अनदु भइआ पेखत ही नानक प्रताप पुरख निरबाणी ॥4॥7॥18॥
हम संतन की रेनु पिआरे हम संतन की सरणा ॥
संत हमारी ओट सताणी संत हमारा गहणा ॥1॥
हम संतन सिउ बणि आई ॥
पूरबि लिखिआ पाई ॥
इहु मनु तेरा भाई ॥ रहाउ ॥
संतन सिउ मेरी लेवा देवी संतन सिउ बिउहारा ॥
संतन सिउ हम लाहा खाटिआ हरि भगति भरे भंडारा ॥2॥
संतन मो कउ पूंजी सउपी तउ उतरिआ मन का धोखा ॥
धरम राइ अब कहा करैगो जउ फाटिओ सगलो लेखा ॥3॥
महा अनंद भए सुखु पाइआ संतन कै परसादे ॥
कहु नानक हरि सिउ मनु मानिआ रंगि रते बिसमादे ॥4॥8॥19॥
जेती समग्री देखहु रे नर तेती ही छडि जानी ॥
राम नाम संगि करि बिउहारा पावहि पदु निरबानी ॥1॥
पिआरे तू मेरो सुखदाता ॥
गुरि पूरै दीआ उपदेसा तुम ही संगि पराता ॥ रहाउ ॥
काम क्रोध लोभ मोह अभिमाना ता महि सुखु नही पाईऐ ॥
होहु रेन तू सगल की मेरे मन तउ अनद मंगल सुखु पाईऐ ॥2॥
घाल न भानै अंतर बिधि जानै ता की करि मन सेवा ॥
करि पूजा होमि इहु मनूआ अकाल मूरति गुरदेवा ॥3॥
गोबिद दामोदर दइआल माधवे पारब्रहम निरंकारा ॥
नामु वरतणि नामो वालेवा नामु नानक प्रान अधारा ॥4॥9॥20॥
मिरतक कउ पाइओ तनि सासा बिछुरत आनि मिलाइआ ॥
पसू परेत मुगध भए स्रोते हरि नामा मुखि गाइआ ॥1॥
पूरे गुर की देखु वडाई ॥
ता की कीमति कहणु न जाई ॥ रहाउ ॥
दूख सोग का ढाहिओ डेरा अनद मंगल बिसरामा ॥
मन बांछत फल मिले अचिंता पूरन होए कामा ॥2॥
ईहा सुखु आगै मुख ऊजल मिटि गए आवण जाणे ॥
निरभउ भए हिरदै नामु वसिआ अपुने सतिगुर कै मनि भाणे ॥3॥
ऊठत बैठत हरि गुण गावै दूखु दरदु भ्रमु भागा ॥
कहु नानक ता के पूर करंमा जा का गुर चरनी मनु लागा ॥4॥10॥21॥
रतनु छाडि कउडी संगि लागे जा ते कछू न पाईऐ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह) हे सर्व-व्यापक प्रभू ! जब आप खुद ही (किसी जीव को) साध-संगति में मिलाता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।