हउ बलिहारी जो प्रभू धिआवत ॥
जलनि बुझै हरि हरि गुन गावत ॥1॥ रहाउ ॥
सफल जनमु होवत वडभागी ॥
साधसंगि रामहि लिव लागी ॥2॥
मति पति धनु सुख सहज अनंदा ॥ इक निमख न विसरहु परमानंदा ॥3॥
हरि दरसन की मनि पिआस घनेरी ॥
भनति नानक सरणि प्रभ तेरी ॥4॥8॥13॥
मोहि निरगुन सभ गुणह बिहूना ॥
दइआ धारि अपुना करि लीना ॥1॥
मेरा मनु तनु हरि गोपालि सुहाइआ ॥
करि किरपा प्रभु घर महि आइआ ॥1॥ रहाउ ॥
भगति वछल भै काटनहारे ॥
संसार सागर अब उतरे पारे ॥2॥
पतित पावन प्रभ बिरदु बेदि लेखिआ ॥
पारब्रहमु सो नैनहु पेखिआ ॥3॥
साधसंगि प्रगटे नाराइण ॥
नानक दास सभि दूख पलाइण ॥4॥9॥14॥
कवनु जानै प्रभ तुम॑री सेवा ॥
प्रभ अविनासी अलख अभेवा ॥1॥
गुण बेअंत प्रभ गहिर गंभीरे ॥
ऊच महल सुआमी प्रभ मेरे ॥
तू अपरंपर ठाकुर मेरे ॥1॥ रहाउ ॥
एकस बिनु नाही को दूजा ॥
तुम॑ ही जानहु अपनी पूजा ॥2॥
आपहु कछू न होवत भाई ॥
जिसु प्रभु देवै सो नामु पाई ॥3॥
कहु नानक जो जनु प्रभ भाइआ ॥
गुण निधान प्रभु तिन ही पाइआ ॥4॥10॥15॥
मात गरभ महि हाथ दे राखिआ ॥
हरि रसु छोडि बिखिआ फलु चाखिआ ॥1॥
भजु गोबिद सभ छोडि जंजाल ॥
जब जमु आइ संघारै मूड़े तब तनु बिनसि जाइ बेहाल ॥1॥ रहाउ ॥
तनु मनु धनु अपना करि थापिआ ॥
करनहारु इक निमख न जापिआ ॥2॥
महा मोह अंध कूप परिआ ॥
पारब्रहमु माइआ पटलि बिसरिआ ॥3॥
वडै भागि प्रभ कीरतनु गाइआ ॥
संतसंगि नानक प्रभु पाइआ ॥4॥11॥16॥
मात पिता सुत बंधप भाई ॥
नानक होआ पारब्रहमु सहाई ॥1॥
सूख सहज आनंद घणे ॥
गुरु पूरा पूरी जा की बाणी अनिक गुणा जा के जाहि न गणे ॥1॥ रहाउ ॥
सगल सरंजाम करे प्रभु आपे ॥
भए मनोरथ सो प्रभु जापे ॥2॥
अरथ धरम काम मोख का दाता ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमात्मा के कमल के फूल (जैसे कोमल) चरणों में चित्त जोड़ना चाहिए।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।