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अंग ७९० · सूही

अंग
790
सूही
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  1. चोरा जारा रंडीआ कुटणीआ दीबाणु ॥ वेदीना की दोसती वेदीना का खाणु ॥
  2. बांगा बुरगू सिंङीआ नाले मिली कलाण ॥
  3. माइआ मोहु सभु कूड़ु है कूड़ो होइ गइआ ॥
  4. सतिगुर भीखिआ देहि मै तूं संम्रथु दातारु ॥
  5. इको कंतु सबाईआ जिती दरि खड़ीआह ॥
  6. सभे कंतै रतीआ मै दोहागणि कितु ॥
  7. हउ बलिहारी तिन कउ सिफति जिना दै वाति ॥
  8. दरि मंगतु जाचै दानु हरि दीजै क्रिपा करि ॥
  9. जिनी न पाइओ प्रेम रसु कंत न पाइओ साउ ॥
  10. सउ ओलाम॑े दिनै के राती मिलनि॑ सहंस ॥
  11. ढाढी गुण गावै नित जनमु सवारिआ ॥

चोरा जारा रंडीआ कुटणीआ दीबाणु ॥ वेदीना की दोसती वेदीना का खाणु ॥

सलोक मः 1 ॥
चोरा जारा रंडीआ कुटणीआ दीबाणु ॥ वेदीना की दोसती वेदीना का खाणु ॥
सिफती सार न जाणनी सदा वसै सैतानु ॥
गदहु चंदनि खउलीऐ भी साहू सिउ पाणु ॥
नानक कूड़ै कतिऐ कूड़ा तणीऐ ताणु ॥
कूड़ा कपड़ु कछीऐ कूड़ा पैनणु माणु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ चोरों।लुच्चे लोगों।व्यभचारी औरतों और दल्लों का आपस में उठना बैठना होता है। इन अधर्मियों की आपस में मित्रता और खाने पीने की सांझ होती है; ईश्वर की सिफत सालाह करने की इन्हें समझ ही नहीं होती।(इनके मन में जैसे) सदा शैतान बसता है। (समझते हुए भी नहीं समझते।जैसे) गधे को अगर चंदन भी लेप दें तब उसका बरतन-व्यवहार गर्द और राख से ही होता है (पिछले किए कर्मों के चक्कर इस गलत रास्ते से हटने नहीं देते)। हे नानक ! ‘कूड़’ (झूठा।छल।भ्रम) (सूत्र) कातने के लिए ‘झूठ’ का ही ताना चाहिए। (और उससे) ‘झूठ’ का ही कपड़ा काता जाएगा और पहना जाएगा (इस ‘झूठ’ रूपी पोषाक के कारण ‘झूठी’ ही महिमा मिलती है।भाव।‘खतिअहु जंमे खते करनि त खतिआ विचि पाहि’)। 1।

बांगा बुरगू सिंङीआ नाले मिली कलाण ॥

मः 1 ॥
बांगा बुरगू सिंङीआ नाले मिली कलाण ॥
इकि दाते इकि मंगते नामु तेरा परवाणु ॥
नानक जिन॑ी सुणि कै मंनिआ हउ तिना विटहु कुरबाणु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (मुल्ला) बांग दे के।(फक़ीर) तूती बजा के।(जोगी) सिंगी बजा के।(मरासी) कलाण करके (लोगों के दर पर माँगते हैं); (संसार में इस तरह के) कई मंगते और कई दाते हैं।पर मुझे आपका नाम ही चाहिए। हे नानक ! जिन लोगों ने प्रभू का नाम सुन के उसमें मन को जोड़ लिया है।मैं उनसे सदके जाता हूँ। 2।

माइआ मोहु सभु कूड़ु है कूड़ो होइ गइआ ॥

पउड़ी ॥
माइआ मोहु सभु कूड़ु है कूड़ो होइ गइआ ॥
हउमै झगड़ा पाइओनु झगड़ै जगु मुइआ ॥
गुरमुखि झगड़ु चुकाइओनु इको रवि रहिआ ॥
सभु आतम रामु पछाणिआ भउजलु तरि गइआ ॥
जोति समाणी जोति विचि हरि नामि समइआ ॥14॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। माया का मोह निरोल एक छल है।(आखिर) छल ही (साबित) होता है। पर प्रभू ने (माया के मोह में जीव फसा के) ‘अहंकार’ का चक्र पैदा कर दिया है इस चक्कर में (पड़ कर) जगत दुखी हो रहा है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख है उसका ये झमेला प्रभू ने खुद समाप्त कर दिया है।उसको एक प्रभू ही व्यापक दिखाई देता है। गुरमुख हर जगह एक परमात्मा को ही पहचानता है और इस तरह इस संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है; उसकी आत्मा परमात्मा में लीन हुई रहती है वह प्रभू के नाम में जुड़ा रहता है। १४।

सतिगुर भीखिआ देहि मै तूं संम्रथु दातारु ॥

सलोक मः 1 ॥
सतिगुर भीखिआ देहि मै तूं संम्रथु दातारु ॥
हउमै गरबु निवारीऐ कामु क्रोधु अहंकारु ॥
लबु लोभु परजालीऐ नामु मिलै आधारु ॥
अहिनिसि नवतन निरमला मैला कबहूं न होइ ॥
नानक इह बिधि छुटीऐ नदरि तेरी सुखु होइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1 ॥ हे गुरू ! आप बख्शिश करने योग्य हैं।मुझे ख़ैर दे (भिक्षा दे।‘नाम’ की)। मेरा अहम्।मेरा अहंकार। मेरा काम क्रोध दूर हो जाए। (हे गुरू ! आपके दर पर मुझे) प्रभू का नाम (जिंदगी के लिए) सहारा मिल जाए तो मेरा चस्का और लोभ अच्छी तरह जल जाएं। प्रभू का नाम दिन रात नए से नया होता है (भाव।ज्यों-ज्यों इसे जपते हैं।इससे प्यार बढ़ता जाता है) ‘नाम’ पवित्र है।ये कभी मैला नहीं होता (तभी तो)। हे नानक ! ‘नाम’ जपने से (अहंकार के) चक्कर से बच जाया जाता है। हे प्रभू ! ये सुख आपकी मेहर की नजर से मिलता है। 1।

इको कंतु सबाईआ जिती दरि खड़ीआह ॥

मः 1 ॥
इको कंतु सबाईआ जिती दरि खड़ीआह ॥
नानक कंतै रतीआ पुछहि बातड़ीआह ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जितनी भी जीव-सि्त्रयां पति-प्रभू के दरवाजे पर खड़ी हुई हैं।उन सभी का एक प्रभू ही रखवाला है। हे नानक ! पति-प्रभू के प्रेम-रंग में रंगी हुई प्रभू की ही मन-मोहक बातें (एक-दूसरे से) पूछती हैं। 2।

सभे कंतै रतीआ मै दोहागणि कितु ॥

मः 1 ॥
सभे कंतै रतीआ मै दोहागणि कितु ॥
मै तनि अवगण एतड़े खसमु न फेरे चितु ॥3॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ सभी जीव-सि्त्रयां प्रभू-पति के प्यार में रंगी हुई हैं।(उन सोहागिनों के सामने) मैं अभागनि किस गिनती में हूँ। मेरे शरीर में इतने अवगुण हैं कि पति मेरी तरफ देखता (ध्यान नहीं देता) तक नहीं। 3।

हउ बलिहारी तिन कउ सिफति जिना दै वाति ॥

मः 1 ॥
हउ बलिहारी तिन कउ सिफति जिना दै वाति ॥
सभि राती सोहागणी इक मै दोहागणि राति ॥4॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ मैं सदके हूँ उनसे जिनके मुँह में प्रभू की सिफत सालाह है। (हे प्रभू !) आप सारी रातें सुहागिनों को दे रहे हैं।एक रात मुझ छुटड़ को भी दे। 4।

दरि मंगतु जाचै दानु हरि दीजै क्रिपा करि ॥

पउड़ी ॥
दरि मंगतु जाचै दानु हरि दीजै क्रिपा करि ॥
गुरमुखि लेहु मिलाइ जनु पावै नामु हरि ॥
अनहद सबदु वजाइ जोती जोति धरि ॥
हिरदै हरि गुण गाइ जै जै सबदु हरि ॥
जग महि वरतै आपि हरि सेती प्रीति करि ॥15॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे प्रभू ! मैं मंगता आपके दरवाजे पर (आकर) ख़ैर माँगता हूँ।मेहर कर मुझे भिक्षा दे; मुझे गुरू के सन्मुख करके (अपने चरणों में) जोड़ ले।मैं आपका सेवक आपका नाम प्राप्त कर लूँ; आपकी ज्योति में अपनी आत्मा टिका के मैं आपकी सिफत-सालाह का एक-रस गीत गाऊँ। आपकी जै-जै कार की बाणी के गुण हृदय में गाऊँ। मैं आपके से प्यार करूँ (और इस तरह मुझे विश्वास हो जाए कि) जगत में प्रभू खुद ही हर जगह मौजूद है। 15।

जिनी न पाइओ प्रेम रसु कंत न पाइओ साउ ॥

सलोक मः 1 ॥
जिनी न पाइओ प्रेम रसु कंत न पाइओ साउ ॥
सुंञे घर का पाहुणा जिउ आइआ तिउ जाउ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ जिन जीव-सि्त्रयों ने प्रभू के प्यार का आनंद नहीं पाया।जिन्होंने पति-प्रभू के मिलाप का स्वाद नहीं चखा (वे इस मनुष्य-शरीर में आ के यूँ ही ख़ाली गई) जैसे किसी सूंने घर (जिस घर में कोई नहीं बस रहा) में आया पराहुणा (मेहमान) जैसे आता है वैसे ही चला जाता है (वहाँ से उसे खाने-पीने को कुछ भी प्राप्त नहीं होता)। 1।

सउ ओलाम॑े दिनै के राती मिलनि॑ सहंस ॥

मः 1 ॥
सउ ओलाम॑े दिनै के राती मिलनि॑ सहंस ॥
सिफति सलाहणु छडि कै करंगी लगा हंसु ॥
फिटु इवेहा जीविआ जितु खाइ वधाइआ पेटु ॥
नानक सचे नाम विणु सभो दुसमनु हेतु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ दिन के वक्त (किए बुरे कर्मों के इसको) सौ उलाहमे (शिकवे-शिकायतें) मिलते हैं और रात (के वक्त किए कर्मों) के हजारों। (जीव-) हंस परमात्मा की सिफत-सालाह (रूप मोती) छोड़ के (विकार रूप) मुर्दा (खाने) में लगा हुआ है (दिन-रात बुरे कर्म कर रहा है। धिक्कार है ऐसा जीना जिसमें सिर्फ खा खा के ही पेट बढ़ा लिया। हे नानक ! प्रभू के इस नाम से वंचित रहने के कारण ये सारा मोह वैरी बन जाता है। 2।

ढाढी गुण गावै नित जनमु सवारिआ ॥

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पउड़ी ॥
ढाढी गुण गावै नित जनमु सवारिआ ॥
गुरमुखि सेवि सलाहि सचा उर धारिआ ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। ढाढी सदा प्रभू के गुण गाता है और अपना जीवन सुंदर बनाता है; गुरू के द्वारा वह प्रभू की बँदगी करके सिफत-सालाह करके सच्चे प्रभू को अपने हृदय में बसाता है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी; महला ३: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ७९० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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