ता कउ बिघनु न कोऊ लागै जो सतिगुरि अपुनै राखे ॥
चरन कमल बसे रिद अंतरि अंम्रित हरि रसु चाखे ॥3॥
करि सेवा सेवक प्रभ अपुने जिनि मन की इछ पुजाई ॥
नानक दास ता कै बलिहारै जिनि पूरन पैज रखाई ॥4॥14॥25॥
माइआ मोह मगनु अंधिआरै देवनहारु न जानै ॥
जीउ पिंडु साजि जिनि रचिआ बलु अपुनो करि मानै ॥1॥
मन मूड़े देखि रहिओ प्रभ सुआमी ॥
जो किछु करहि सोई सोई जाणै रहै न कछूऐ छानी ॥ रहाउ ॥
जिहवा सुआद लोभ मदि मातो उपजे अनिक बिकारा ॥
बहुतु जोनि भरमत दुखु पाइआ हउमै बंधन के भारा ॥2॥
देइ किवाड़ अनिक पड़दे महि पर दारा संगि फाकै ॥
चित्र गुपतु जब लेखा मागहि तब कउणु पड़दा तेरा ढाकै ॥3॥
दीन दइआल पूरन दुख भंजन तुम बिनु ओट न काई ॥
काढि लेहु संसार सागर महि नानक प्रभ सरणाई ॥4॥15॥26॥
पारब्रहमु होआ सहाई कथा कीरतनु सुखदाई ॥
गुर पूरे की बाणी जपि अनदु करहु नित प्राणी ॥1॥
हरि साचा सिमरहु भाई ॥
साधसंगि सदा सुखु पाईऐ हरि बिसरि न कबहू जाई ॥ रहाउ ॥
अंम्रित नामु परमेसरु तेरा जो सिमरै सो जीवै ॥
जिस नो करमि परापति होवै सो जनु निरमलु थीवै ॥2॥
बिघन बिनासन सभि दुख नासन गुर चरणी मनु लागा ॥
गुण गावत अचुत अबिनासी अनदिनु हरि रंगि जागा ॥3॥
मन इछे सेई फल पाए हरि की कथा सुहेली ॥
आदि अंति मधि नानक कउ सो प्रभु होआ बेली ॥4॥16॥27॥
बिनसै मोहु मेरा अरु तेरा बिनसै अपनी धारी ॥1॥
संतहु इहा बतावहु कारी ॥
जितु हउमै गरबु निवारी ॥1॥ रहाउ ॥
सरब भूत पारब्रहमु करि मानिआ होवां सगल रेनारी ॥2॥
पेखिओ प्रभ जीउ अपुनै संगे चूकै भीति भ्रमारी ॥3॥
अउखधु नामु निरमल जलु अंम्रितु पाईऐ गुरू दुआरी ॥4॥
कहु नानक जिसु मसतकि लिखिआ तिसु गुर मिलि रोग बिदारी ॥5॥17॥28॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमात्मा मेहर करके उसको अपना बना लेता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।