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अंग 616

अंग
616
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
करि किरपा अपुनो करि लीना मनि वसिआ अबिनासी ॥2॥
ता कउ बिघनु न कोऊ लागै जो सतिगुरि अपुनै राखे ॥
चरन कमल बसे रिद अंतरि अंम्रित हरि रसु चाखे ॥3॥
करि सेवा सेवक प्रभ अपुने जिनि मन की इछ पुजाई ॥
नानक दास ता कै बलिहारै जिनि पूरन पैज रखाई ॥4॥14॥25॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: परमात्मा मेहर करके उसको अपना बना लेता है।उसके मन में नाश-रहित परमात्मा आ बसता है। 2। हे भाई ! अपने गुरू ने जिस मनुष्य की रक्षा की उसको (आत्मिक जीवन के रास्ते में) कोई रुकावट नहीं आती। परमात्मा के कमल-फूल जैसे कोमल चरण उसके हृदय में आ बसते हैं।वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम-रस सदा चखता है। 3। हे भाई ! जिस परमात्मा ने (हर वक्त) आपके मन की (हरेक) कामना पूरी की है।सेवक की तरह उसकी सेवा-भक्ति करता रह। हे दास नानक ! (कह) मैं उस प्रभू से सदके जाता हूँ।जिसने (विघनों से मुकाबले पर हर समय) पूरी तौर पर इज्जत बचा के रखी है। 4। 14। 25।
सोरठि महला 5 ॥
माइआ मोह मगनु अंधिआरै देवनहारु न जानै ॥
जीउ पिंडु साजि जिनि रचिआ बलु अपुनो करि मानै ॥1॥
मन मूड़े देखि रहिओ प्रभ सुआमी ॥
जो किछु करहि सोई सोई जाणै रहै न कछूऐ छानी ॥ रहाउ ॥
जिहवा सुआद लोभ मदि मातो उपजे अनिक बिकारा ॥
बहुतु जोनि भरमत दुखु पाइआ हउमै बंधन के भारा ॥2॥
देइ किवाड़ अनिक पड़दे महि पर दारा संगि फाकै ॥
चित्र गुपतु जब लेखा मागहि तब कउणु पड़दा तेरा ढाकै ॥3॥
दीन दइआल पूरन दुख भंजन तुम बिनु ओट न काई ॥
काढि लेहु संसार सागर महि नानक प्रभ सरणाई ॥4॥15॥26॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! माया के मोह के (आत्मिक) अंधकार में मस्त रहके, उस सब दातें देने वाले प्रभू के साथ जीव गहरी सांझ नहीं डालता। जिस परमात्मा ने शरीर-जिंद बना के जीव को पैदा किया हुआ है। (आप) अपनी ताकत को बड़ा समझता है। 1। हे मूर्ख मन ! मालिक प्रभू (आपकी सारी करतूतें हर वक्त) देख रहा है। आप जो कुछ करता है।(मालिक प्रभू) वही वही जान लेता है।(उससे आपकी) कोई भी करतूत छुपी नहीं रह सकती।रहाउ। हे भाई ! मनुष्य जीभ के स्वादों में।लोभ के नशे में मस्त रहता है (जिसके कारण इसके अंदर) अनेकों विकार पैदा हो जाते हैं। मनुष्य अहंकार की जंजीरों के भार तले दब जाता है।बहुत जूनियों में भटकता फिरता है।और दुख सहता रहता है। 2। (माया के मोह के अंधकार में फसा मनुष्य) दरवाजे बंद करके अनेकों पर्दों के पीछे पराई स्त्री के साथ कुकर्म करता है।(पर। हे भाई !) जब (धर्मराज के दूत) चित्र और गुप्त (आपकी करतूतों का) हिसाब मांगेंगे।तब कोई भी आपकी करतूतों पर पर्दा नहीं डाल सकेगा। 3। हे नानक ! कह, दीनों पर दया करने वाले ! हे सर्व-व्यापक ! हे दुखों का नाश करने वाले ! आपके बग़ैर और कोई आसरा नहीं। हे प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हूँ।संसार समुंद्र में (डूबते हुए की मेरी बाँह पकड़ के) निकाल ले। 4। 15। 26।
सोरठि महला 5 ॥
पारब्रहमु होआ सहाई कथा कीरतनु सुखदाई ॥
गुर पूरे की बाणी जपि अनदु करहु नित प्राणी ॥1॥
हरि साचा सिमरहु भाई ॥
साधसंगि सदा सुखु पाईऐ हरि बिसरि न कबहू जाई ॥ रहाउ ॥
अंम्रित नामु परमेसरु तेरा जो सिमरै सो जीवै ॥
जिस नो करमि परापति होवै सो जनु निरमलु थीवै ॥2॥
बिघन बिनासन सभि दुख नासन गुर चरणी मनु लागा ॥
गुण गावत अचुत अबिनासी अनदिनु हरि रंगि जागा ॥3॥
मन इछे सेई फल पाए हरि की कथा सुहेली ॥
आदि अंति मधि नानक कउ सो प्रभु होआ बेली ॥4॥16॥27॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ (जो मनुष्य सतिगुरू की बाणी से प्यार बनाता है) परमात्मा (उसका) मददगार बन जाता है।परमात्मा की सिफत सालाह (उसके अंदर) आत्मिक आनंद पैदा करती है। हे प्राणी ! पूरे गुरू की (सिफत सालाह की) बाणी हमेशा पढ़ा कर।और।आत्मिक आनंद लिया कर। 1। हे भाई ! सदा कायम रहने वाले परमात्मा का सिमरन करते रहा करो। (सिमरन की बरकति से) साध-संगति में सदा आत्मिक आनंद लेते हैं।और परमात्मा को कभी नहीं भूलते।रहाउ। हे सबसे ऊँचे मालिक ! (परमेश्वर !) आपका नाम आत्मिक जीवन देने वाला है।जो मनुष्य आपका नाम सिमरता है वह आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है। जिस मनुष्य को आपकी मेहर से (हे परमेश्वर !) आपका नाम हासिल होता है।वह मनुष्य पवित्र जीवन वाला बन जाता है। 2। (हे भाई ! गुरू के चरण आत्मिक जीवन के राह की सारी) रुकावटों का नाश करने वाले हैं।सारे दुख दूर करने वाले हैं।जिस मनुष्य का मन गुरू के चरणों में परचता है। वह मनुष्य हर समय अविनाशी व अटल परमात्मा के गुण गाता गाता प्रभू के प्रेम-रंग में लीन हो के (माया के हमलों से) सचेत रहता है। 3। हे भाई ! परमात्मा की सिफत सालाह आत्मिक आनंद देने वाली है (सिफत सालाह करने वाला मनुष्य) वही फल प्राप्त कर लेता है जिसकी कामना उसका मन करता है। हे भाई ! (सिफत सालाह की बरकति से) परमात्मा नानक के लिए सदा मददगार बन गया है। 4। 16। 27।
सोरठि महला 5 पंचपदा ॥
बिनसै मोहु मेरा अरु तेरा बिनसै अपनी धारी ॥1॥
संतहु इहा बतावहु कारी ॥
जितु हउमै गरबु निवारी ॥1॥ रहाउ ॥
सरब भूत पारब्रहमु करि मानिआ होवां सगल रेनारी ॥2॥
पेखिओ प्रभ जीउ अपुनै संगे चूकै भीति भ्रमारी ॥3॥
अउखधु नामु निरमल जलु अंम्रितु पाईऐ गुरू दुआरी ॥4॥
कहु नानक जिसु मसतकि लिखिआ तिसु गुर मिलि रोग बिदारी ॥5॥17॥28॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 पंचपदा ॥ (जिस इलाज से मेरे अंदर से) मोह का नाश हो जाए।मेर-तेर वाला भेदभाव दूर हो जाए।मेरी माया से पकड़ खत्म हो जाए। 1। हे संत जनो ! (मुझे कोई) ऐसा इलाज बताओ। जिससे मैं (अपने अंदर से) अहंकार को दूर कर सकूँ।रहाउ। (जिस उपचार से) परमात्मा सभी जीवों में बसा हुआ माना जा सके।और।मैं सभी के चरणों की धूड़ बना रहूँ। 2। (जिस इलाज से) परमात्मा अपने अंग-संग देखा जा सके।और (मेरे अंदर से) माया की खातिर भटकने वाली दीवार दूर हो जाए (जो परमात्मा से दूरियां डाले हुए है)। 3। (हे भाई !) वह दवा तो परमात्मा का नाम ही है।आत्मिक जीवन देने वाला पवित्र नाम-जल ही है।ये नाम गुरू के दर से मिलता है। 4। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य के माथे पर (नाम की प्राप्ति का लेख) लिखा हो।(उसे नाम गुरू से मिलता है और)।गुरू को मिल के उसके रोग काटे जाते हैं। 5। 17। 28।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमात्मा मेहर करके उसको अपना बना लेता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।