कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! मैं तो पहले जन्मों में भी आपका ही सेवक रहा हूँ। अब भी आपके दर से हटा नहीं जा सकता। आपके दर पर रहने से (मनुष्य के अंदर) अडोल अवस्था की रौंअ (चल पड़ती है। वह रौंअ) मुझे भी प्राप्त हो गई है। 2। जिनके माथे पर मालिक का (ये भक्ति का) निशान होता है। वे रण-भूमि में लड़ मरते हैं। जो इस निशान से वंचित हैं वह (मुकाबला होने पर) भांझ खा जाते हैं। जो मनुष्य प्रभू का भक्त बनता है। वही भक्ति से सांझ डालता है और प्रभू उसको अपने दर पर प्रवान कर लेता है। 3। (मनुष्य का शरीर। जैसे। एक छोटा सा कोठा है। इस) छोटे से सुंदर कोठे में (दिमाग। बुद्धि एक और) छोटी सी कोठरी है। परमात्मा के नाम के विचार की बरकति सेये छोटी सी कोठरी और भी सुंदर बनती जाती है। मुझ कबीर को मेरे गुरू ने नाम-वस्तु दी (और। कहने लगे) ये वस्तु (एक छोटी सी कोठड़ी में) संभाल के रख ले। 4। मैं कबीर ने ये नाम-वस्तु जगत के लोगों को (भी बाँट) दी। पर किसी भाग्यशाली ने (ही) हासिल की। जिस किसी ने इस नाम-अमृत का स्वाद चखा है। वह सदा के लिए भाग्यशाली हो गया है। 5। 4।
जिह मुख बेदु गाइत्री निकसै सो किउ ब्रहमनु बिसरु करै ॥ जा कै पाइ जगतु सभु लागै सो किउ पंडितु हरि न कहै ॥1॥ काहे मेरे बाम॑न हरि न कहहि ॥ रामु न बोलहि पाडे दोजकु भरहि ॥1॥ रहाउ ॥ आपन ऊच नीच घरि भोजनु हठे करम करि उदरु भरहि ॥ चउदस अमावस रचि रचि मांगहि कर दीपकु लै कूपि परहि ॥2॥ तूं ब्रहमनु मै कासीक जुलहा मुहि तोहि बराबरी कैसे कै बनहि ॥ हमरे राम नाम कहि उबरे बेद भरोसे पांडे डूबि मरहि ॥3॥5॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: ब्राह्मण उस प्रभू को क्यों बिसारता है। जिसके मुँह में से वेद और गयात्री (आदि) निकले (ऐसा आप मानता) है। पण्डित उस परमात्मा को क्यों नहीं सिमरता। जिसके चरणों पर सारा संसार पड़ता है। 1। हे मेरे ब्राह्मण ! आप परमात्मा का नाम क्यों नहीं सिमरता। हे पंडित ! आप राम नहीं बोलता। और दोज़क (नर्क का दुख) सह रहा है। 1। रहाउ। हे ब्राह्मण ! आप अपने आप को ऊँची कुल का (समझता है)। पर भोजन पाता है (अपने से) नीची कुल वाले घरों में से। आप हठ वाले कर्म करके (और लोगों को दिखा-दिखा के) अपना पेट पालता है। चौदवीं और अमावस्या (आदि तिथियाँ बनावटी) बना-बना के आप (जजमानों से) माँगता है; आप (अपने आप को विद्वान समझता है पर यह विद्या-रूप) दीया हाथों पर रख कर (भी) कूँएं में गिर रहा है। 2। आप (अपने आप को ऊँची कुल का) ब्राहमण (समझता है)। मैं (आपकी नजरों में) काशी का (गरीब) जुलाहा हूँ। सो। मेरी आपकी बराबरी कैसे हैं सकती है। (भाव। आप मेरी बात अपने गुमान के कारण सुनने को तैयार नहीं हैं सकता)। पर हम (जुलाहे तो) परमात्मा का नाम सिमर के (संसार-समुंद्र से) बच रहे हैं। और तुम। हे पांडे ! वेदों के (बताए हुए कर्म-काण्ड के) भरोसे रह के ही डूब के मर रहे हैं। 3। 5।
तरवरु एकु अनंत डार साखा पुहप पत्र रस भरीआ ॥ इह अंम्रित की बाड़ी है रे तिनि हरि पूरै करीआ ॥1॥ जानी जानी रे राजा राम की कहानी ॥ अंतरि जोति राम परगासा गुरमुखि बिरलै जानी ॥1॥ रहाउ ॥ भवरु एकु पुहप रस बीधा बारह ले उर धरिआ ॥ सोरह मधे पवनु झकोरिआ आकासे फरु फरिआ ॥2॥ सहज सुंनि इकु बिरवा उपजिआ धरती जलहरु सोखिआ ॥ कहि कबीर हउ ता का सेवकु जिनि इहु बिरवा देखिआ ॥3॥6॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: (गुरू के सन्मुख हुए ऐसे मनुष्य को ये समझ आ जाती है कि) संसार एक वृक्ष (के समान) है। (जगत के जीव-जंतु। मानो। उस वृक्ष की) बेअंत डालियाँ और टहनियाँ हैं। जो फूलों। पक्तों और रस भरे फलों से लदी हुई हैं। ये संसार अमृत की एक बागीची है। जो उस पूर्ण परमात्मा ने बनाई है। 1। हे भाई ! जो कोई मनुष्य अपने आप को गुरू के हवाले करता है। वह प्रकाश-रूप परमात्मा के मेल की अवस्था को समझ लेता है। उसके अंदर ज्योति जग उठती है। उसके अंदर राम का प्रकाश हो जाता है। पर इस अवस्था से जान-पहचान करने वाला होता कोई विरला ही है। 1। रहाउ। (जैसे) एक भौरा फूल के रस में मस्त हो के फूल की खिली हुई पंखुड़ियों में अपने आप को जा बँधाता है। (जैसे कोई पक्षी अपने पंखों से) हवा को हिलौरे दे के आकाश में उड़ता है। वैसे ही वह गुरमुखि नाम-रस में मस्त हो के पूर्ण-खिलाव को हृदय में टिकाता है। और सोच-मण्डल में हिलौरे दे के प्रभू-चरणों में उड़ानें भरता है। 2। उस गुरमुखि की उस अडोल और अफुर अवस्था में उसके अंदर (कोमलता-रूप) मानो। एक कोमल पौधा उगता है। जो उसके शरीर की तृष्णा को सुखा देता है। कबीर कहता है- मैं उस गुरमुख का दास हूँ। जिसने (अपने अंदर उगा हुआ) ये कोमल पौधा देखा है। 3। 6।
मुंद्रा मोनि दइआ करि झोली पत्र का करहु बीचारु रे ॥ खिंथा इहु तनु सीअउ अपना नामु करउ आधारु रे ॥1॥ ऐसा जोगु कमावहु जोगी ॥ जप तप संजमु गुरमुखि भोगी ॥1॥ रहाउ ॥ बुधि बिभूति चढावउ अपुनी सिंगी सुरति मिलाई ॥ करि बैरागु फिरउ तनि नगरी मन की किंगुरी बजाई ॥2॥ पंच ततु लै हिरदै राखहु रहै निरालम ताड़ी ॥ कहतु कबीरु सुनहु रे संतहु धरमु दइआ करि बाड़ी ॥3॥7॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे जोगी ! (मन को विकारों की ओर से) शांति (देनी। ये कानों की) मुंद्रा बना। और (प्रभू के गुणों की) विचार को खप्पर बना। (मैं भी आपकी ही तरह एक जोगी हूँ। पर) मैं अपने शरीर को विकारों से बचाता हूँ। ये मैंने गोदड़ी सिली हुई है। जोगी ! मैंने प्रभू के नाम को (अपनी जिंद का) आसरा बनाया हुआ है (ये मेरा राख विभूति का बटूआ है)। 1। बस ! यही योगाभ्यास करो। हे जोगी ! गृहस्त में रहते हुए ही सतिगुरू के सन्मुख रहो। गुरू के बताए हुए मार्ग पर चलना ही जप है। यही तप है। और यही संजम है।1। रहाउ। (हे जोगी !) अपनी बुद्धि को मैं (ऊँचे ठिकाने प्रभू चरणों में) चढ़ाए रखता हूँ। ये मैंने (शरीर पर) राख मली हुई है; मैंने अपने मन की सुरति को (प्रभू चरणों में) जोड़ा है। ये मेरी सिंज्ञी है। माया की ओर से वैराग करके मैं भी (साधू बन के) फिरता हूँ। पर मैं अपने ही शरीर रूप नगर में फिरता हूँ (भाव। खोज करता हूँ); मैं अपने मन की ही किंगरी बजाता हूँ (भाव। मन में प्रभू की लगन लगाए रखता हूँ)। 2। (हे जोगी !) प्रभू को अपने हृदय में परोए रखो। इस तरह की समाधि एक-टक बनी रहती है। कबीर कहता है- हे संत जनो ! सुनो। (प्रभू-चरणों में जुड़ के) धर्म और दया की (अपने) मन में सुंदर सी बगीची बनाओ। 3। 7।
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: कौन से कामों के लिए हम जगत में पैदा हुए। जनम ले के हमने क्या कमाया। हमने एक पल भर के लिए भी (उस प्रभू के चरणों में) चित्त नहीं जोड़ा जो संसार-समुंद्र से तैराने के लिए जहाज़ है। जो। मानो। मन-इच्छित फल देने वाला हीरा है। 1।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! मैं तो पहले जन्मों में भी आपका ही सेवक रहा हूँ।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।