Lulla Family

अंग ६१५ · सोरठ

अंग
615
सोरठ
अंग बदलें या अंश चुनें · ४ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. पूरन पारब्रहम परमेसुर मेरे मन सदा धिआईऐ ॥1॥
  2. गुण गावहु पूरन अबिनासी काम क्रोध बिखु जारे ॥
  3. करण करावणहार प्रभु दाता पारब्रहम प्रभु सुआमी ॥
  4. प्रभ की सरणि सगल भै लाथे दुख बिनसे सुखु पाइआ ॥

पूरन पारब्रहम परमेसुर मेरे मन सदा धिआईऐ ॥1॥

अंग ६१४ से चला आ रहा अंश

पूरन पारब्रहम परमेसुर मेरे मन सदा धिआईऐ ॥1॥
सिमरहु हरि हरि नामु परानी ॥
बिनसै काची देह अगिआनी ॥ रहाउ ॥
म्रिग त्रिसना अरु सुपन मनोरथ ता की कछु न वडाई ॥
राम भजन बिनु कामि न आवसि संगि न काहू जाई ॥2॥
हउ हउ करत बिहाइ अवरदा जीअ को कामु न कीना ॥
धावत धावत नह त्रिपतासिआ राम नामु नही चीना ॥3॥
साद बिकार बिखै रस मातो असंख खते करि फेरे ॥
नानक की प्रभ पाहि बिनंती काटहु अवगुण मेरे ॥4॥11॥22॥

हिन्दी अर्थ: हे मेरे मन ! सर्व-व्यापक पारब्रहम परमेश्वर का नाम सदा सिमरना चाहिए। 1। हे बंदे ! सदा परमात्मा का नाम सिमरा कर। हे ज्ञानहीन ! ये शरीर सदा कायम रहने वाला नहीं।ये जरूर नाश हो जाता है।रहाउ। (हे भाई ! ये माया) मृग त्रिष्णा है (जो प्यासे हिरन को भगा भगा के मार देती है) सपनों में मिले पदार्थ हैं।(आत्मिक जीवन वाले देश में) इस माया को कुछ भी इज्जत नहीं मिलती। परमात्मा के भजन के बिना (कोई और चीज) काम नहीं आती।ये माया (अंत में) किसी के भी काम नहीं आती। 2। (हे भाई ! माया-ग्रसित मनुष्य की) उम्र (माया का) गुमान करते ही बीत जाती है।वह कोई ऐसा काम नहीं करता जो प्राणों के लाभ के लिए हैं। (सारी उम्र माया की खातिर) दौड़ता-भटकता रहता है।तृप्त नहीं होता।परमात्मा के नाम के साथ सांझ नहीं डालता। 3। हे भाई ! माया-ग्रसित मनुष्य चस्कों में विकारों में पदार्थों के स्वादो में मस्त रहता है।बेअंत पाप कर करके जनम मरन के चक्कर में पड़ा रहता है। हे भाई ! नानक की आरजू तो प्रभू के पास ही है (नानक प्रभू को ही कहता है, हे प्रभू !) मेरे अवगुण काट दे। 4। 11। 22।

गुण गावहु पूरन अबिनासी काम क्रोध बिखु जारे ॥

सोरठि महला 5 ॥
गुण गावहु पूरन अबिनासी काम क्रोध बिखु जारे ॥
महा बिखमु अगनि को सागरु साधू संगि उधारे ॥1॥
पूरै गुरि मेटिओ भरमु अंधेरा ॥
भजु प्रेम भगति प्रभु नेरा ॥ रहाउ ॥
हरि हरि नामु निधान रसु पीआ मन तन रहे अघाई ॥
जत कत पूरि रहिओ परमेसरु कत आवै कत जाई ॥2॥
जप तप संजम गिआन तत बेता जिसु मनि वसै गोुपाला ॥
नामु रतनु जिनि गुरमुखि पाइआ ता की पूरन घाला ॥3॥
कलि कलेस मिटे दुख सगले काटी जम की फासा ॥
कहु नानक प्रभि किरपा धारी मन तन भए बिगासा ॥4॥12॥23॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ (हे भाई ! पूरे गुरू की शरण पड़ कर) सर्व-व्यापक नाश-रहित प्रभू के गुण गाया कर।(जो मनुष्य ये उद्यम करता है गुरू उसके अंदर से आत्मिक मौत लाने वाले) काम-क्रोध (आदि की) जहर जला देता है। (ये जगत विकारों की) आग का समुंद्र (है।इस में से पार लांघना) बहुत कठिन है (सिफत सालाह के गीत गाने वाले मनुष्य को गुरू) साध-संगति में (रख के इस समुंद्र में से) पार लंघा देता है। 1। (हे भाई ! पूरे गुरू की शरण पड़ो।जो मनुष्य पूरे गुरू की शरण पड़ा) पूरे गुरू ने (उसका) भरम मिटा दिया।(उसका माया के मोह का) अंधेरा दूर कर दिया। (हे भाई ! आप भी गुरू की शरण पड़ कर) प्रेमा भक्ति से प्रभू के भजन किया कर।(आपको) प्रभू अंग-संग (दिख जाएगा)।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा का नाम (सारे रसों का खजाना है।जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर इस) खजाने का रस पीता है।उसका मन उसका तन (माया के रसों की ओर से) तृप्त हो जाते हैं। उसे हर जगह परमात्मा व्याप्त दिख पड़ता है।वह मनुष्य फिर ना पैदा होता है ना मरता है। 2। हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर नाम रत्न पा लिया।उसकी (आत्मिक जीवन वाली) मेहनत कामयाब हो गई।(गुरू के द्वारा) जिस मनुष्य के मन में सृष्टि का पालनहार आ बसता है। वह मनुष्य असल जप-तप-संयम के भेद को समझने वाला हो जाता है वह मनुष्य आत्मिक सूझ का ज्ञाता हो जाता है। 3। उस मनुष्य की जमों वाली जंजीरें काटी गई (उसके गले से माया के मोह की फाही कट गई जो आत्मिक मौत ला के उसे जमों के वश में करती है)।उसके सारे दुख-कलेश-कष्ट दूर हो गए। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य पर प्रभू ने मेहर की (उसको प्रभू ने गुरू मिला दिया।और) उसका मन उसका तन आत्मिक आनंद से प्रफुल्लित हो गया। 4। 12। 23।

करण करावणहार प्रभु दाता पारब्रहम प्रभु सुआमी ॥

सोरठि महला 5 ॥
करण करावणहार प्रभु दाता पारब्रहम प्रभु सुआमी ॥
सगले जीअ कीए दइआला सो प्रभु अंतरजामी ॥1॥
मेरा गुरु होआ आपि सहाई ॥
सूख सहज आनंद मंगल रस अचरज भई बडाई ॥ रहाउ ॥
गुर की सरणि पए भै नासे साची दरगह माने ॥
गुण गावत आराधि नामु हरि आए अपुनै थाने ॥2॥
जै जै कारु करै सभ उसतति संगति साध पिआरी ॥
सद बलिहारि जाउ प्रभ अपुने जिनि पूरन पैज सवारी ॥3॥
गोसटि गिआनु नामु सुणि उधरे जिनि जिनि दरसनु पाइआ ॥
भइओ क्रिपालु नानक प्रभु अपुना अनद सेती घरि आइआ ॥4॥13॥24॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ (हे भाई ! जिस मनुष्य का मददगार गुरू बन जाता है।उसे निश्चय हो जाता है कि) परमात्मा सब कुछ कर सकने वाला है (जीवों से) सब कुछ करवा सकने वाला है।सब जीवों को दातें देने वाला है।सब का मालिक है। सारे जीव उसी दया के घर प्रभू के पैदा किए हुए हैं।वह प्रभू हरेक के दिल की जानने वाला है। 1। हे भाई ! मेरा गुरू (जिस मनुष्य का) मददगार खुद बनता है। उस मनुष्य के अंदर आत्मिक अडोलता के सुख आनंद खुशियां व स्वाद उघड़ आते हैं।उस मनुष्य को (लोक-परलोक में) ऐसी इज्जत मिलती है कि हैरान हो जाते हैं।रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण आ पड़ते हैं।उनके सारे डर दूर हो जाते हैं।सदा स्थिर रहने वाले प्रभू की हजूरी में उन्हें आदर मिलता है। परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गा के परमात्मा का नाम सिमर के वह अपने (उस हृदय-) स्थल में आ टिकते हैं (जहाँ कोई विकार उन्हें निकाल के भटकना में नहीं डाल सकता)। 2। हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू की संगति प्यारी लगने लग पड़ती है।सारी दुनिया उसकी सराहना करती है।शोभा करती है। हे भाई ! मैं (भी) अपने प्रभू से सदा सदके जाता हूँ जिसने (मुझे गुरू की शरण डाल के) मेरी इज्जत पूरे तौर पर रख ली है। 3। हे भाई ! जिस जिस मनुष्य ने (गुरू के) दर्शन किए हैं।उन्हें प्रभू का मिलाप प्राप्त हो गया।उनको आत्मिक जीवन की समझ प्राप्त हो गई।प्रभू का नाम सुन-सुन के वे मनुष्य (विकारों के हमलों से) बच गए। हे नानक ! जिस मनुष्य पर प्यारा प्रभू दयावान हुआ वह मनुष्य आत्मिक आनंद से प्रभू चरनों में लीन हो गया। 4। 13। 24।

प्रभ की सरणि सगल भै लाथे दुख बिनसे सुखु पाइआ ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

सोरठि महला 5 ॥
प्रभ की सरणि सगल भै लाथे दुख बिनसे सुखु पाइआ ॥
दइआलु होआ पारब्रहमु सुआमी पूरा सतिगुरु धिआइआ ॥1॥
प्रभ जीउ तू मेरो साहिबु दाता ॥
करि किरपा प्रभ दीन दइआला गुण गावउ रंगि राता ॥ रहाउ ॥
सतिगुरि नामु निधानु द्रिड़ाइआ चिंता सगल बिनासी ॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा की शरण पड़ने से उसके सारे डर उतर जाते हैं।सारे दुख दूर हो जाते हैं।वह (सदा) आत्मिक आनंद लेता है। जो मनुष्य पूरे गुरू का ध्यान धरता है।उस पर मालिक परमात्मा दयावान होता है 1। हे प्रभू जी ! आप मेरे मालिक हैं।आप मुझे सारी दातें देने वाले हैं। हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू ! (मेरे पर) मेहर कर।मैं आपके प्रेम-रंग में रंग के आपके गुण गाता रहूँ।रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में गुरू ने सारे सुखों का खजाना प्रभू-नाम पक्का कर दिया।उसकी सारी चिंताएं दूर हो गई।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ६१५ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English