (अंदर) अनेकों जनमों के ऐब इकठ्ठा हुए पड़े हैं। (हमारे अंदर) दुख (टिका रहता है)। अहंकार की मैल लगी रहती है। (जिन भाग्यवान को) गुरू ने मेहर कर कर हरि-नाम-जल में स्नान करा दिया। (उनके अंदर से) पापों विकारों की सारी (मैल) दूर हो गई । 2। हे भाई ! भगत-जनों के हृदय में मालिक-प्रभू बसा रहता है। भगत-जनों ने सदा परमात्मा का नाम जपा है। जहाँ आखिरी वक्त आ बनता है। वहाँ परमात्मा का नाम साथी (बन के) रक्षा करता है। 3। हे हरी ! (आपके) भगत आपका यश (सदा) गाते रहते हैं। हे जगत के नाथ प्रभू ! (आपके भक्तों ने) सदा आपका नाम जपा है। हे दास नानक के रखवाले मालिक प्रभू ! हम पत्थरों (की तरह) डूबते जीवों की रक्षा कर। 4। 4।
कलिआन महला 4 ॥
हमरी चितवनी हरि प्रभु जानै ॥
अउरु कोई निंद करै हरि जन की प्रभु ता का कहिआ इकु तिलु नही मानै ॥1॥ रहाउ ॥
अउर सभ तिआगि सेवा करि अचुत जो सभ ते ऊच ठाकुरु भगवानै ॥
हरि सेवा ते कालु जोहि न साकै चरनी आइ पवै हरि जानै ॥1॥
जा कउ राखि लेइ मेरा सुआमी ता कउ सुमति देइ पै कानै ॥
ता कउ कोई अपरि न साकै जा की भगति मेरा प्रभु मानै ॥2॥
हरि के चोज विडान देखु जन जो खोटा खरा इक निमख पछानै ॥
ता ते जन कउ अनदु भइआ है रिद सुध मिले खोटे पछुतानै ॥3॥
तुम हरि दाते समरथ सुआमी इकु मागउ तुझ पासहु हरि दानै ॥
जन नानक कउ हरि क्रिपा करि दीजै सद बसहि रिदै मोहि हरि चरानै ॥4॥5॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: कलिआनु महला 4 ॥ हे भाई ! हम जीवों की (हरेक) भावनी को परमात्मा (स्वयं) जानता है। अगर कोई और (निंदक मनुष्य) परमात्मा के भगत की निंदा करता हैं। परमात्मा उसका कहा हुआ (निंदा का वचन) रक्ती भर भी नहीं मानता। 1। रहाउ। हे भाई ! और हरेक (उम्मीद) छोड़ के उस अविनाशी परमात्मा की भक्ति किया कर। जो सब से ऊँचा मालिक भगवान है। हे भाई ! परमात्मा की सेवा-भक्ति की बरकति से आत्मिक मौत (भगत की ओर) देख भी नहीं सकती। वह तो भगत के चरणों में आ गिरती है (भगत के अधीन हो जाती है)। 1। हे भाई ! प्यारा मालिक-प्रभू जिस मनुष्य की रक्षा करता है। उसको प्यार से ध्यान से श्रेष्ठ मति बख्शता है। हे भाई ! परमात्मा जिस मनुष्य की भगती परवान कर लेता है। कोई और मनुष्य उसकी बराबरी नहीं कर सकता। 2। हे सज्जन ! देख। उस परमात्मा के करिश्मे बड़े हैरान करने वाले हैं जो आँख झपकने जितने समय में ही खोटे-खरे मनुष्य को पहचान लेता है। शुद्ध हृदय वाले मनुष्य उसको मिल जाते हैं। खोटे मनुष्य पछताते ही रह जाते हैं। तभी भगत के अंदर आनंद बना रहता है (क्योंकि भगत को प्रभू अपने चरणों में जोड़े रखता है)। 3। हे हरी ! आप सभ दातें देने वाले सभ ताकतों के मालिक हैं। हे हरी ! मैं आपसे एक ख़ैर माँगता हूँ। मेहर करके (अपने) दास नानक को (यह दान) दे कि। हे हरी ! आपके चरण मेरे हृदय में सदा बसते रहें। 4। 5।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे मन ! जगत के नाथ (के नाम) का जाप जपा कर।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।