अंग
806
बिलावल
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पूरी भई सिमरि सिमरि बिधाता ॥3॥
पूरी भई सिमरि सिमरि बिधाता ॥3॥
साधसंगि नानकि रंगु माणिआ ॥
घरि आइआ पूरै गुरि आणिआ ॥4॥12॥17॥
साधसंगि नानकि रंगु माणिआ ॥
घरि आइआ पूरै गुरि आणिआ ॥4॥12॥17॥
हिन्दी अर्थ: उस सृजनहार प्रभू का नाम सिमर-सिमर के (सिमरन की) घाल-कमाई सफल हो जाती है। 3। हे भाई ! नानक ने (तो) गुरू की संगति में रह के आत्मिक आनंद लिया है। (गुरू की कृपा से) परमात्मा (नानक के) हृदय में आ बसा है। पूरे गुरू ने ला के बसा दिया है। 4। 12। 17।
स्रब निधान पूरन गुरदेव ॥1॥ रहाउ ॥
बिलावलु महला 5 ॥
स्रब निधान पूरन गुरदेव ॥1॥ रहाउ ॥
हरि हरि नामु जपत नर जीवे ॥
मरि खुआरु साकत नर थीवे ॥1॥
राम नामु होआ रखवारा ॥
झख मारउ साकतु वेचारा ॥2॥
निंदा करि करि पचहि घनेरे ॥
मिरतक फास गलै सिरि पैरे ॥3॥
कहु नानक जपहि जन नाम ॥
ता के निकटि न आवै जाम ॥4॥13॥18॥
स्रब निधान पूरन गुरदेव ॥1॥ रहाउ ॥
हरि हरि नामु जपत नर जीवे ॥
मरि खुआरु साकत नर थीवे ॥1॥
राम नामु होआ रखवारा ॥
झख मारउ साकतु वेचारा ॥2॥
निंदा करि करि पचहि घनेरे ॥
मिरतक फास गलै सिरि पैरे ॥3॥
कहु नानक जपहि जन नाम ॥
ता के निकटि न आवै जाम ॥4॥13॥18॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! पूरे गुरू की शरण पड़ने से सारे खजानों का मालिक प्रभू मिल जाता है। 1। रहाउ। भगवान् का नाम जपने से ही मनुष्य जीते हैं किन्तु शाक्त आदमी मर कर ख्वार होते हैं।॥ 1॥ (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा का नाम जपने से मनुष्य आत्मिक जीवन तलाश लेते हैं। पर परमात्मा से टूटा हुआ मनुष्य बेचारा (उसकी निंदा आदि करने के लिए) झखें मारता है (पर उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता)। 2। अनेकों लोग (हरी-नाम का सिमरन करने वाले मनुष्य की) निंदा कर-कर के (बल्कि) परेशान (ही होते) हैं। (आत्मिक) मौत की फाही उनके गले में उनके पैरों में पड़ी रहती है। आत्मिक मौत उनके सिर पर सवार रहती है। 3। हे नानक ! (बेशक) कह- जो मनुष्य परमात्मा का नाम जपते हैं। जम भी उनके नजदीक नहीं फटक सकता। 4। 13। 18।
कवन संजोग मिलउ प्रभ अपने ॥
रागु बिलावलु महला 5 घरु 4 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कवन संजोग मिलउ प्रभ अपने ॥
पलु पलु निमख सदा हरि जपने ॥1॥
चरन कमल प्रभ के नित धिआवउ ॥
कवन सु मति जितु प्रीतमु पावउ ॥1॥ रहाउ ॥
ऐसी क्रिपा करहु प्रभ मेरे ॥
हरि नानक बिसरु न काहू बेरे ॥2॥1॥19॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कवन संजोग मिलउ प्रभ अपने ॥
पलु पलु निमख सदा हरि जपने ॥1॥
चरन कमल प्रभ के नित धिआवउ ॥
कवन सु मति जितु प्रीतमु पावउ ॥1॥ रहाउ ॥
ऐसी क्रिपा करहु प्रभ मेरे ॥
हरि नानक बिसरु न काहू बेरे ॥2॥1॥19॥
हिन्दी अर्थ: रागु बिलावलु महला 5 घरु 4 दुपदे सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! वह कौन से महूरत हैं जब मैं अपने प्रभू को मिल सकूँ। (वह लगन-महूरत तो हर वक्त ही हैं) एक-एक पल। आँख झपकने जितना समय भर भी सदा ही हरी-नाम जपने से (परमात्मा से मिलाप हो सकता है)। 1। (वह कौन सी सुमति है जिसके माध्यम से) मैं परमात्मा के सुंदर चरणों का हर वक्त ध्यान धर सकूँ। हे भाई ! वह कौन सी सद्-बुद्धि है जिसकी बरकति से मैं अपने प्यारे प्रभू को मिल सकूँ। 1। रहाउ। (पर। प्रभू की अपनी मेहर हो। तो ही सिमरन हो सकता है। इस वास्ते उसके दर पर सदैव अरदास करें-) हे मेरे प्रभू ! (मेरे पर) ऐसी मेहर कर। कि। हे हरी ! मुझ नानक को आपका नाम कभी भी ना भूले। 2। 1। 19।
चरन कमल प्रभ हिरदै धिआए ॥
बिलावलु महला 5 ॥
चरन कमल प्रभ हिरदै धिआए ॥
रोग गए सगले सुख पाए ॥1॥
गुरि दुखु काटिआ दीनो दानु ॥
सफल जनमु जीवन परवानु ॥1॥ रहाउ ॥
अकथ कथा अंम्रित प्रभ बानी ॥
कहु नानक जपि जीवे गिआनी ॥2॥2॥20॥
चरन कमल प्रभ हिरदै धिआए ॥
रोग गए सगले सुख पाए ॥1॥
गुरि दुखु काटिआ दीनो दानु ॥
सफल जनमु जीवन परवानु ॥1॥ रहाउ ॥
अकथ कथा अंम्रित प्रभ बानी ॥
कहु नानक जपि जीवे गिआनी ॥2॥2॥20॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे भाई ! गुरू की कृपा से जिस मनुष्य ने अपने) हृदय में प्रभू के सुंदर चरन-कमलों का ध्यान धरना आरम्भ कर दिया। उसके सारे रोग दूर हो गए। उसने सारे सुख प्राप्त कर लिए। 1। हे भाई ! गुरू ने (जिस मनुष्य को परमात्मा के नाम की) दात दे दी। उसका सारा दुख भी गुरू ने दूर कर दिया। उस मनुष्य की जिंदगी कामयाब हो गई। (लोक-परलोक में) उसका जीवन कबूल हो गया। 1। रहाउ। हे नानक ! कह- बेअंत गुणों के मालिक प्रभू की सिफत-सालाह वाली बाणी आत्मिक जीवन देने वाली है। प्रभू से गहरी जान-पहचान वाला मनुष्य प्रभू के गुणों को याद कर-करके आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है। 2। 2। 20।
सांति पाई गुरि सतिगुरि पूरे ॥
बिलावलु महला 5 ॥
सांति पाई गुरि सतिगुरि पूरे ॥
सुख उपजे बाजे अनहद तूरे ॥1॥ रहाउ ॥
ताप पाप संताप बिनासे ॥
हरि सिमरत किलविख सभि नासे ॥1॥
अनदु करहु मिलि सुंदर नारी ॥
गुरि नानकि मेरी पैज सवारी ॥2॥3॥21॥
सांति पाई गुरि सतिगुरि पूरे ॥
सुख उपजे बाजे अनहद तूरे ॥1॥ रहाउ ॥
ताप पाप संताप बिनासे ॥
हरि सिमरत किलविख सभि नासे ॥1॥
अनदु करहु मिलि सुंदर नारी ॥
गुरि नानकि मेरी पैज सवारी ॥2॥3॥21॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! पूरे सतिगुरू ने। गुरू ने (हरी-नाम की दाति दे के जिस मनुष्य के हृदय में) शीतलता बरता दी। उसके अंदर सारे सुख पैदा हो गए (मानो। उसके अंदर) एक-रस सारे बाजे बजने लग गए। 1। रहाउ। (जिस मनुष्य ने गुरू की कृपा से हरी-नाम सिमरना शुरू कर दिया। उसके सारे) दुख-कलेश दूर हो गए। परमात्मा का नाम सिमरते-सिमरते उसके सारे पाप नाश हो गए। 1। (नाम की बरकति से) सुंदर (बन चुकी) हे मेरी ज्ञानेन्द्रियों ! आप अब मिल के (सत्संग करके अपने अंदर) आत्मिक आनंद पैदा करो। गुरू नानक ने (मुझे ताप-पाप-संताप से बचा के) मेरी इज्जत रख ली है। 2। 3। 21।
ममता मोह ध्रोह मदि माता बंधनि बाधिआ अति बिकराल ॥
बिलावलु महला 5 ॥
ममता मोह ध्रोह मदि माता बंधनि बाधिआ अति बिकराल ॥
दिनु दिनु छिजत बिकार करत अउध फाही फाथा जम कै जाल ॥1॥
तेरी सरणि प्रभ दीन दइआला ॥
महा बिखम सागरु अति भारी उधरहु साधू संगि रवाला ॥1॥ रहाउ ॥
प्रभ सुखदाते समरथ सुआमी जीउ पिंडु सभु तुमरा माल ॥
भ्रम के बंधन काटहु परमेसर नानक के प्रभ सदा क्रिपाल ॥2॥4॥22॥
ममता मोह ध्रोह मदि माता बंधनि बाधिआ अति बिकराल ॥
दिनु दिनु छिजत बिकार करत अउध फाही फाथा जम कै जाल ॥1॥
तेरी सरणि प्रभ दीन दइआला ॥
महा बिखम सागरु अति भारी उधरहु साधू संगि रवाला ॥1॥ रहाउ ॥
प्रभ सुखदाते समरथ सुआमी जीउ पिंडु सभु तुमरा माल ॥
भ्रम के बंधन काटहु परमेसर नानक के प्रभ सदा क्रिपाल ॥2॥4॥22॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे प्रभू ! इस संसार-समुंद्र में फंस के जीव) अपनत्व के मद में। मोह के नशे में। ठॅगी-चालाकी के मद में मस्त रहता है। माया के मोह की जकड़ से बँधा हुआ जीव बड़े डरावने जीवन वाला बन जाता है। हर रोज विकार करते हुए इसकी उम्र घटती जाती है। ये जम की फाही में जम के जाल में हमेशा फसा रहता है। 1। दीनों पर दया करने वाले हे प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हूँ। ये (संसार-) समुंद्र बहुत बड़ा है। (इसमें से पार होना) बहुत ही मुश्किल है। हे प्रभू ! मुझे गुरू की संगति में (रख के) मुझे गुरू की चरण-धूड़ दे के (इस संसार-समुंर में डूबने से) बचा ले। 1। रहाउ। हे सारे सुख देने वाले प्रभू ! हे सब ताकतों के मालिक स्वामी ! (जीवों को मिला हुआ) ये शरीर और आत्मा (जिंद) सब कुछ आपका ही दिया हुआ सरमाया है। हे नानक के प्रभू ! हे सदा कृपालु प्रभू ! हे परमेश्वर ! (जीव माया में भटक रहे हैं। जीवों के ये) भटकना के बँधन काट दे। 2। 4। 22।
सगल अनंदु कीआ परमेसरि अपणा बिरदु सम॑ारिआ ॥
बिलावलु महला 5 ॥
सगल अनंदु कीआ परमेसरि अपणा बिरदु सम॑ारिआ ॥
साध जना होए किरपाला बिगसे सभि परवारिआ ॥1॥
कारजु सतिगुरि आपि सवारिआ ॥
सगल अनंदु कीआ परमेसरि अपणा बिरदु सम॑ारिआ ॥
साध जना होए किरपाला बिगसे सभि परवारिआ ॥1॥
कारजु सतिगुरि आपि सवारिआ ॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे भाई ! ये यकीन जानो कि) परमात्मा अपना मूल कदीमी बिरद (भगत-वछॅल होने का) स्वभाव हमेशा याद रखता है। अपने संत-जनों पर हमेशा दयावान रहता है। उनको हरेक किस्म का सुख-आनंद देता है। उनके सारे परिवार (सारी ज्ञानेन्द्रियाँ भी) आनंद-भरपूर रहती हैं। 1। (हे भाई ! लोग तो देवी आदि की पूजा की प्रेरणा कर रहे थे। पर देखिए। हरिगोबिंद को चेचक के बुखार से आरोग्य करने वाला ये बड़ा) काम (मेरे) सतिगुरू ने खुद ही सफल कर दिया है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ८०६ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।