राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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इक ओट कीजै जीउ दीजै आस इक धरणीधरै ॥ साधसंगे हरि नाम रंगे संसारु सागरु सभु तरै ॥ जनम मरण बिकार छूटे फिरि न लागै दागु जीउ ॥ बलि जाइ नानकु पुरख पूरन थिरु जा का सोहागु जीउ ॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! सिर्फ एक परमात्मा का आसरा लेना चाहिए। अपना आप उसके हवाले कर देना चाहिए। सारी सृष्टि के आसरे उस प्रभू की ही आस रखनी चाहिए। जो मनुष्य गुरू की संगत में रह के परमात्मा के नाम के प्यार में टिका रहता है। वह मनुष्य संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। उस मनुष्य के जनम-मरण के चक्कर। उसके पिछले किए हुए सारे कुकर्म खत्म हो जाते हैं। दोबारा कभी उसको विकारों का दाग नहीं लगता। हे भाई ! जिस परमात्मा का पति वाला सहारा सदा (जीवों के सिर पर) कायम रहता है। नानक उस सर्व-गुण-भरपूर सर्व-व्यापक प्रभू से बलिहार जाता है। 3।
सलोकु ॥ धरम अरथ अरु काम मोख मुकति पदारथ नाथ ॥ सगल मनोरथ पूरिआ नानक लिखिआ माथ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक। धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष रूपी मुक्ति पदार्थ ईश्वर देने वाला है। हे नानक ! जिसके माथे पर कर्मालेख लिखा होता है, उसके सब मनोरथ पूरे हो जाते हैं।॥ 1॥
छंतु ॥ सगल इछ मेरी पुंनीआ मिलिआ निरंजन राइ जीउ ॥ अनदु भइआ वडभागीहो ग्रिहि प्रगटे प्रभ आइ जीउ ॥ ग्रिहि लाल आए पुरबि कमाए ता की उपमा किआ गणा ॥ बेअंत पूरन सुख सहज दाता कवन रसना गुण भणा ॥ आपे मिलाए गहि कंठि लाए तिसु बिना नही जाइ जीउ ॥ बलि जाइ नानकु सदा करते सभ महि रहिआ समाइ जीउ ॥4॥4॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: छंद ॥ हे भाई ! निर्लिप प्रभू पातशाह (जब से) मुझे मिला है। मेरी सारी मुरादें पूरी हो गई हैं। हे अति भाग्यशाली सज्जनो ! जिस मनुष्य के हृदय-गृह में प्रभू जी आ बसते हैं। उसके अंदर आत्मिक आनंद बना रहता है। पर। हे भाई ! उसी के हृदय-गृह में सोहाना पातशाह आ के बसता है जिसने पूर्बले जनम में नेक कर्म कमाए होते हैं। मैं उस प्रभू की कोई उपमा कहने योग्य नहीं हूँ। वह बेअंत है। सारे गुणों से भरपूर है। आत्मिक अडोलता के आनंद बख्शने वाला है। मैं अपनी जीभ से उसके कौन-कौन से गुण बयान करूँ। हे भाई ! वह स्वयं ही (किसी भाग्यशाली को अपने चरणों में) जोड़ता है। उसको पकड़ के अपने गले से लगाता है। हे भाई ! उस प्रभू के बिना कोई और (मेरा) सहारा नहीं। नानक सदा उस करतार से बलिहार जाता है। वह सब जीवों में व्यापक है। 4। 4।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: रागु रामकली महला 5 ॥ हे सहेलिहो ! हे सत्संगियो ! एक परमात्मा का ध्यान धरो; प्रभू की सिफत सालाह का (वह) सुंदर गीत गाओ (जिसकी बरकति से विकारों का मुकाबला कर सको)। हे सहेलियो ! गुरू की शरण पड़ो। (इस तरह विकारों के मुकाबले में जीत प्राप्त करने का यह) मन-इच्छित फल प्राप्त कर लोगी।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 रुती सलोकु सतिगुर प्रसादि ॥ हे नानक ! (कह- हे भाई !) पारब्रहम प्रभू को नमस्कार करके मैं (उसके दर से) संत-जनों के चरणों की धूड़ माँगता हूँ। और स्वै भाव दूर करके मैं उस सर्व-व्यापक प्रभू का नाम जपता हूँ। 1। प्रभू पातशाह सारे पाप काटने वाला है। सारे डर दूर करने वाला है। सुखों का समुंद्र है। गरीबों पर दया करने वाला है। (गरीबों के) दुख नाश करने वाला है। हे नानक ! उसको सदा सिमरते रहो। 2।
छंतु ॥ जसु गावहु वडभागीहो करि किरपा भगवंत जीउ ॥ रुती माह मूरत घड़ी गुण उचरत सोभावंत जीउ ॥ गुण रंगि राते धंनि ते जन जिनी इक मनि धिआइआ ॥ सफल जनमु भइआ तिन का जिनी सो प्रभु पाइआ ॥ पुंन दान न तुलि किरिआ हरि सरब पापा हंत जीउ ॥ बिनवंति नानक सिमरि जीवा जनम मरण रहंत जीउ ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: छंतु। हे अति भाग्यशालियो ! परमात्मा की सिफतसालाह के गीत गाते रहा करो। हे भगवान ! (मेरे पर) मेहर कर (मैं भी) आपका यश गाता रहूँ। हे भाई ! जो ऋतुएं। जो महूरत। जो घड़ियाँ परमात्मा के गुण उचारते हुए बीतें। वह समय शोभा वाले होते हैं। हे भाई ! जो लोग परमात्मा के गुणों के प्यार-रंग में रंगे रहते हैं। जिन लोगों ने एक-मन हो परमात्मा का सिमरन किया है। वे लोग भाग्यशाली हैं। हे भाई ! (सिमरन की बरकति से) जिन्होंने परमात्मा का मिलाप हासिल कर लिया है उनका मानस जीवन कामयाब हो गया है। हे भाई ! परमात्मा (का नाम) सारे पापों को नाश करने वाला है। कोई पुन्य-दान। कोई धार्मिक कर्म हरि-नाम सिमरन के बराबर नहीं। नानक विनती करता है- हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमर के मैं आत्मिक जीवन प्राप्त करता हूँ। (सिमरन की बरकति से) जनम-मरन (के चक्कर) समाप्त हो जाते हैं। 1।
सलोक ॥ उदमु अगमु अगोचरो चरन कमल नमसकार ॥ कथनी सा तुधु भावसी नानक नाम अधार ॥1॥ संत सरणि साजन परहु सुआमी सिमरि अनंत ॥ सूके ते हरिआ थीआ नानक जपि भगवंत ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: श्लोक। हे प्रभू ! आप उद्यम-स्वरूप है (आपके में रक्ती भर भी आलस नहीं है)। आप अपहुँच है। ज्ञान-इन्द्रियों की आपके तक पहुँच नहीं। मैं आपके सुंदर चरणों को नमस्कार करता हूँ। हे प्रभू ! (मेहर कर) मैं (सदा) वह बोल बोलूँ जो आपको अच्छे लगें। आपका नाम ही नानक का आसरा बना रहे। 1। हे नानक ! (कह-) हे सज्जनो ! गुरू संत की शरण पड़े रहो। (गुरू के द्वारा) बेअंत मालिक प्रभू को सिमर के। भगवान का नाम जप के (मनुष्य) सूखे से हरा हो जाता है। 2।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: छंतु। उसको बसंत की ऋतु आनंदमयी प्रतीत होती है। उसके लिए महीना चेत उसके लिए वैसाख महीना सुखों से भरपूर हो जाता है। (हे सज्जनो ! जिस मनुष्य को) पति-प्रभू मिल जाता है। उसका मन उसका तन उसकी (हरेक) सांस खुशी सें महक उठती है। हे सहेलिए ! जिस जीव-स्त्री के हृदय में प्रभू-पति के सुंदर चरण आ बसें। उसका हृदय खिल उठता है। जिसके हृदय-गृह में सदा कायम रहने वाला प्रभू-पति आ बसे। वहाँ सदा आनंद बना रहता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! सिर्फ एक परमात्मा का आसरा लेना चाहिए।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।