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अंग ५९९ · सोरठ

अंग
599
सोरठ
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  1. जो अंतरि सो बाहरि देखहु अवरु न दूजा कोई जीउ ॥
  2. जा तिसु भावा तद ही गावा ॥
  3. सेवक सेव करहि सभि तेरी जिन सबदै सादु आइआ ॥

जो अंतरि सो बाहरि देखहु अवरु न दूजा कोई जीउ ॥

अंग ५९८ से चला आ रहा अंश

जो अंतरि सो बाहरि देखहु अवरु न दूजा कोई जीउ ॥
गुरमुखि एक द्रिसटि करि देखहु घटि घटि जोति समोई जीउ ॥2॥
चलतौ ठाकि रखहु घरि अपनै गुर मिलिऐ इह मति होई जीउ ॥
देखि अद्रिसटु रहउ बिसमादी दुखु बिसरै सुखु होई जीउ ॥3॥
पीवहु अपिउ परम सुखु पाईऐ निज घरि वासा होई जीउ ॥
जनम मरण भव भंजनु गाईऐ पुनरपि जनमु न होई जीउ ॥4॥
ततु निरंजनु जोति सबाई सोहं भेदु न कोई जीउ ॥
अपरंपर पारब्रहमु परमेसरु नानक गुरु मिलिआ सोई जीउ ॥5॥11॥

हिन्दी अर्थ: हे मेरे मन ! जो प्रभू आपके अंदर बस रहा है उसको बाहर (सारी कायनात में) देख।उसके बिना (उस जैसा) और कोई नहीं। गुरू के बताए हुए राह पर चल कर उस एक को देखने वाली नजर बना (फिर आपको दिख जाएगा कि) हरेक शरीर में एक परमात्मा की ही ज्योति मौजूद है। 2। (हे भाई !) इस (बाहर) भटकते (मन) को रोक के अपने अंदर (बसते प्रभू में) टिका के रख।पर गुरू को मिल के ही ये मति आती है। मैं तो (गुरू की कृपा से) उस अदृश्य प्रभू को (सब में बसता) देख के विस्माद अवस्था में पहुँच जाता हूँ।(जो भी ये दीदार करता है।उसका) दुख मिट जाता है उसको आत्मिक आनंद मिल जाता है। 3। (हे भाई !) अटल आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पी।(ये नाम-रस पीने से) सबसे ऊँचा आत्मिक आनंद मिलता है।और अपने घर में ठिकाना हो जाता है (भाव।सुखों की खातिर मन बाहर भटकने से हट जाता है)। (हे भाई !) जनम-मरण का चक्कर नाश करने वाले प्रभू की सिफत-सालाह करनी चाहिए (इस तरह) बार-बार जनम (मरण) नहीं होता। 4। (हे भाई !) परमात्मा सारे जगत की अस्लियत है (असल मूल तत्व है)।(खुद) माया के प्रभाव से रहित है।प्रभू पारब्रहम परे से परे है और सबसे बड़ा मालिक है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू को मिल लेता है उसको (दिखाई दे जाता है कि) उस प्रभू की ज्योति हर जगह शोभायमान है (और उसकी व्यापकता में कहीं) कोई भेद-भाव नहीं। 5। 11।

जा तिसु भावा तद ही गावा ॥

सोरठि महला 1 घरु 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जा तिसु भावा तद ही गावा ॥
ता गावे का फलु पावा ॥
गावे का फलु होई ॥ जा आपे देवै सोई ॥1॥
मन मेरे गुर बचनी निधि पाई ॥
ता ते सच महि रहिआ समाई ॥ रहाउ ॥
गुर साखी अंतरि जागी ॥
ता चंचल मति तिआगी ॥
गुर साखी का उजीआरा ॥
ता मिटिआ सगल अंध्यारा ॥2॥
गुर चरनी मनु लागा ॥
ता जम का मारगु भागा ॥
भै विचि निरभउ पाइआ ॥
ता सहजै कै घरि आइआ ॥3॥
भणति नानकु बूझै को बीचारी ॥
इसु जग महि करणी सारी ॥
करणी कीरति होई ॥
जा आपे मिलिआ सोई ॥4॥1॥12॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 1 घरु 3 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे मेरे मन !) जब मैं उस प्रभू को अच्छा लगता हूँ (अर्थात।जब वह मेरे पर खुश होता है) तब ही मैं उसकी सिफत सालाह कर सकता हूँ। तब ही (उसकी मेहर से ही) मैं सिफत सालाह का फल पा सकता हूँ। सिफत सालाह करने का जो फल है (कि सदा उसके चरनों में लीन रहा जा सकता है।ये भी तभी प्राप्त होता है) जब वह प्रभू खुद ही (प्रसन्न हो के) देता है। 1। हे मेरे मन ! जिस मनुष्य ने गुरू के वचनों पर चल के (सिफत सालाह का) खजाना पा लिया। वह उस (खजाने) की बरकति से सदा कायम रहने वाले परमात्मा (की याद में) सदा टिका रहता है।रहाउ। जब जिस मनुष्य के अंदर सतिगुरू की (सिफत सालाह करनेकी शिक्षा की) ज्योति जग जाती है तब वह मनुष्य ऐसी मति त्याग देता है जो उसे माया की भटकना में डाले रखती थी। जब (मनुष्य के अंदर) गुरू के उपदेश का (आत्मिक) प्रकाश होता है। तब उसके अंदर से (अज्ञानता वाला) सारा अंधकार दूर हो जाता है। 2। जब जिस मनुष्य का मन गुरू के चरणों में जुड़ता है। तब उस मनुष्य का वह जीवन-रास्ता समाप्त हो जाता है जिस पे चलते हुए (उसकी) आत्मिक मौत हो रही थी। परमात्मा के डर अदब में रह के जब मनुष्य निर्भय प्रभू से मिलाप हासिल करता है तब वह अडोल आत्मिक अवस्था के घर में टिक जाता है। 3। पर। नानक कहता है, कोई विरला विचारवान ही समझता है कि इस जिंदगी में (परमात्मा की सिफत सालाह ही) श्रेष्ठ करने योग्य काम है। तब उसको सिफत सालाह का (श्रेष्ठ) कर्म मिल जाता है जब प्रभू खुद (मेहर करके जीव के दिल में) प्रगट होता है । 4। 1। 12।

सेवक सेव करहि सभि तेरी जिन सबदै सादु आइआ ॥

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सोरठि महला 3 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सेवक सेव करहि सभि तेरी जिन सबदै सादु आइआ ॥
गुर किरपा ते निरमलु होआ जिनि विचहु आपु गवाइआ ॥
अनदिनु गुण गावहि नित साचे गुर कै सबदि सुहाइआ ॥1॥
मेरे ठाकुर हम बारिक सरणि तुमारी ॥
एको सचा सचु तू केवलु आपि मुरारी ॥ रहाउ ॥
जागत रहे तिनी प्रभु पाइआ सबदे हउमै मारी ॥
गिरही महि सदा हरि जन उदासी गिआन तत बीचारी ॥
सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ हरि राखिआ उर धारी ॥2॥
इहु मनूआ दह दिसि धावदा दूजै भाइ खुआइआ ॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 3 घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे प्रभू ! आपके जिन सेवकों को गुरू के शबद का रस आ जाता है वही सारे आपकी सेवा-भक्ति करते हैं। (हे भाई !) जिस मनुष्य ने गुरू की कृपा से अपने अंदर से स्वै भाव दूर कर लिया वह पवित्र (जीवन वाला) हो जाता है। जो मनुष्य गुरू के शबद में (जुड़ के) हर वक्त सदा स्थिर प्रभू के गुण गाते रहते हैं।वे सुंदर जीवन वाले बन जाते हैं। 1। हे मेरे मालिक प्रभू ! हम (जीव) आपके बच्चे हैं।आपकी शरण आए हैं। सिर्फ एक आप ही सदा कायम रहने वाले हैं (जीव माया में डोल जाते हैं)।रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद से (अपने अंदर से) अहंकार समाप्त कर लेते हैं।वे (माया के मोह आदि से) सचेत रहते हैं।उन्होंने ही परमात्मा का मिलाप हासिल किया है। परमात्मा के भक्त गुरू के असल ज्ञान के द्वारा विचारवान हो के गृहस्त में रहते हुए भी माया से विरक्त रहते हैं। वह भक्त गुरू की बताई हुई सेवा करके सदा आत्मिक आनंद पाते हैं।और परमात्मा को अपने दिल में बसाए रखते हैं। 2। हे भाई ! ये अल्लहड़ मन माया के मोह में फंस के दसों दिशाओं में दौड़ता रहता है।और (जीवन के सही राह से) उखड़ा फिरता है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी; महला ३: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ५९९ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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