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अंग ७९१ · सूही

अंग
791
सूही
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  1. घरु दरु पावै महलु नामु पिआरिआ ॥
  2. दीवा बलै अंधेरा जाइ ॥
  3. सबदै सादु न आइओ नामि न लगो पिआरु ॥
  4. जि प्रभु सालाहे आपणा सो सोभा पाए ॥
  5. काइआ कूमल फुल गुण नानक गुपसि माल ॥
  6. नानक तिना बसंतु है जिन॑ घरि वसिआ कंतु ॥
  7. आपे बखसे दइआ करि गुर सतिगुर बचनी ॥
  8. पहिल बसंतै आगमनि पहिला मउलिओ सोइ ॥
  9. पहिल बसंतै आगमनि तिस का करहु बीचारु ॥
  10. मिलिऐ मिलिआ ना मिलै मिलै मिलिआ जे होइ ॥
  11. हरि हरि नामु सलाहीऐ सचु कार कमावै ॥
  12. किस ही कोई कोइ मंञु निमाणी इकु तू ॥

घरु दरु पावै महलु नामु पिआरिआ ॥

अंग ७९० से चला आ रहा अंश

घरु दरु पावै महलु नामु पिआरिआ ॥
गुरमुखि पाइआ नामु हउ गुर कउ वारिआ ॥
तू आपि सवारहि आपि सिरजनहारिआ ॥16॥

हिन्दी अर्थ: प्रभू के नाम को प्यार करके वह प्रभू का घर।प्रभू का दर और महल ढूँढ लेता है। मैं कुर्बान हूं गुरू से।प्रभू का नाम गुरू के द्वारा ही मिलता है। हे सृजनहार प्रभू् ! आप स्वयं ही (गुरू के राह पर चला के जीव का) जीवन सँवारते हैं। 16।

दीवा बलै अंधेरा जाइ ॥

सलोक मः 1 ॥
दीवा बलै अंधेरा जाइ ॥
बेद पाठ मति पापा खाइ ॥
उगवै सूरु न जापै चंदु ॥
जह गिआन प्रगासु अगिआनु मिटंतु ॥
बेद पाठ संसार की कार ॥
पड़ि॑ पड़ि॑ पंडित करहि बीचार ॥
बिनु बूझे सभ होइ खुआर ॥
नानक गुरमुखि उतरसि पारि ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1 ॥ (जैसे जब) दीपक जलता है तो अंधकार दूर हो जाता है (इसी तरह) वेद (आदि धर्म-पुस्तकों की) बाणी के अनुसार ढली हुई बुद्धि पापों का नाश कर देती है; जब सूर्य चढ़ जाता है चंद्रमा (चढ़ा हुआ) नहीं दिखता। (वैसे ही) जहाँ मति उज्जवल (ज्ञान का प्रकाश) हो जाए वहाँ अज्ञानता मिट जाती है। वेद आदि धर्म-पुस्तकों के (निरे) पाठ तो दुनियावी व्यवहार (समझो)। विद्वान लोक इनको पढ़-पढ़ के इनके सिर्फ अर्थ ही विचारते हैं; जब तक मति नहीं बदलती (निरे पाठ व अर्थ-विचार करने से) दुनिया दुखी ही होती है; हे नानक ! वह मनुष्य ही (पापों के अंधकार से) पार लंघता है जिसने अपनी मति गुरू के हवाले कर दी है। 1।

सबदै सादु न आइओ नामि न लगो पिआरु ॥

मः 1 ॥
सबदै सादु न आइओ नामि न लगो पिआरु ॥
रसना फिका बोलणा नित नित होइ खुआरु ॥
नानक पइऐ किरति कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जिस मनुष्य को (कभी) गुरू शबद का रस नहीं आया।जिसका (कभी) प्रभू के नाम में प्यार नहीं बना। वह जीभ से फीके बोल बोलता है और सदा ही ख्वार होता रहता है।(पर)। हे नानक ! (उसके भी वश में क्या।) (हरेक जीव) अपने (अब तक के) किए कर्मों के इकट्ठे हुए संस्कारों के अनुसार काम करता है।कोई मनुष्य इस बने हुए चक्कर को (अपने उद्यम से) मिटा नहीं सकता। 2।

जि प्रभु सालाहे आपणा सो सोभा पाए ॥

पउड़ी ॥
जि प्रभु सालाहे आपणा सो सोभा पाए ॥
हउमै विचहु दूरि करि सचु मंनि वसाए ॥
सचु बाणी गुण उचरै सचा सुखु पाए ॥
मेलु भइआ चिरी विछुंनिआ गुर पुरखि मिलाए ॥
मनु मैला इव सुधु है हरि नामु धिआए ॥17॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जो मनुष्य अपने परमात्मा की सिफत सालाह करता है वह शोभा कमाता है। मन में से ‘अहंकार’ मिटा के सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू को बसाता है। सतिगुरू की बाणी के द्वारा प्रभू के गुण उचारता है और नाम सिमरता है (इस तरह) असल सुख भोगता है। चिरों से (ईश्वर से) विछुड़े हुए का (दोबारा ईश्वर से) मेल हो जाता है।सतिगुरू मर्द ने (जो) मिला दिया।सो। प्रभू का नाम सिमर के इस तरह मैला मन पवित्र हो जाता है। 17।

काइआ कूमल फुल गुण नानक गुपसि माल ॥

सलोक मः 1 ॥
काइआ कूमल फुल गुण नानक गुपसि माल ॥
एनी फुली रउ करे अवर कि चुणीअहि डाल ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1 ॥ हे नानक ! शरीर (तो जैसे।फूलों वाले पौधों की) कोपलें हैं।(परमात्मा के) गुण (इस कोमल टाहनी को।जैसे) फूल हैं।(कोई भाग्यशाली ही इन फूलों का) हार गूँदता है; अगर मनुष्य इन फूलों में लगन लगाए तो (मूर्तियों के आगे भेटा के लिए) और डालियाँ चुनने की क्या जरूरत। 1।

नानक तिना बसंतु है जिन॑ घरि वसिआ कंतु ॥

महला 2 ॥
नानक तिना बसंतु है जिन॑ घरि वसिआ कंतु ॥
जिन के कंत दिसापुरी से अहिनिसि फिरहि जलंत ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 2 ॥ हे नानक ! जिन (जीव-) सि्त्रयों का पति घर में बसता है उनके लिए तो बसंत ऋतु आई हुई है; पर जिनके पति परदेस में (गए हुए) हैं।वह दिन-रात जलती फिरतीं हैं। 2।

आपे बखसे दइआ करि गुर सतिगुर बचनी ॥

पउड़ी ॥
आपे बखसे दइआ करि गुर सतिगुर बचनी ॥
अनदिनु सेवी गुण रवा मनु सचै रचनी ॥
प्रभु मेरा बेअंतु है अंतु किनै न लखनी ॥
सतिगुर चरणी लगिआ हरि नामु नित जपनी ॥
जो इछै सो फलु पाइसी सभि घरै विचि जचनी ॥18॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। गुरू सतिगुरू की बाणी में जोड़ के प्रभू स्वयं ही मेहर करके (‘नाम’ की) बख्शिश करता है। (हे प्रभू ! मेहर कर) मैं हर वक्त आपको सिमरता रहूँ आपके गुण याद करूँ और मेरा मन आप सच्चे में जुड़ा रहे। मेरा परमात्मा बेअंत है किसी जीव ने उसका अंत नहीं पाया। गुरू की शरण पड़ कर प्रभू का नाम नित्य सिमरा जा सकता है। (जो सिमरता है) उसकी सारी जरूरतें घर में ही पूरी हो जाती हैं।वह जिस फल की तमन्ना करता है वही उसको मिल जाता है। 18।

पहिल बसंतै आगमनि पहिला मउलिओ सोइ ॥

सलोक मः 1 ॥
पहिल बसंतै आगमनि पहिला मउलिओ सोइ ॥
जितु मउलिऐ सभ मउलीऐ तिसहि न मउलिहु कोइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ जो प्रभू बसंत ऋतु के आने के पहले का है वह ही सबसे पहले का खिला हुआ है। उसके खिलने से सारी सृष्टि खिलती है पर उसको और कोई नहीं खिलाता। 1।

पहिल बसंतै आगमनि तिस का करहु बीचारु ॥

मः 2 ॥
पहिल बसंतै आगमनि तिस का करहु बीचारु ॥
नानक सो सालाहीऐ जि सभसै दे आधारु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ उस प्रभू (के गुणों) की विचार करो जो बसंत ऋतु के आने से भी पहले का है (भाव।जिसकी बरकति से सारा जगत मौलता है); हे नानक ! उस प्रभू को सिमरें जो सबका आसरा है। 2।

मिलिऐ मिलिआ ना मिलै मिलै मिलिआ जे होइ ॥

मः 2 ॥
मिलिऐ मिलिआ ना मिलै मिलै मिलिआ जे होइ ॥
अंतर आतमै जो मिलै मिलिआ कहीऐ सोइ ॥3॥

हिन्दी अर्थ: महल। ॥2॥ सिर्फ कहने से कि मैं मिला हुआ हूँ मेल नहीं होता।मेल तभी होता है जब सचमुच मिला हुआ हो; अगर अंदर से आत्मा में मिले।उसको मिला हुआ कहना चाहिए। 3।

हरि हरि नामु सलाहीऐ सचु कार कमावै ॥

पउड़ी ॥
हरि हरि नामु सलाहीऐ सचु कार कमावै ॥
दूजी कारै लगिआ फिरि जोनी पावै ॥
नामि रतिआ नामु पाईऐ नामे गुण गावै ॥
गुर कै सबदि सलाहीऐ हरि नामि समावै ॥
सतिगुर सेवा सफल है सेविऐ फल पावै ॥19॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। प्रभू का नाम सिमरना चाहिए (जो सिमरन में लगता है वह) ये सिमरन की कार सदा करता है। ‘नाम’ के बिना और आहरों (कामों) में व्यस्त होने से बार-बार जूनियों में मनुष्य पड़ता है। ‘नाम’ में जुड़ने से ‘नाम’ ही कमाया जाता है प्रभू के ही गुण गाए जाते हैं। जिसने गुरू-शबद के द्वारा सिफत सालाह की है वह नाम में ही लीन रहता है। गुरू के हुकम में चलना बड़ा गुणकारी है।हुकम में चलने से नाम-धन रूप् फल मिलता है। 19।

किस ही कोई कोइ मंञु निमाणी इकु तू ॥

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सलोक मः 2 ॥
किस ही कोई कोइ मंञु निमाणी इकु तू ॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2 ॥ (हे प्रभू !) किसी का कोई (मिथा हुआ) आसरा है।किसी का कोई आसरा है।मुझ निमाणी का एक आप ही हैं।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी; महला २: गुरु अंगद देव जी; महला ३: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ७९१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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