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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 551 · बिहागड़ा

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अंग
551
बिहागड़ा
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  1. आपे जलु आपे दे छिंगा आपे चुली भरावै ॥
  2. करम धरम सभि बंधना पाप पुंन सनबंधु ॥
  3. अंधे चानणु ता थीऐ जा सतिगुरु मिलै रजाइ ॥
  4. जदहु आपे थाटु कीआ बहि करतै तदहु पुछि न सेवकु बीआ ॥
  5. गुरमुखि प्रभु सेवहि सद साचा अनदिनु सहजि पिआरि ॥
  6. कहिऐ कथिऐ न पाईऐ अनदिनु रहै सदा गुण गाइ ॥
  7. आपे वेद पुराण सभि सासत आपि कथै आपि भीजै ॥
  8. सेखा अंदरहु जोरु छडि तू भउ करि झलु गवाइ ॥
  9. मः 3 ॥

आपे जलु आपे दे छिंगा आपे चुली भरावै ॥

अंग 550 से चला आ रहा अंश

आपे जलु आपे दे छिंगा आपे चुली भरावै ॥
आपे संगति सदि बहालै आपे विदा करावै ॥
जिस नो किरपालु होवै हरि आपे तिस नो हुकमु मनावै ॥6॥

हिन्दी अर्थ: खुद ही जल देता है और छिंगा भी खुद देता है और खुद ही चुल्ली करवाता है। हरी खुद ही संगति को बुला के बैठाता है और खुद ही विदा करता है। जिस पर प्रभू स्वयं दयालु होता है उसको अपनी रजा (मीठी करके) मनवाता है। 6।

करम धरम सभि बंधना पाप पुंन सनबंधु ॥

सलोक मः 3 ॥
करम धरम सभि बंधना पाप पुंन सनबंधु ॥
ममता मोहु सु बंधना पुत्र कलत्र सु धंधु ॥
जह देखा तह जेवरी माइआ का सनबंधु ॥
नानक सचे नाम बिनु वरतणि वरतै अंधु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ (कर्म काण्ड के) कर्म-धर्म सारे बँधन (का रूप ही) हैं और अच्छे-बुरे काम भी (संसार से) जोड़ के रखने का वसीला हैं (अर्थात, कर्म-काण्ड व पाप-पुंन करने से जनम-मरन से गति नहीं हो सकती)। ममता और मोह भी बँधन ही है। पुत्र और स्त्री- (इनका प्यार भी) कष्ट का कारण है। जिधर देखता हूँ उधर ही माया के मोह (रूपी) जंजीर है। हे नानक ! सच्चे नाम के बिना अंधा मनुष्य (माया के) व्यवहार को ही बरतता है। 1।

अंधे चानणु ता थीऐ जा सतिगुरु मिलै रजाइ ॥

मः 4 ॥
अंधे चानणु ता थीऐ जा सतिगुरु मिलै रजाइ ॥
बंधन तोड़ै सचि वसै अगिआनु अधेरा जाइ ॥
सभु किछु देखै तिसै का जिनि कीआ तनु साजि ॥
नानक सरणि करतार की करता राखै लाज ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 4 ॥ अंधे मनुष्य को प्रकाश तब ही होता है जब (प्रभू की) रजा में उस को सतिगुरू मिल जाए (क्योंकि सतिगुरू के मिलने से) वह (माया के) बँधन तोड़ लेता है। सच्चे हरी में लीन हो जाता है और उसका अज्ञान (रूपी) अंधकार दूर हो जाता है। जिसने शरीर बना के पैदा किया है। (सतिगुरू के मिलने से) मनुष्य सब कुछ उसी का ही समझता है। और। हे नानक ! वह मनुष्य सृजनहार की शरण पड़ता है और सृजनहार उसकी लाज रखता है (भाव। उसे विकारों से बचा लेता है)। 2।

जदहु आपे थाटु कीआ बहि करतै तदहु पुछि न सेवकु बीआ ॥

पउड़ी ॥
जदहु आपे थाटु कीआ बहि करतै तदहु पुछि न सेवकु बीआ ॥
तदहु किआ को लेवै किआ को देवै जां अवरु न दूजा कीआ ॥
फिरि आपे जगतु उपाइआ करतै दानु सभना कउ दीआ ॥
आपे सेव बणाईअनु गुरमुखि आपे अंम्रितु पीआ ॥
आपि निरंकार आकारु है आपे आपे करै सु थीआ ॥7॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जब प्रभू ने खुद बैठ के रचना रची तब उसने किसी दूसरे सेवक से सलाह नहीं ली थी। जब कोई और दूसरा पैदा ही नहीं किया। तो किसी ने किसी के पास से लेना ही क्या था और देना क्या था। (भाव। कोई ऐसा था ही नहीं जो परमात्मा को सलाह दे सकता)। फिर हरी ने खुद संसार को पैदा किया और सब जीवों को रोज़ी दी। गुरू के माध्यम से सिमरन की जुगति प्रभू ने खुद ही बनाई है और खुद ही उसने (नाम-रूपी) अमृत पीया। प्रभू खुद ही आकार से रहित है और खुद ही आकार वाला (साकार) है। जो वह खुद करता है वही होता है। 7।

गुरमुखि प्रभु सेवहि सद साचा अनदिनु सहजि पिआरि ॥

सलोक मः 3 ॥
गुरमुखि प्रभु सेवहि सद साचा अनदिनु सहजि पिआरि ॥
सदा अनंदि गावहि गुण साचे अरधि उरधि उरि धारि ॥
अंतरि प्रीतमु वसिआ धुरि करमु लिखिआ करतारि ॥
नानक आपि मिलाइअनु आपे किरपा धारि ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ सतिगुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य हर समय सहज अवस्था में लिव जोड़ के (भाव। सदा एकाग्रचित्त रहके) सदा सच्चे प्रभू को सिमरते हैं। और ऊपर-नीचे हर जगह व्यापक हरी को हृदय में परो के चढ़दीकला में (रह के) सदा सच्चे की सिफत सालाह करते हैं। धुर से ही करतार ने (उनके लिए) बख्शिशों (का फुरमान) लिख दिया है (इसलिए) उनके हृदय में प्यारा प्रभू बसता है। हे नानक ! उस प्रभू ने स्वयं ही कृपा करके उन्हें अपने में मिला लिया है। 1।

कहिऐ कथिऐ न पाईऐ अनदिनु रहै सदा गुण गाइ ॥

मः 3 ॥
कहिऐ कथिऐ न पाईऐ अनदिनु रहै सदा गुण गाइ ॥
विणु करमै किनै न पाइओ भउकि मुए बिललाइ ॥
गुर कै सबदि मनु तनु भिजै आपि वसै मनि आइ ॥
नानक नदरी पाईऐ आपे लए मिलाइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3। (जब तक सतिगुरू के शबद द्वारा हृदय ना भीगे और प्रभू की बख्शिश का भागी ना बने। तब तक) (चाहे) हर वक्त सदा गुण गाता रहे। (इस तरह) कहते हुए हाथ नहीं आता। मेहर के बिना किसी को नहीं मिला। कई रोते-कुरलाते मर-खप गए हैं। सतिगुरू के शबद से ही मन और तन भीगता है और प्रभू हृदय में बसता है। हे नानक ! प्रभू अपनी कृपा-दृष्टि से ही मिलता है। वह स्वयं ही (जीव को) अपने साथ मिलाता है। 2।

आपे वेद पुराण सभि सासत आपि कथै आपि भीजै ॥

पउड़ी ॥
आपे वेद पुराण सभि सासत आपि कथै आपि भीजै ॥
आपे ही बहि पूजे करता आपि परपंचु करीजै ॥
आपि परविरति आपि निरविरती आपे अकथु कथीजै ॥
आपे पुंनु सभु आपि कराए आपि अलिपतु वरतीजै ॥
आपे सुखु दुखु देवै करता आपे बखस करीजै ॥8॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। सारे वेद-पुराण व शास्त्र प्रभू स्वयं ही रचने वाला है। खुद ही इनकी कथा करता है और खुद ही (सुन के) प्रसन्न होता है। हरी स्वयं ही बैठ के (पुराण आदिक मतानुसार) पूजा करता है और स्वयं ही (अन्य) पसारा पसारता है। खुद ही संसार में खचित हो रहा है और खुद ही इससे किनारा किए बैठा है और कथन से परे अपना आप खुद ही बयान करता है। पुंन भी आप ही करवाता है। फिर (पाप) पुंन से निर्लिप भी आप ही वरतता है। आप ही प्रभू सुख-दुख देता है और स्वयं ही मेहर करता है। 8।

सेखा अंदरहु जोरु छडि तू भउ करि झलु गवाइ ॥

सलोक मः 3 ॥
सेखा अंदरहु जोरु छडि तू भउ करि झलु गवाइ ॥
गुर कै भै केते निसतरे भै विचि निरभउ पाइ ॥
मनु कठोरु सबदि भेदि तूं सांति वसै मनि आइ ॥
सांती विचि कार कमावणी सा खसमु पाए थाइ ॥
नानक कामि क्रोधि किनै न पाइओ पुछहु गिआनी जाइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ हे शेख ! हृदय में से हठ त्याग दे। ये पागलपन दूर कर और सतिगुरू का डर हृदय में बसा (भाव। अदब में आ) सतिगुरू के अदब में रहके कितने ही पार हो गए। (कितनों ने ही) भय में रह के निर्भय प्रभू को पा लिया। (हे शेख !) अपने कठोर मन को (मन। जो हठ के कारण कठोर है) सतिगुरू के शबद से भेद दे ता कि आपके मन में शांति और ठंड आ के बसे। फिर इस में (भजन बंदगी वाली) जो कार करेगा। मालिक उसे कबूल करेगा। हे नानक ! किसी ज्ञान वाले को जा के पूछ ले। काम और क्रोध (आदि विकारों) के अधीन होने से किसी को भी ईश्वर नहीं मिलता। 1।

मः 3 ॥

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मः 3 ॥

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 551 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।