अंग
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सोरठ
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जनम मरन कउ इहु जगु बपुड़ो इनि दूजै भगति विसारी जीउ ॥
जनम मरन कउ इहु जगु बपुड़ो इनि दूजै भगति विसारी जीउ ॥
सतिगुरु मिलै त गुरमति पाईऐ साकत बाजी हारी जीउ ॥3॥
सतिगुर बंधन तोड़ि निरारे बहुड़ि न गरभ मझारी जीउ ॥
नानक गिआन रतनु परगासिआ हरि मनि वसिआ निरंकारी जीउ ॥4॥8॥
सतिगुरु मिलै त गुरमति पाईऐ साकत बाजी हारी जीउ ॥3॥
सतिगुर बंधन तोड़ि निरारे बहुड़ि न गरभ मझारी जीउ ॥
नानक गिआन रतनु परगासिआ हरि मनि वसिआ निरंकारी जीउ ॥4॥8॥
हिन्दी अर्थ: ये भाग्यहीन जगत जनम-मरण का चक्कर सहेड़े बैठा है क्योंकि इसने माया के मोह में पड़ कर परमात्मा की भक्ति भुला दी है। अगर सतिगुरू मिल जाए तो गुरू के उपदेश में चलने से (प्रभू की भक्ति) प्राप्त होती है।पर माया-ग्रसित जीव (भक्ति से टूट के मानस जन्म की) बाजी हार जाते हैं। 3। हे सतिगुरू ! माया के बँधन तोड़ के जिन लोगों को आप माया से निर्लिप्त कर देते हैं।वह दुबारा जनम-मरन के चक्कर में नहीं पड़ता। हे नानक ! (गुरू की कृपा से जिनके अंदर परमात्मा के) ज्ञान का रतन चमक पड़ता है।उनके मन में हरी निरंकार (स्वयं) आ बसता है। ४।८।
जिसु जल निधि कारणि तुम जगि आए सो अंम्रितु गुर पाही जीउ ॥
सोरठि महला 1 ॥
जिसु जल निधि कारणि तुम जगि आए सो अंम्रितु गुर पाही जीउ ॥
छोडहु वेसु भेख चतुराई दुबिधा इहु फलु नाही जीउ ॥1॥
मन रे थिरु रहु मतु कत जाही जीउ ॥
बाहरि ढूढत बहुतु दुखु पावहि घरि अंम्रितु घट माही जीउ ॥ रहाउ ॥
अवगुण छोडि गुणा कउ धावहु करि अवगुण पछुताही जीउ ॥
सर अपसर की सार न जाणहि फिरि फिरि कीच बुडाही जीउ ॥2॥
अंतरि मैलु लोभ बहु झूठे बाहरि नावहु काही जीउ ॥
निरमल नामु जपहु सद गुरमुखि अंतर की गति ताही जीउ ॥3॥
परहरि लोभु निंदा कूड़ु तिआगहु सचु गुर बचनी फलु पाही जीउ ॥
जिउ भावै तिउ राखहु हरि जीउ जन नानक सबदि सलाही जीउ ॥4॥9॥
जिसु जल निधि कारणि तुम जगि आए सो अंम्रितु गुर पाही जीउ ॥
छोडहु वेसु भेख चतुराई दुबिधा इहु फलु नाही जीउ ॥1॥
मन रे थिरु रहु मतु कत जाही जीउ ॥
बाहरि ढूढत बहुतु दुखु पावहि घरि अंम्रितु घट माही जीउ ॥ रहाउ ॥
अवगुण छोडि गुणा कउ धावहु करि अवगुण पछुताही जीउ ॥
सर अपसर की सार न जाणहि फिरि फिरि कीच बुडाही जीउ ॥2॥
अंतरि मैलु लोभ बहु झूठे बाहरि नावहु काही जीउ ॥
निरमल नामु जपहु सद गुरमुखि अंतर की गति ताही जीउ ॥3॥
परहरि लोभु निंदा कूड़ु तिआगहु सचु गुर बचनी फलु पाही जीउ ॥
जिउ भावै तिउ राखहु हरि जीउ जन नानक सबदि सलाही जीउ ॥4॥9॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 1 ॥ (हे भाई !) जिस अमृत के खजाने की खातिर आप जगत में आए हैं वह अमृत गुरू की ओर से मिलता है; पर धार्मिक भेष का पहरावा छोड़िए। मन की चालाकी भी छोड़ दीजिए (बाहर की सूरति धर्मियों वाली और अंदर से दुनिया को ठगने वाली चालाकी) इस दुविधा भरी चाल में उलझे रह के ये अमृत फल की प्राप्ति नहीं हो सकती। 1। हे मेरे मन ! (अंदर ही प्रभू चरणों में) टिका रह।(देखना।नाम-अमृत की तलाश में) कहीं बाहर ना भटकते फिरना। अगर आप बाहर ढूँढने निकल पड़ा।तो बहुत दुख पाएगा।अटल आत्मिक जीवन देने वाला रस आपके घर में ही है।हृदय में ही है।रहाउ। (हे भाई !) अवगुण छोड़ के गुण हासिल करने का यतन करो।अगर अवगुण ही करते रहोगे तो पछताना पड़ेगा। (हे मन !) आप बार-बार मोह के कीचड़ में डूब रहे हैं।आप अच्छे-बुरे की परख करनी नहीं जानता। 2। (हे भाई !) अगर अंदर (मन में) लोभ की मैल है (और लोभ के अधीन हो के) कई ठॅगी के काम करते हैं।तो बाहर (तीर्थ आदि पर) स्नान करने के क्या लाभ। अंदर की ऊँची अवस्था तभी बनेगी जब गुरू के बताए हुए रास्ते पर चल के सदा प्रभू का पवित्र नाम जपोगे। 3। (हे मन !) लोभ त्याग।निंदा और झूठ त्याग।गुरू के बचनों में चलने से ही सदा स्थिर रहने वाला अमृत-फल मिलेगा। हे दास नानक ! (प्रभू दर पर अरदास कर और कह) हे हरी ! जैसे आपकी रजा हो वैसे ही मुझे रख (पर ये मेहर कर कि गुरू के) शबद में जुड़ के मैं आपकी सिफत सालाह करता रहूँ। 4। 9।
अपना घरु मूसत राखि न साकहि की पर घरु जोहन लागा ॥
सोरठि महला 1 पंचपदे ॥
अपना घरु मूसत राखि न साकहि की पर घरु जोहन लागा ॥
घरु दरु राखहि जे रसु चाखहि जो गुरमुखि सेवकु लागा ॥1॥
मन रे समझु कवन मति लागा ॥
नामु विसारि अन रस लोभाने फिरि पछुताहि अभागा ॥ रहाउ ॥
आवत कउ हरख जात कउ रोवहि इहु दुखु सुखु नाले लागा ॥
आपे दुख सुख भोगि भोगावै गुरमुखि सो अनरागा ॥2॥
हरि रस ऊपरि अवरु किआ कहीऐ जिनि पीआ सो त्रिपतागा ॥
माइआ मोहित जिनि इहु रसु खोइआ जा साकत दुरमति लागा ॥3॥
मन का जीउ पवनपति देही देही महि देउ समागा ॥
जे तू देहि त हरि रसु गाई मनु त्रिपतै हरि लिव लागा ॥4॥
साधसंगति महि हरि रसु पाईऐ गुरि मिलिऐ जम भउ भागा ॥
नानक राम नामु जपि गुरमुखि हरि पाए मसतकि भागा ॥5॥10॥
अपना घरु मूसत राखि न साकहि की पर घरु जोहन लागा ॥
घरु दरु राखहि जे रसु चाखहि जो गुरमुखि सेवकु लागा ॥1॥
मन रे समझु कवन मति लागा ॥
नामु विसारि अन रस लोभाने फिरि पछुताहि अभागा ॥ रहाउ ॥
आवत कउ हरख जात कउ रोवहि इहु दुखु सुखु नाले लागा ॥
आपे दुख सुख भोगि भोगावै गुरमुखि सो अनरागा ॥2॥
हरि रस ऊपरि अवरु किआ कहीऐ जिनि पीआ सो त्रिपतागा ॥
माइआ मोहित जिनि इहु रसु खोइआ जा साकत दुरमति लागा ॥3॥
मन का जीउ पवनपति देही देही महि देउ समागा ॥
जे तू देहि त हरि रसु गाई मनु त्रिपतै हरि लिव लागा ॥4॥
साधसंगति महि हरि रसु पाईऐ गुरि मिलिऐ जम भउ भागा ॥
नानक राम नामु जपि गुरमुखि हरि पाए मसतकि भागा ॥5॥10॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 1 पंचपदे ॥ हे मन ! आपका अपना आत्मिक जीवन लुटा जा रहा है उसे आप बचा नहीं सकता।पराए ऐब क्यों फरोलता फिरता है। अपना घर-बार (लुटे जाने से तभी) बच सकेगा अगर आप प्रभू के नाम का स्वाद चखेगा।(नाम-रस वही) सेवक (चखता है) जो गुरू के सन्मुख रहके (सेवा में) लगता है। हे मन ! होश कर।किस बुरी मति में लग गया है। हे अभागे ! परमात्मा का नाम भुला के अन्य ही स्वादों में मस्त हो रहा है।(समय बीत जाने पर) फिर पछताएगा।रहाउ। हे मन ! आप आते धन को देख के खुश होते हैं।जाते को देख के रोते हैं।ये दुख और सुख आपके साथ ही चिपका चला (पर आपके भी क्या वश।) प्रभू खुद ही (जीव को उसके किए कर्मों के अनुसार) दुखों और सुखों के भोग में उलझा के (दुख-सुख) भोगाता है।(सिर्फ) वह मनुष्य ही निर्मोही रहता है जो गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलता है। 2। (हे मन !) परमात्मा के नाम के रस से बढ़िया और कोई रस कहा नहीं जा सकता।जिस मनुष्य ने ये रस पिया है वह (दुनिया के और रसों की ओर से) तृप्त हो जाता है। पर जिस मनुष्य ने माया के मोह में फंस के यह (नाम-) रस गवा लिया है वह माया-ग्रसित लोगों की कुबुद्धि में जा लगता है। 3। जो प्रकाश-रूप परमात्मा हमारे मन का सहारा है।प्राणों का मालिक है।शरीर का मालिक है।वह हमारे शरीर में ही मौजूद है (पर हमें ये समझ नहीं आता।हम बाहर ही भटकते रहते हैं)। हे प्रभू ! अगर आप खुद मुझे अपने नाम का रस बख्शे तो ही मैं आपके गुण गा सकता हूँ।जिस मनुष्य की सुरति हरी-सिमरन में जुड़ती है उसका मन माया की ओर से तृप्त हो जाता है। 4। हे नानक ! साध-संगति में परमात्मा के नाम का रस प्राप्त हो सकता है (साध-संगति में) अगर गुरू मिल जाए तो मौत का (भी) डर दूर हो जाता है। जिस मनुष्य के माथे पर अच्छे लेख उघड़ आएं।वह गुरू के बताए हुए राह पर चल के परमात्मा का नाम सिमर के परमात्मा के साथ मिलाप हासिल कर लेता है। 5। 10।
सरब जीआ सिरि लेखु धुराहू बिनु लेखै नही कोई जीउ ॥
सोरठि महला 1 ॥
सरब जीआ सिरि लेखु धुराहू बिनु लेखै नही कोई जीउ ॥
आपि अलेखु कुदरति करि देखै हुकमि चलाए सोई जीउ ॥1॥
मन रे राम जपहु सुखु होई ॥
अहिनिसि गुर के चरन सरेवहु हरि दाता भुगता सोई ॥ रहाउ ॥
सरब जीआ सिरि लेखु धुराहू बिनु लेखै नही कोई जीउ ॥
आपि अलेखु कुदरति करि देखै हुकमि चलाए सोई जीउ ॥1॥
मन रे राम जपहु सुखु होई ॥
अहिनिसि गुर के चरन सरेवहु हरि दाता भुगता सोई ॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 1 ॥ धुर से ही (परमात्मा की रजा अनुसार) सब जीवों के माथे पर (अपने-अपने किए कर्मोंके संस्कारों का) लेख (उकरा हुआ) है।कोई जीव ऐसा नहीं है जिस पर इस लेख का प्रभाव ना हो। सिर्फ परमात्मा खुद इस (कर्म) लेख से स्वतंत्र है।जो इस कुदरत को रच के इसकी संभाल करता है।और अपने हुकम में (जगत की कार्रवाही) चला रहा है। 1। हे मेरे मन ! सदा राम का नाम जपो (नाम जपने से) आत्मिक सुख मिलेगा। दिन-रात उस सबसे बड़े मालिक के चरणों का ध्यान धरो।वह हरी (खुद ही सब जीवों को दातें) देने वाला है।(खुद ही सबमें व्यापक हो के) भोगने वाला है।रहाउ।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ५९८ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।