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अंग 928 · रामकली

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अंग
928
रामकली
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  1. सुंदरु सुघड़ु सुजाणु बेता गुण गोविंद अमुलिआ ॥
  2. साधसंगति बिनु भ्रमि मुई करती करम अनेक ॥
  3. ग्रीखम रुति अति गाखड़ी जेठ अखाड़ै घाम जीउ ॥
  4. सरधा लागी संगि प्रीतमै इकु तिलु रहणु न जाइ ॥
  5. रुति बरसु सुहेलीआ सावण भादवे आनंद जीउ ॥
  6. आस पिआसी मै फिरउ कब पेखउ गोपाल ॥
  7. रुति सरद अडंबरो असू कतके हरि पिआस जीउ ॥
  8. जलणि बुझी सीतल भए मनि तनि उपजी सांति ॥

गुरु अर्जन देव जी · छंत · राग रामकली

सुंदरु सुघड़ु सुजाणु बेता गुण गोविंद अमुलिआ ॥

अंग 927 से चला आ रहा अंश

सुंदरु सुघड़ु सुजाणु बेता गुण गोविंद अमुलिआ ॥
वडभागि पाइआ दुखु गवाइआ भई पूरन आस जीउ ॥
बिनवंति नानक सरणि तेरी मिटी जम की त्रास जीउ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: हे सहेलिए! वह प्रभू सुंदर है। सोहना है, सुजान है। (सबके दिल की) जानने वाला है। उस गोबिंद के गुण किसी मूल्य पर नहीं मिल सकते। हे सहेलियो! जिस जीव-स्त्री ने अच्छी किस्मत से उसका मिलाप प्राप्त कर लिया। उसने अपना सारा दुख दूर कर लिया। उसकी हरेक आस पूरी हो गई। नानक (भी उसके दर पर) विनती करता है (और कहता है: हे प्रभू! जो भी जीव) आपकी शरण आ गया। (उसके दिल से) मौत का सहम दूर हो गया। 2।

गुरु अर्जन देव जी · सलोक · राग रामकली

साधसंगति बिनु भ्रमि मुई करती करम अनेक ॥

सलोक ॥
साधसंगति बिनु भ्रमि मुई करती करम अनेक ॥
कोमल बंधन बाधीआ नानक करमहि लेख ॥1॥
जो भाणे से मेलिआ विछोड़े भी आपि ॥
नानक प्रभ सरणागती जा का वड परतापु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे नानक! गुरू की संगत से वंचित रह के और ही कर्म करती हुई जीव-स्त्री (माया के मोह में) भटक-भटक के आत्मिक मौत सहेड़ लेती है। अपने किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार वह जीव-स्त्री माया के मोह की कोमल जंजीरों में बँधी रहती है। 1। हे नानक! जो जीव प्रभू को अच्छे लगने लग जाते हैं। उनको वह अपने चरणों में जोड़ लेता है। (अपने चरणों से) बिछोड़ा भी खुद ही करवाता है। (इसलिए, हे भाई!) उस प्रभू की शरण पड़े रहना चाहिए जिसका बहुत बड़ा तेज-प्रताप है। 2।

गुरु अर्जन देव जी · छंत · राग रामकली

ग्रीखम रुति अति गाखड़ी जेठ अखाड़ै घाम जीउ ॥

छंतु ॥
ग्रीखम रुति अति गाखड़ी जेठ अखाड़ै घाम जीउ ॥
प्रेम बिछोहु दुहागणी द्रिसटि न करी राम जीउ ॥
नह द्रिसटि आवै मरत हावै महा गारबि मुठीआ ॥
जल बाझु मछुली तड़फड़ावै संगि माइआ रुठीआ ॥
करि पाप जोनी भै भीत होई देइ सासन जाम जीउ ॥
बिनवंति नानक ओट तेरी राखु पूरन काम जीउ ॥3॥

हिन्दी अर्थ: छंत। (हे सहेलिए! जैसे) गर्मी की ऋतु बहुत ही करड़ी होती है। जेठ-हाड़ में बड़ी धूप पड़ती है (इस ऋतु में जीव-जंतु बहुत तंग होते हैं। उसी तरह जिस) दुर्भाग्यपूर्ण जीव-स्त्री की ओर प्रभू-पति निगाह नहीं करते उसे प्रेम की अनुभूति की अनुपस्थिति जलाती है। जिस जीव-स्त्री को प्रभू-पति नहीं दिखता। वह हाहुके ले ले के मरती रहती है। (माया के) अहंकार में वह अपना आत्मिक जीवन लुटा बैठती है। माया के मोह में फसी हुई वह प्रभू-पति से रूठी रहती है (और ऐसे तड़पती रहती है। जैसे) पानी के बिना मछली तड़पती है। (हे सहेली! जो जीव-स्त्री) पाप कर-कर के घबराई रहती है। उसको जमराज सदा सजा देता है। नानक विनती करता है: हे सब की मनो कामना पूरी करने वाले! मैं आपकी शरण आया हूँ (मुझे अपने चरणों में जोड़े रखें)। 3।

गुरु अर्जन देव जी · सलोक · राग रामकली

सरधा लागी संगि प्रीतमै इकु तिलु रहणु न जाइ ॥

सलोक ॥
सरधा लागी संगि प्रीतमै इकु तिलु रहणु न जाइ ॥
मन तन अंतरि रवि रहे नानक सहजि सुभाइ ॥1॥
करु गहि लीनी साजनहि जनम जनम के मीत ॥
चरनह दासी करि लई नानक प्रभ हित चीत ॥2॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे नानक! (जिस जीव-स्त्री के हृदय में अपने) प्रीतम-प्रभू के साथ प्यार बनता है। वह उस (प्रीतम के बिना) रक्ती जितने समय के लिए भी नहीं रह सकती। बिना किसी विशेष प्रयास के ही उसके मन में वह प्रीतम हर वक्त टिका रहता है। 1। हे नानक! अनेकों जन्मों से चले आ रहे मित्र सज्जन-प्रभू ने (जिस जीव-स्त्री का) हाथ पकड़ के (उसको अपना) बना लिया। उसको अपना हार्दिक प्यार दे के उसको अपने चरणों की दासी बना लिया। 2।

गुरु अर्जन देव जी · छंत · राग रामकली

रुति बरसु सुहेलीआ सावण भादवे आनंद जीउ ॥

छंतु ॥
रुति बरसु सुहेलीआ सावण भादवे आनंद जीउ ॥
घण उनवि वुठे जल थल पूरिआ मकरंद जीउ ॥
प्रभु पूरि रहिआ सरब ठाई हरि नाम नव निधि ग्रिह भरे ॥
सिमरि सुआमी अंतरजामी कुल समूहा सभि तरे ॥
प्रिअ रंगि जागे नह छिद्र लागे क्रिपालु सद बखसिंदु जीउ ॥
बिनवंति नानक हरि कंतु पाइआ सदा मनि भावंदु जीउ ॥4॥

हिन्दी अर्थ: छंतु। (हे सहेलिए! जैसे) बरखा ऋतु बड़ी सुखदाई होती है। सावन-भादरों के महीनों में (बरखा के कारण) बड़ी मौजें बनी रहती हैं। बादल झुक-झुक के बरसते हैं। तालाबों-छप्पड़ों में। धरती के गड्ढों में हर जगह सुगंधि भरा पानी ही भर जाता है। (वैसे ही जिनके हृदय-) घर परमात्मा के नाम के नौ खजानों से नाको-नाक भर जाते हैं। उनको परमात्मा सब जगह दिखाई देने लग जाता है। सबके दिल की जानने वाले परमात्मा का नाम सिमर के उनकी सारी ही कुलें पार लांघ जाती हैं। हे सहेलिए! जो वडभागी प्यारे प्रभू के प्रेम-रंग में (टिक के माया के मोह के हमलों की ओर से) सचेत हो जाते हैं। उन्हें विकारों के कोई दाग़ नहीं लगते। दया का घर प्रभू सदा ही उन पर प्रसन्न रहता है। नानक विनती करता है: हे सहेलिए! उन्हें मन में सदा प्यारा लगने वाला पति-प्रभू मिल जाता है। 4।

गुरु अर्जन देव जी · सलोक · राग रामकली

आस पिआसी मै फिरउ कब पेखउ गोपाल ॥

सलोक ॥
आस पिआसी मै फिरउ कब पेखउ गोपाल ॥
है कोई साजनु संत जनु नानक प्रभ मेलणहार ॥1॥
बिनु मिलबे सांति न ऊपजै तिलु पलु रहणु न जाइ ॥
हरि साधह सरणागती नानक आस पुजाइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक। हे नानक! (कहें: प्रभू के दर्शनों की) आस (रख के) दर्शनों की तमन्ना से मैं (तलाश करती) फिरती हूँ कि कब मैं गोपाल प्रभू के दर्शन कर सकूँ। (मैं तलाशती हूं कि) कोई सज्जन संत जन मुझे मिल जाए जो मुझे प्रभू से मिलाने की समर्थता रखता हैं। 1। हे नानक! (कहें: परमात्मा को) मिले बिना (हृदय में) ठंड नहीं पड़ती। रक्ती भर समय के लिए भी (शांति से) रहा नहीं जा सकता। प्रभू के संत-जनों की शरण पड़ने से (कोई ना कोई गुरमुख दर्शनों की) आस पूरी कर (ही) देता है। 2।

गुरु अर्जन देव जी · छंत · राग रामकली

रुति सरद अडंबरो असू कतके हरि पिआस जीउ ॥

छंतु ॥
रुति सरद अडंबरो असू कतके हरि पिआस जीउ ॥
खोजंती दरसनु फिरत कब मिलीऐ गुणतास जीउ ॥
बिनु कंत पिआरे नह सूख सारे हार कंङण ध्रिगु बना ॥
सुंदरि सुजाणि चतुरि बेती सास बिनु जैसे तना ॥
ईत उत दह दिस अलोकन मनि मिलन की प्रभ पिआस जीउ ॥
बिनवंति नानक धारि किरपा मेलहु प्रभ गुणतास जीउ ॥5॥

हिन्दी अर्थ: छंतु। (हे सहेलिए! जब) असू-कार्तिक में मीठी-मीठी ऋतु का आरम्भ होता है, (तब हृदय में) प्रभू (के मिलाप) की चाहत उपजती है। (जिस जीव-स्त्री के भीतर ये बिरह की अवस्था पैदा होती है। वह) दीदार करने के लिए तलाश करती-फिरती है कि गुणों के खजाने प्रभू के साथ कब मेल हो। नानक विनती करता है: (हे सहेलिए!) प्यारे पति (के मिलाप) के बिना (उसके मिलाप के) सुख की समझ नहीं पड़ सकती। हार-कंगन (आदि श्रृंगार बल्कि) दुखदाई लगते हैं। स्त्री सुंदर हो। समझदार हो, चतुर हो, विद्यावती हो (पति के मिलाप के बिना ऐसे ही है। जैसे) सांस आए बिना शरीर। (यही हाल होता है जीव-स्त्री का। जो प्रभू-मिलाप से वंचित रहे) इधर-उधर। दसों दिशाओं में देख-भाल करती है। उसके मन में प्रभू को मिलने की तमन्ना बनी रहती है। (वह संत जनों के आगे विनती करती रहती है: हे संत जनो!) कृपा करके मुझे गुणों के खजाने प्रभू से मिला दें। 5।

गुरु अर्जन देव जी · सलोक · राग रामकली

जलणि बुझी सीतल भए मनि तनि उपजी सांति ॥

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सलोक ॥
जलणि बुझी सीतल भए मनि तनि उपजी सांति ॥
नानक प्रभ पूरन मिले दुतीआ बिनसी भ्रांति ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे नानक! (जिन मनुष्यों को) पूर्ण प्रभू जी मिल गए (उनके अंदर से) और (किसी तथाकथित शक्तियों की) तरफ की भटकना दूर हो गई; (उनके अंदर से) तृष्णा की आग बुझ गई। (उनके हृदय) ठंडे-ठार हो गए। (उनके) मन में (उनके) तन में शांति पैदा हो गई। 1। हे नानक! पूर्ण प्रभु मिल गया है, जिससे द्वैतभाव एवं भ्रांति नाश हो गई है॥ 1॥

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 928 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 928 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।