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रामकली
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· सलोक · राग रामकली
साध पठाए आपि हरि हम तुम ते नाही दूरि ॥
साध पठाए आपि हरि हम तुम ते नाही दूरि ॥
नानक भ्रम भै मिटि गए रमण राम भरपूरि ॥2॥
नानक भ्रम भै मिटि गए रमण राम भरपूरि ॥2॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक! प्रभू ने खुद (ही) गुरू को (जगत में) भेजा। (गुरू ने आ के बताया कि) परमात्मा हम जीवों से दूर नहीं। (गुरू ने बताया कि) सर्व-व्यापक परमात्मा का सिमरन करने वालों के मन की भटकना और सारे डर दूर हो जाते हैं। 2।
· छंत · राग रामकली
रुति सिसीअर सीतल हरि प्रगटे मंघर पोहि जीउ ॥
छंतु ॥
रुति सिसीअर सीतल हरि प्रगटे मंघर पोहि जीउ ॥
जलनि बुझी दरसु पाइआ बिनसे माइआ ध्रोह जीउ ॥
सभि काम पूरे मिलि हजूरे हरि चरण सेवकि सेविआ ॥
हार डोर सीगार सभि रस गुण गाउ अलख अभेविआ ॥
भाउ भगति गोविंद बांछत जमु न साकै जोहि जीउ ॥
बिनवंति नानक प्रभि आपि मेली तह न प्रेम बिछोह जीउ ॥6॥
रुति सिसीअर सीतल हरि प्रगटे मंघर पोहि जीउ ॥
जलनि बुझी दरसु पाइआ बिनसे माइआ ध्रोह जीउ ॥
सभि काम पूरे मिलि हजूरे हरि चरण सेवकि सेविआ ॥
हार डोर सीगार सभि रस गुण गाउ अलख अभेविआ ॥
भाउ भगति गोविंद बांछत जमु न साकै जोहि जीउ ॥
बिनवंति नानक प्रभि आपि मेली तह न प्रेम बिछोह जीउ ॥6॥
हिन्दी अर्थ: छंत। हे भाई! मघर-पोह के महीने में सर्दी की ऋतु (आ के) ठंडक कर देती है। (इसी तरह जिस जीव के हृदय में) परमात्मा का प्रकाश होता है। जो मनुष्य परमात्मा के दर्शन कर लेता है। उसके अंदर से तृष्णा की आग बुझ जाती है। उसके अंदर से माया के वल-छल समाप्त हो जाते हैं। हे भाई! प्रभू की हजूरी में टिक के प्रभू के जिस चरण-सेवक ने प्रभू की सेवा-भक्ति की। उसकी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। (जैसे पति-मिलाप से स्त्री के) सारे किए हुए हार-श्रृंगार (सफल हो जाते हैं। इसी तरह प्रभू-पति के मिलाप में ही जीव-स्त्री के लिए) सारे आनंद हैं (इसलिए, हे भाई!) अलख-अभेव प्रभू के गुण गाते रहा करें। हे भाई! गोबिंद का प्रेम माँगते हुए गोबिंद की भक्ति (की दाति) माँगते हुए मौत का सहम कभी छू नहीं सकता। नानक विनती करता है: जिस जीव-स्त्री को प्रभू ने खुद अपने चरणों में जोड़ लिया। उसके हृदय में प्रभू-प्यार की कमी (प्रभू-प्यार का खालीपन) नहीं होता। 6।
· सलोक · राग रामकली
हरि धनु पाइआ सोहागणी डोलत नाही चीत ॥
सलोक ॥
हरि धनु पाइआ सोहागणी डोलत नाही चीत ॥
संत संजोगी नानका ग्रिहि प्रगटे प्रभ मीत ॥1॥
नाद बिनोद अनंद कोड प्रिअ प्रीतम संगि बने ॥
मन बांछत फल पाइआ हरि नानक नाम भने ॥2॥
हरि धनु पाइआ सोहागणी डोलत नाही चीत ॥
संत संजोगी नानका ग्रिहि प्रगटे प्रभ मीत ॥1॥
नाद बिनोद अनंद कोड प्रिअ प्रीतम संगि बने ॥
मन बांछत फल पाइआ हरि नानक नाम भने ॥2॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ उस भाग्यशाली जीव-स्त्री ने प्रभू का नाम-धन हासिल कर लिया। उसका चित्त (कभी माया की तरफ) नहीं डोलता। हे नानक! संतों की संगति की बरकति से जिस जीव-स्त्री के हृदय-घर में मित्र प्रभू जी प्रकट हो गए। 1। प्यारे प्रीतम-प्रभू के चरणों में जुड़ने से (मानो, अनेकों) रागों-तमाशों के करिश्मों के आनंद (पा लेते हैं)। हे नानक! परमात्मा का नाम उचारते हुए मन-मांगी मुरादें मिल जाती हैं। 2।
· छंत · राग रामकली
हिमकर रुति मनि भावती माघु फगणु गुणवंत जीउ ॥
छंतु ॥
हिमकर रुति मनि भावती माघु फगणु गुणवंत जीउ ॥
सखी सहेली गाउ मंगलो ग्रिहि आए हरि कंत जीउ ॥
ग्रिहि लाल आए मनि धिआए सेज सुंदरि सोहीआ ॥
वणु त्रिणु त्रिभवण भए हरिआ देखि दरसन मोहीआ ॥
मिले सुआमी इछ पुंनी मनि जपिआ निरमल मंत जीउ ॥
बिनवंति नानक नित करहु रलीआ हरि मिले स्रीधर कंत जीउ ॥7॥
हिमकर रुति मनि भावती माघु फगणु गुणवंत जीउ ॥
सखी सहेली गाउ मंगलो ग्रिहि आए हरि कंत जीउ ॥
ग्रिहि लाल आए मनि धिआए सेज सुंदरि सोहीआ ॥
वणु त्रिणु त्रिभवण भए हरिआ देखि दरसन मोहीआ ॥
मिले सुआमी इछ पुंनी मनि जपिआ निरमल मंत जीउ ॥
बिनवंति नानक नित करहु रलीआ हरि मिले स्रीधर कंत जीउ ॥7॥
हिन्दी अर्थ: छंत। (हे सहेलियो!) माघ (का महीना) फागुन (का महीना। ये दोनों ही बड़ी) खूबियों वाले हैं। (इन महीनों की) बर्फानी ऋतुएं मनों को भाती हैं। (इस तरह जिस हृदय में ठंडक का पुँज प्रभू आ बसता है। वहाँ भी विकारों की तपस समाप्त हो जाती है)। हे सहेलियो! आप (शांति के स्रोत परमात्मा की) सिफत-सालाह के गीत गाया करें। (जो जीव-स्त्री ये उद्यम करती है। उसके) हृदय-घर में प्रभू-पति आ प्रकट होता है। हे सहेलियो! (जिस जीव-स्त्री के हृदय-गृह में) प्रीतम-प्रभू जी आ बसते हैं। (जो जीव-स्त्री अपने) मन में प्रभू-पति का प्यार बनाए रखती है। (उसके हृदय की) सेज सुंदर हो जाती है। वह जीव-स्त्री (उस सर्व-व्यापक का) दर्शन करके मस्त रहती है। उसको जंगल, घास-बूटिआं व सारी ही त्रिभवण हरा-भरा दिखता है। हे सहेलियो! जिस जीव-स्त्री को प्रभू-पति मिल जाता है। जो जीव-स्त्री अपने मन में उस पवित्र का नाम-मंत्र जपती है। उसकी हरेक मनो-कामना पूरी हो जाती है। नानक विनती करता है: हे सहेलियो! आप भी माया को आसरा देने वाले प्रभू-पति को मिल के सदा आत्मिक आनंद लिया करें। 7।
· सलोक · राग रामकली
संत सहाई जीअ के भवजल तारणहार ॥
सलोक ॥
संत सहाई जीअ के भवजल तारणहार ॥
सभ ते ऊचे जाणीअहि नानक नाम पिआर ॥1॥
जिन जानिआ सेई तरे से सूरे से बीर ॥
नानक तिन बलिहारणै हरि जपि उतरे तीर ॥2॥
संत सहाई जीअ के भवजल तारणहार ॥
सभ ते ऊचे जाणीअहि नानक नाम पिआर ॥1॥
जिन जानिआ सेई तरे से सूरे से बीर ॥
नानक तिन बलिहारणै हरि जपि उतरे तीर ॥2॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे भाई! संत जन (जीवों की) जिंद के मददगार (बनते हैं)। (जीवों को) संसार-समुंद्र से पार लंघाने की समर्थता रखते हैं। हे नानक! परमात्मा के नाम से प्यार करने वाले (गुरमुख जगत में और) सब प्राणियों से श्रेष्ठ माने जाते हैं। 1। हे भाई! जिन मनुष्यों ने परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाली। वे संसार-समुंद्र से पार लांघ गए। वही (असल) सूरमे हैं। वह (असल) बहादर हैं। हे नानक! (कहें:) जो मनुष्य परमात्मा का नाम जप के (संसार-समुंद्र से) परले किनारे पर पहुँच गए। मैं उनसे बलिहार जाता हूँ। 2।
· छंत · राग रामकली
चरण बिराजित सभ ऊपरे मिटिआ सगल कलेसु जीउ ॥
छंतु ॥
चरण बिराजित सभ ऊपरे मिटिआ सगल कलेसु जीउ ॥
आवण जावण दुख हरे हरि भगति कीआ परवेसु जीउ ॥
हरि रंगि राते सहजि माते तिलु न मन ते बीसरै ॥
तजि आपु सरणी परे चरनी सरब गुण जगदीसरै ॥
गोविंद गुण निधि स्रीरंग सुआमी आदि कउ आदेसु जीउ ॥
बिनवंति नानक मइआ धारहु जुगु जुगो इक वेसु जीउ ॥8॥1॥6॥8॥
चरण बिराजित सभ ऊपरे मिटिआ सगल कलेसु जीउ ॥
आवण जावण दुख हरे हरि भगति कीआ परवेसु जीउ ॥
हरि रंगि राते सहजि माते तिलु न मन ते बीसरै ॥
तजि आपु सरणी परे चरनी सरब गुण जगदीसरै ॥
गोविंद गुण निधि स्रीरंग सुआमी आदि कउ आदेसु जीउ ॥
बिनवंति नानक मइआ धारहु जुगु जुगो इक वेसु जीउ ॥8॥1॥6॥8॥
हिन्दी अर्थ: छंतु। (हे भाई! जिन मनुष्यों के हृदय में सदा प्रभू के) चरण टिके रहते हैं। व और मायावी संकल्प प्रभू की याद से नीचे बने रहते हैं (अर्थात प्रभू के प्रति प्रेम सर्वोपरि रहता है। उनके अंदर से हरेक किस्म का) सारा दुख मिट जाता है। जिनके अंदर परमात्मा की भक्ति आ बसती है। उनके जनम-मरण के दुख कलेश खत्म हो जाते हैं। वे मनुष्य प्रभू के प्रेम-रंग में (सदा) रंगे रहते हैं। वे आत्मिक अडोलता में (सदा) मस्त रहते हैं। परमात्मा का नाम उनके मन से रक्ती भर पल के लिए भी नहीं बिसरता। वे मनुष्य अहंकार त्याग के सब गुणों के मालिक परमात्मा के चरणों की शरण पड़े रहते हैं। हे भाई! गुणों के खजाने। माया के पति। सारी सृष्टि के आदि मूल स्वामी गोबिंद को सदा नमस्कार किया करें। (और अरदास करा करें: हे प्रभू! मेरे पर) मेहर करें (मैं भी आपका नाम जपता रहूँ)। नानक विनती करता है: आप हरेक युग में एक ही अटल स्वरूप वाले रहते हैं। 8। 1। 6। 8।
· ओअंकार · राग रामकली
ओअंकारि ब्रहमा उतपति ॥
रामकली महला 1 दखणी ओअंकारु
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ओअंकारि ब्रहमा उतपति ॥
ओअंकारु कीआ जिनि चिति ॥
ओअंकारि सैल जुग भए ॥
ओअंकारि बेद निरमए ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ओअंकारि ब्रहमा उतपति ॥
ओअंकारु कीआ जिनि चिति ॥
ओअंकारि सैल जुग भए ॥
ओअंकारि बेद निरमए ॥
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 1 दखणी ओअंकारु ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे पांडे! आप मन्दिर में स्थापित की हुई मूर्ति को 'ओंकार' मिथ रहे हैं। और कहते हैं सृष्टि को ब्रहमा ने पैदा किया था। 'ओअंकार' वह सर्व-व्यापक परमात्मा है जिस) सर्व-व्यापक परमात्मा से ब्रहमा का (भी) जन्म हुआ। उस ब्रह्मा ने भी उस सर्व-व्यापक प्रभू को अपने मन में बसाया। यह सारी सृष्टि और समय के बँटवारे उस सर्व-व्यापक परमात्मा से ही हुए हैं। वेद भी ओअंकार से ही बने।
रचयिता और स्रोत
यह रामकली राग के क्रम का अंग 929 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 929 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।