अंग
927
रामकली
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इक ओट कीजै जीउ दीजै आस इक धरणीधरै ॥
इक ओट कीजै जीउ दीजै आस इक धरणीधरै ॥
साधसंगे हरि नाम रंगे संसारु सागरु सभु तरै ॥
जनम मरण बिकार छूटे फिरि न लागै दागु जीउ ॥
बलि जाइ नानकु पुरख पूरन थिरु जा का सोहागु जीउ ॥3॥
साधसंगे हरि नाम रंगे संसारु सागरु सभु तरै ॥
जनम मरण बिकार छूटे फिरि न लागै दागु जीउ ॥
बलि जाइ नानकु पुरख पूरन थिरु जा का सोहागु जीउ ॥3॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! सिर्फ एक परमात्मा का आसरा लेना चाहिए। अपना आप उसके हवाले कर देना चाहिए। सारी सृष्टि के आसरे उस प्रभू की ही आस रखनी चाहिए। जो मनुष्य गुरू की संगत में रह के परमात्मा के नाम के प्यार में टिका रहता है। वह मनुष्य संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। उस मनुष्य के जनम-मरण के चक्कर। उसके पिछले किए हुए सारे कुकर्म खत्म हो जाते हैं। दोबारा कभी उसको विकारों का दाग नहीं लगता। हे भाई ! जिस परमात्मा का पति वाला सहारा सदा (जीवों के सिर पर) कायम रहता है। नानक उस सर्व-गुण-भरपूर सर्व-व्यापक प्रभू से बलिहार जाता है। 3।
धरम अरथ अरु काम मोख मुकति पदारथ नाथ ॥
सलोकु ॥
धरम अरथ अरु काम मोख मुकति पदारथ नाथ ॥
सगल मनोरथ पूरिआ नानक लिखिआ माथ ॥1॥
धरम अरथ अरु काम मोख मुकति पदारथ नाथ ॥
सगल मनोरथ पूरिआ नानक लिखिआ माथ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक। धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष रूपी मुक्ति पदार्थ ईश्वर देने वाला है। हे नानक ! जिसके माथे पर कर्मालेख लिखा होता है, उसके सब मनोरथ पूरे हो जाते हैं।॥ 1॥
छंतु ॥
छंतु ॥
सगल इछ मेरी पुंनीआ मिलिआ निरंजन राइ जीउ ॥
अनदु भइआ वडभागीहो ग्रिहि प्रगटे प्रभ आइ जीउ ॥
ग्रिहि लाल आए पुरबि कमाए ता की उपमा किआ गणा ॥
बेअंत पूरन सुख सहज दाता कवन रसना गुण भणा ॥
आपे मिलाए गहि कंठि लाए तिसु बिना नही जाइ जीउ ॥
बलि जाइ नानकु सदा करते सभ महि रहिआ समाइ जीउ ॥4॥4॥
सगल इछ मेरी पुंनीआ मिलिआ निरंजन राइ जीउ ॥
अनदु भइआ वडभागीहो ग्रिहि प्रगटे प्रभ आइ जीउ ॥
ग्रिहि लाल आए पुरबि कमाए ता की उपमा किआ गणा ॥
बेअंत पूरन सुख सहज दाता कवन रसना गुण भणा ॥
आपे मिलाए गहि कंठि लाए तिसु बिना नही जाइ जीउ ॥
बलि जाइ नानकु सदा करते सभ महि रहिआ समाइ जीउ ॥4॥4॥
हिन्दी अर्थ: छंद ॥ हे भाई ! निर्लिप प्रभू पातशाह (जब से) मुझे मिला है। मेरी सारी मुरादें पूरी हो गई हैं। हे अति भाग्यशाली सज्जनो ! जिस मनुष्य के हृदय-गृह में प्रभू जी आ बसते हैं। उसके अंदर आत्मिक आनंद बना रहता है। पर। हे भाई ! उसी के हृदय-गृह में सोहाना पातशाह आ के बसता है जिसने पूर्बले जनम में नेक कर्म कमाए होते हैं। मैं उस प्रभू की कोई उपमा कहने योग्य नहीं हूँ। वह बेअंत है। सारे गुणों से भरपूर है। आत्मिक अडोलता के आनंद बख्शने वाला है। मैं अपनी जीभ से उसके कौन-कौन से गुण बयान करूँ। हे भाई ! वह स्वयं ही (किसी भाग्यशाली को अपने चरणों में) जोड़ता है। उसको पकड़ के अपने गले से लगाता है। हे भाई ! उस प्रभू के बिना कोई और (मेरा) सहारा नहीं। नानक सदा उस करतार से बलिहार जाता है। वह सब जीवों में व्यापक है। 4। 4।
रण झुंझनड़ा गाउ सखी हरि एकु धिआवहु ॥
रागु रामकली महला 5 ॥
रण झुंझनड़ा गाउ सखी हरि एकु धिआवहु ॥
सतिगुरु तुम सेवि सखी मनि चिंदिअड़ा फलु पावहु ॥
रण झुंझनड़ा गाउ सखी हरि एकु धिआवहु ॥
सतिगुरु तुम सेवि सखी मनि चिंदिअड़ा फलु पावहु ॥
हिन्दी अर्थ: रागु रामकली महला 5 ॥ हे सहेलिहो ! हे सत्संगियो ! एक परमात्मा का ध्यान धरो; प्रभू की सिफत सालाह का (वह) सुंदर गीत गाओ (जिसकी बरकति से विकारों का मुकाबला कर सको)। हे सहेलियो ! गुरू की शरण पड़ो। (इस तरह विकारों के मुकाबले में जीत प्राप्त करने का यह) मन-इच्छित फल प्राप्त कर लोगी।
करि बंदन प्रभ पारब्रहम बाछउ साधह धूरि ॥
रामकली महला 5 रुती सलोकु
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करि बंदन प्रभ पारब्रहम बाछउ साधह धूरि ॥
आपु निवारि हरि हरि भजउ नानक प्रभ भरपूरि ॥1॥
किलविख काटण भै हरण सुख सागर हरि राइ ॥
दीन दइआल दुख भंजनो नानक नीत धिआइ ॥2॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करि बंदन प्रभ पारब्रहम बाछउ साधह धूरि ॥
आपु निवारि हरि हरि भजउ नानक प्रभ भरपूरि ॥1॥
किलविख काटण भै हरण सुख सागर हरि राइ ॥
दीन दइआल दुख भंजनो नानक नीत धिआइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 रुती सलोकु सतिगुर प्रसादि ॥ हे नानक ! (कह- हे भाई !) पारब्रहम प्रभू को नमस्कार करके मैं (उसके दर से) संत-जनों के चरणों की धूड़ माँगता हूँ। और स्वै भाव दूर करके मैं उस सर्व-व्यापक प्रभू का नाम जपता हूँ। 1। प्रभू पातशाह सारे पाप काटने वाला है। सारे डर दूर करने वाला है। सुखों का समुंद्र है। गरीबों पर दया करने वाला है। (गरीबों के) दुख नाश करने वाला है। हे नानक ! उसको सदा सिमरते रहो। 2।
छंतु ॥
छंतु ॥
जसु गावहु वडभागीहो करि किरपा भगवंत जीउ ॥
रुती माह मूरत घड़ी गुण उचरत सोभावंत जीउ ॥
गुण रंगि राते धंनि ते जन जिनी इक मनि धिआइआ ॥
सफल जनमु भइआ तिन का जिनी सो प्रभु पाइआ ॥
पुंन दान न तुलि किरिआ हरि सरब पापा हंत जीउ ॥
बिनवंति नानक सिमरि जीवा जनम मरण रहंत जीउ ॥1॥
जसु गावहु वडभागीहो करि किरपा भगवंत जीउ ॥
रुती माह मूरत घड़ी गुण उचरत सोभावंत जीउ ॥
गुण रंगि राते धंनि ते जन जिनी इक मनि धिआइआ ॥
सफल जनमु भइआ तिन का जिनी सो प्रभु पाइआ ॥
पुंन दान न तुलि किरिआ हरि सरब पापा हंत जीउ ॥
बिनवंति नानक सिमरि जीवा जनम मरण रहंत जीउ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: छंतु। हे अति भाग्यशालियो ! परमात्मा की सिफतसालाह के गीत गाते रहा करो। हे भगवान ! (मेरे पर) मेहर कर (मैं भी) आपका यश गाता रहूँ। हे भाई ! जो ऋतुएं। जो महूरत। जो घड़ियाँ परमात्मा के गुण उचारते हुए बीतें। वह समय शोभा वाले होते हैं। हे भाई ! जो लोग परमात्मा के गुणों के प्यार-रंग में रंगे रहते हैं। जिन लोगों ने एक-मन हो परमात्मा का सिमरन किया है। वे लोग भाग्यशाली हैं। हे भाई ! (सिमरन की बरकति से) जिन्होंने परमात्मा का मिलाप हासिल कर लिया है उनका मानस जीवन कामयाब हो गया है। हे भाई ! परमात्मा (का नाम) सारे पापों को नाश करने वाला है। कोई पुन्य-दान। कोई धार्मिक कर्म हरि-नाम सिमरन के बराबर नहीं। नानक विनती करता है- हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमर के मैं आत्मिक जीवन प्राप्त करता हूँ। (सिमरन की बरकति से) जनम-मरन (के चक्कर) समाप्त हो जाते हैं। 1।
उदमु अगमु अगोचरो चरन कमल नमसकार ॥
सलोक ॥
उदमु अगमु अगोचरो चरन कमल नमसकार ॥
कथनी सा तुधु भावसी नानक नाम अधार ॥1॥
संत सरणि साजन परहु सुआमी सिमरि अनंत ॥
सूके ते हरिआ थीआ नानक जपि भगवंत ॥2॥
उदमु अगमु अगोचरो चरन कमल नमसकार ॥
कथनी सा तुधु भावसी नानक नाम अधार ॥1॥
संत सरणि साजन परहु सुआमी सिमरि अनंत ॥
सूके ते हरिआ थीआ नानक जपि भगवंत ॥2॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक। हे प्रभू ! आप उद्यम-स्वरूप हैं (आपके में रक्ती भर भी आलस नहीं है)। आप अपहुँच हैं। ज्ञान-इन्द्रियों की आपके तक पहुँच नहीं। मैं आपके सुंदर चरणों को नमस्कार करता हूँ। हे प्रभू ! (मेहर कर) मैं (सदा) वह बोल बोलूँ जो आपको अच्छे लगें। आपका नाम ही नानक का आसरा बना रहे। 1। हे नानक ! (कह-) हे सज्जनो ! गुरू संत की शरण पड़े रहो। (गुरू के द्वारा) बेअंत मालिक प्रभू को सिमर के। भगवान का नाम जप के (मनुष्य) सूखे से हरा हो जाता है। 2।
छंतु ॥
छंतु ॥
रुति सरस बसंत माह चेतु वैसाख सुख मासु जीउ ॥
हरि जीउ नाहु मिलिआ मउलिआ मनु तनु सासु जीउ ॥
घरि नाहु निहचलु अनदु सखीए चरन कमल प्रफुलिआ ॥
रुति सरस बसंत माह चेतु वैसाख सुख मासु जीउ ॥
हरि जीउ नाहु मिलिआ मउलिआ मनु तनु सासु जीउ ॥
घरि नाहु निहचलु अनदु सखीए चरन कमल प्रफुलिआ ॥
हिन्दी अर्थ: छंतु। उसको बसंत की ऋतु आनंदमयी प्रतीत होती है। उसके लिए महीना चेत उसके लिए वैसाख महीना सुखों से भरपूर हो जाता है। (हे सज्जनो ! जिस मनुष्य को) पति-प्रभू मिल जाता है। उसका मन उसका तन उसकी (हरेक) सांस खुशी सें महक उठती है। हे सहेलिए ! जिस जीव-स्त्री के हृदय में प्रभू-पति के सुंदर चरण आ बसें। उसका हृदय खिल उठता है। जिसके हृदय-गृह में सदा कायम रहने वाला प्रभू-पति आ बसे। वहाँ सदा आनंद बना रहता है।
रचयिता और स्रोत
यह रामकली राग के क्रम का अंग 927 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९२७ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।