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अंग 929

अंग
929
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
साध पठाए आपि हरि हम तुम ते नाही दूरि ॥
नानक भ्रम भै मिटि गए रमण राम भरपूरि ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! प्रभू ने खुद (ही) गुरू को (जगत में) भेजा। (गुरू ने आ के बताया कि) परमात्मा हम जीवों से दूर नहीं। (गुरू ने बताया कि) सर्व-व्यापक परमात्मा का सिमरन करने वालों के मन की भटकना और सारे डर दूर हो जाते हैं। 2।
छंतु ॥
रुति सिसीअर सीतल हरि प्रगटे मंघर पोहि जीउ ॥
जलनि बुझी दरसु पाइआ बिनसे माइआ ध्रोह जीउ ॥
सभि काम पूरे मिलि हजूरे हरि चरण सेवकि सेविआ ॥
हार डोर सीगार सभि रस गुण गाउ अलख अभेविआ ॥
भाउ भगति गोविंद बांछत जमु न साकै जोहि जीउ ॥
बिनवंति नानक प्रभि आपि मेली तह न प्रेम बिछोह जीउ ॥6॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: छंत। हे भाई ! मघर-पोह के महीने में सर्दी की ऋतु (आ के) ठंडक कर देती है। (इसी तरह जिस जीव के हृदय में) परमात्मा का प्रकाश होता है। जो मनुष्य परमात्मा के दर्शन कर लेता है। उसके अंदर से तृष्णा की आग बुझ जाती है। उसके अंदर से माया के वल-छल समाप्त हो जाते हैं। हे भाई ! प्रभू की हजूरी में टिक के प्रभू के जिस चरण-सेवक ने प्रभू की सेवा-भक्ति की। उसकी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। (जैसे पति-मिलाप से स्त्री के) सारे किए हुए हार-श्रृंगार (सफल हो जाते हैं। इसी तरह प्रभू-पति के मिलाप में ही जीव-स्त्री के लिए) सारे आनंद हैं (इसलिए। हे भाई !) अलख-अभेव प्रभू के गुण गाते रहा करो। हे भाई ! गोबिंद का प्रेम माँगते हुए गोबिंद की भक्ति (की दाति) माँगते हुए मौत का सहम कभी छू नहीं सकता। नानक विनती करता है- जिस जीव-स्त्री को प्रभू ने खुद अपने चरणों में जोड़ लिया। उसके हृदय में प्रभू-प्यार की कमी (प्रभू-प्यार का खालीपन) नहीं होता। 6।
सलोक ॥
हरि धनु पाइआ सोहागणी डोलत नाही चीत ॥
संत संजोगी नानका ग्रिहि प्रगटे प्रभ मीत ॥1॥
नाद बिनोद अनंद कोड प्रिअ प्रीतम संगि बने ॥
मन बांछत फल पाइआ हरि नानक नाम भने ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ उस भाग्यशाली जीव-स्त्री ने प्रभू का नाम-धन हासिल कर लिया। उसका चित्त (कभी माया की तरफ) नहीं डोलता। हे नानक ! संतों की संगति की बरकति से जिस जीव-स्त्री के हृदय-घर में मित्र प्रभू जी प्रकट हो गए।1। प्यारे प्रीतम-प्रभू के चरणों में जुड़ने से (मानो। अनेकों) रागों-तमाशों के करिश्मों के आनंद (पा लेते हैं)। हे नानक ! परमात्मा का नाम उचारते हुए मन-मांगी मुरादें मिल जाती हैं।2।
छंतु ॥
हिमकर रुति मनि भावती माघु फगणु गुणवंत जीउ ॥
सखी सहेली गाउ मंगलो ग्रिहि आए हरि कंत जीउ ॥
ग्रिहि लाल आए मनि धिआए सेज सुंदरि सोहीआ ॥
वणु त्रिणु त्रिभवण भए हरिआ देखि दरसन मोहीआ ॥
मिले सुआमी इछ पुंनी मनि जपिआ निरमल मंत जीउ ॥
बिनवंति नानक नित करहु रलीआ हरि मिले स्रीधर कंत जीउ ॥7॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: छंत। (हे सहेलियो !) माघ (का महीना) फागुन (का महीना। ये दोनों ही बड़ी) खूबियों वाले हैं। (इन महीनों की) बर्फानी ऋतुएं मनों की भाती हैं। (इस तरह जिस हृदय में ठंडक का पुँज प्रभू आ बसता है। वहॉ। भी विकारों की तपस समाप्त हो जाती है)। हे सहेलियो ! आप (शांति के श्रोत परमात्मा की) सिफत-सालाह के गीत गाया करो। (जो जीव-स्त्री ये उद्यम करती है। उसके) हृदय-घर में प्रभू-पति आ प्रकट होता है। हे सहेलियो ! (जिस जीव-स्त्री के हृदय-गृह में) प्रीतम-प्रभू जी आ बसते हैं। (जो जीव-स्त्री अपने) मन में प्रभू-पति का प्यार बनाए रखती है। (उसके हृदय की) सेज सुंदर हो जाती है। वह जीव-स्त्री (उस सर्व-व्यापक का) दर्शन करके मस्त रहती है। उसको जंगल। घास-बूटिआं व सारी ही त्रिभवण हरा-भरा दिखता है। हे सहेलियो ! जिस जीव-स्त्री को प्रभू-पति मिल जाता है। जो जीव-स्त्री अपने मन में उस पवित्र का नाम-मंत्र जपती है। उसकी हरेक मनो-कामना पूरी हो जाती है। नानक विनती करता है- हे सहेलियो ! आप भी माया के आसरे प्रभू पति को मिल के सदा आत्मिक आनंद लिया करो। 7।
सलोक ॥
संत सहाई जीअ के भवजल तारणहार ॥
सभ ते ऊचे जाणीअहि नानक नाम पिआर ॥1॥
जिन जानिआ सेई तरे से सूरे से बीर ॥
नानक तिन बलिहारणै हरि जपि उतरे तीर ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे भाई ! संत जन (जीवों की) जिंद के मददगार (बनते हैं)। (जीवों को) संसार-समुंद्र से पार लंघाने की समर्थता रखते हैं। हे नानक ! परमात्मा के नाम से प्यार करने वाले (गुरमुख जगत में और) सब प्राणियों से श्रेष्ठ माने जाते हैं। 1। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाली। वे संसार-समुंद्र से पार लांघ गए। वही (असल) सूरमे हैं। वह (असल) बहादर हैं। हे नानक ! (कह-) जो मनुष्य परमात्मा का नाम जप के (संसार-समुंद्र से) परले किनारे पर पहुँच गए। मैं उनसे बलिहार जाता हूँ। 2।
छंतु ॥
चरण बिराजित सभ ऊपरे मिटिआ सगल कलेसु जीउ ॥
आवण जावण दुख हरे हरि भगति कीआ परवेसु जीउ ॥
हरि रंगि राते सहजि माते तिलु न मन ते बीसरै ॥
तजि आपु सरणी परे चरनी सरब गुण जगदीसरै ॥
गोविंद गुण निधि स्रीरंग सुआमी आदि कउ आदेसु जीउ ॥
बिनवंति नानक मइआ धारहु जुगु जुगो इक वेसु जीउ ॥8॥1॥6॥8॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: छंतु। (हे भाई ! जिन मनुष्यों के हृदय में सदा प्रभू के) चरण टिके रहते हैं। व और मायावी संकल्प प्रभू की याद से नीचे बने रहते हैं (अर्थात प्रभू के प्रति प्रेम सर्वोपरि रहता है। उनके अंदर से हरेक किस्म का) सारा दुख मिट जाता है। जिनके अंदर परमात्मा की भक्ति आ बसती है। उनके जनम-मरण के दुख कलेश खत्म हो जाते हैं। वे मनुष्य प्रभू के प्रेम-रंग में (सदा) रंगे रहते हैं। वे आत्मिक अडोलता में (सदा) मस्त रहते हैं। परमात्मा का नाम उनके मन से रक्ती भर पल के लिए भी नहीं बिसरता। वे मनुष्य अहंकार त्याग के सब गुणों के मालिक परमात्मा के चरणों की शरण पड़े रहते हैं। हे भाई ! गुणों के खजाने। माया के पति। सारी सृष्टि के आदि मूल स्वामी गोबिंद को सदा नमस्कार किया कर। (और अरदास करा कर- हे प्रभू ! मेरे पर) मेहर कर (मैं भी आपका नाम जपता रहूँ)। नानक विनती करता है- आप हरेक युग में एक ही अटल स्वरूप वाला रहता है। 8। 1। 6। 8।
रामकली महला 1 दखणी ओअंकारु
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ओअंकारि ब्रहमा उतपति ॥
ओअंकारु कीआ जिनि चिति ॥
ओअंकारि सैल जुग भए ॥
ओअंकारि बेद निरमए ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 1 दखणी ओअंकारु सतिगुर प्रसादि ॥ (हे पांडे ! आप मन्दिर में स्थापित की हुई मूर्ति को ‘ओंकार’ मिथ रहे हैं। और कहते हैं सृष्टि को ब्रहमा ने पैदा किया था। ‘ओअंकार’ वह सर्व-व्यापक परमात्मा है जिस) सर्व-व्यापक परमात्मा से ब्रहमा का (भी) जन्म हुआ। उस ब्रह्मा ने भी उस सर्व-व्यापक प्रभू को अपने मन में बसाया। यह सारी सृष्टि और समय के बँटवारे उस सर्व-व्यापक परमात्मा से ही हुए हैं। वेद भी ओअंकार से ही बने।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! प्रभू ने खुद (ही) गुरू को (जगत में) भेजा।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।