Lulla Family

अंग 791

अंग
791
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
घरु दरु पावै महलु नामु पिआरिआ ॥
गुरमुखि पाइआ नामु हउ गुर कउ वारिआ ॥
तू आपि सवारहि आपि सिरजनहारिआ ॥16॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: प्रभू के नाम को प्यार करके वह प्रभू का घर।प्रभू का दर और महल ढूँढ लेता है। मैं कुर्बान हूं गुरू से।प्रभू का नाम गुरू के द्वारा ही मिलता है। हे सृजनहार प्रभू् ! आप स्वयं ही (गुरू के राह पर चला के जीव का) जीवन सँवारता है। 16।
सलोक मः 1 ॥
दीवा बलै अंधेरा जाइ ॥
बेद पाठ मति पापा खाइ ॥
उगवै सूरु न जापै चंदु ॥
जह गिआन प्रगासु अगिआनु मिटंतु ॥
बेद पाठ संसार की कार ॥
पड़ि॑ पड़ि॑ पंडित करहि बीचार ॥
बिनु बूझे सभ होइ खुआर ॥
नानक गुरमुखि उतरसि पारि ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1 ॥ (जैसे जब) दीपक जलता है तो अंधकार दूर हो जाता है (इसी तरह) वेद (आदि धर्म-पुस्तकों की) बाणी के अनुसार ढली हुई बुद्धि पापों का नाश कर देती है; जब सूर्य चढ़ जाता है चंद्रमा (चढ़ा हुआ) नहीं दिखता। (वैसे ही) जहाँ मति उज्जवल (ज्ञान का प्रकाश) हो जाए वहाँ अज्ञानता मिट जाती है। वेद आदि धर्म-पुस्तकों के (निरे) पाठ तो दुनियावी व्यवहार (समझो)। विद्वान लोक इनको पढ़-पढ़ के इनके सिर्फ अर्थ ही विचारते हैं; जब तक मति नहीं बदलती (निरे पाठ व अर्थ-विचार करने से) दुनिया दुखी ही होती है; हे नानक ! वह मनुष्य ही (पापों के अंधकार से) पार लंघता है जिसने अपनी मति गुरू के हवाले कर दी है। 1।
मः 1 ॥
सबदै सादु न आइओ नामि न लगो पिआरु ॥
रसना फिका बोलणा नित नित होइ खुआरु ॥
नानक पइऐ किरति कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जिस मनुष्य को (कभी) गुरू शबद का रस नहीं आया।जिसका (कभी) प्रभू के नाम में प्यार नहीं बना। वह जीभ से फीके बोल बोलता है और सदा ही ख्वार होता रहता है।(पर)। हे नानक ! (उसके भी वश में क्या।) (हरेक जीव) अपने (अब तक के) किए कर्मों के इकट्ठे हुए संस्कारों के अनुसार काम करता है।कोई मनुष्य इस बने हुए चक्कर को (अपने उद्यम से) मिटा नहीं सकता। 2।
पउड़ी ॥
जि प्रभु सालाहे आपणा सो सोभा पाए ॥
हउमै विचहु दूरि करि सचु मंनि वसाए ॥
सचु बाणी गुण उचरै सचा सुखु पाए ॥
मेलु भइआ चिरी विछुंनिआ गुर पुरखि मिलाए ॥
मनु मैला इव सुधु है हरि नामु धिआए ॥17॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जो मनुष्य अपने परमात्मा की सिफत सालाह करता है वह शोभा कमाता है। मन में से ‘अहंकार’ मिटा के सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू को बसाता है। सतिगुरू की बाणी के द्वारा प्रभू के गुण उचारता है और नाम सिमरता है (इस तरह) असल सुख भोगता है। चिरों से (ईश्वर से) विछुड़े हुए का (दोबारा ईश्वर से) मेल हो जाता है।सतिगुरू मर्द ने (जो) मिला दिया।सो। प्रभू का नाम सिमर के इस तरह मैला मन पवित्र हो जाता है। 17।
सलोक मः 1 ॥
काइआ कूमल फुल गुण नानक गुपसि माल ॥
एनी फुली रउ करे अवर कि चुणीअहि डाल ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1 ॥ हे नानक ! शरीर (तो जैसे।फूलों वाले पौधों की) कोपलें हैं।(परमात्मा के) गुण (इस कोमल टाहनी को।जैसे) फूल हैं।(कोई भाग्यशाली ही इन फूलों का) हार गूँदता है; अगर मनुष्य इन फूलों में लगन लगाए तो (मूर्तियों के आगे भेटा के लिए) और डालियाँ चुनने की क्या जरूरत। 1।
महला 2 ॥
नानक तिना बसंतु है जिन॑ घरि वसिआ कंतु ॥
जिन के कंत दिसापुरी से अहिनिसि फिरहि जलंत ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 2 ॥ हे नानक ! जिन (जीव-) सि्त्रयों का पति घर में बसता है उनके लिए तो बसंत ऋतु आई हुई है; पर जिनके पति परदेस में (गए हुए) हैं।वह दिन-रात जलती फिरतीं हैं। 2।
पउड़ी ॥
आपे बखसे दइआ करि गुर सतिगुर बचनी ॥
अनदिनु सेवी गुण रवा मनु सचै रचनी ॥
प्रभु मेरा बेअंतु है अंतु किनै न लखनी ॥
सतिगुर चरणी लगिआ हरि नामु नित जपनी ॥
जो इछै सो फलु पाइसी सभि घरै विचि जचनी ॥18॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। गुरू सतिगुरू की बाणी में जोड़ के प्रभू स्वयं ही मेहर करके (‘नाम’ की) बख्शिश करता है। (हे प्रभू ! मेहर कर) मैं हर वक्त आपको सिमरता रहूँ आपके गुण याद करूँ और मेरा मन आप सच्चे में जुड़ा रहे। मेरा परमात्मा बेअंत है किसी जीव ने उसका अंत नहीं पाया। गुरू की शरण पड़ कर प्रभू का नाम नित्य सिमरा जा सकता है। (जो सिमरता है) उसकी सारी जरूरतें घर में ही पूरी हो जाती हैं।वह जिस फल की तमन्ना करता है वही उसको मिल जाता है। 18।
सलोक मः 1 ॥
पहिल बसंतै आगमनि पहिला मउलिओ सोइ ॥
जितु मउलिऐ सभ मउलीऐ तिसहि न मउलिहु कोइ ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ जो प्रभू बसंत ऋतु के आने के पहले का है वह ही सबसे पहले का खिला हुआ है। उसके खिलने से सारी सृष्टि खिलती है पर उसको और कोई नहीं खिलाता। 1।
मः 2 ॥
पहिल बसंतै आगमनि तिस का करहु बीचारु ॥
नानक सो सालाहीऐ जि सभसै दे आधारु ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ उस प्रभू (के गुणों) की विचार करो जो बसंत ऋतु के आने से भी पहले का है (भाव।जिसकी बरकति से सारा जगत मौलता है); हे नानक ! उस प्रभू को सिमरें जो सबका आसरा है। 2।
मः 2 ॥
मिलिऐ मिलिआ ना मिलै मिलै मिलिआ जे होइ ॥
अंतर आतमै जो मिलै मिलिआ कहीऐ सोइ ॥3॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महल। ॥2॥ सिर्फ कहने से कि मैं मिला हुआ हूँ मेल नहीं होता।मेल तभी होता है जब सचमुच मिला हुआ हो; अगर अंदर से आत्मा में मिले।उसको मिला हुआ कहना चाहिए। 3।
पउड़ी ॥
हरि हरि नामु सलाहीऐ सचु कार कमावै ॥
दूजी कारै लगिआ फिरि जोनी पावै ॥
नामि रतिआ नामु पाईऐ नामे गुण गावै ॥
गुर कै सबदि सलाहीऐ हरि नामि समावै ॥
सतिगुर सेवा सफल है सेविऐ फल पावै ॥19॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। प्रभू का नाम सिमरना चाहिए (जो सिमरन में लगता है वह) ये सिमरन की कार सदा करता है। ‘नाम’ के बिना और आहरों (कामों) में व्यस्त होने से बार-बार जूनियों में मनुष्य पड़ता है। ‘नाम’ में जुड़ने से ‘नाम’ ही कमाया जाता है प्रभू के ही गुण गाए जाते हैं। जिसने गुरू-शबद के द्वारा सिफत सालाह की है वह नाम में ही लीन रहता है। गुरू के हुकम में चलना बड़ा गुणकारी है।हुकम में चलने से नाम-धन रूप् फल मिलता है। 19।
सलोक मः 2 ॥
किस ही कोई कोइ मंञु निमाणी इकु तू ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2 ॥ (हे प्रभू !) किसी का कोई (मिथा हुआ) आसरा है।किसी का कोई आसरा है।मुझ निमाणी का एक आप ही है।

सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 12 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “प्रभू के नाम को प्यार करके वह प्रभू का घर।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।