कूड़ु कमावै कूड़ु संग्रहै कूड़ु करे आहारु ॥
बिखु माइआ धनु संचि मरहि अंते होइ सभु छारु ॥
करम धरम सुच संजम करहि अंतरि लोभु विकारु ॥
नानक जि मनमुखु कमावै सु थाइ ना पवै दरगहि होइ खुआरु ॥2॥
आपे खाणी आपे बाणी आपे खंड वरभंड करे ॥
आपि समुंदु आपि है सागरु आपे ही विचि रतन धरे ॥
आपि लहाए करे जिसु किरपा जिस नो गुरमुखि करे हरे ॥
आपे भउजलु आपि है बोहिथा आपे खेवटु आपि तरे ॥
आपे करे कराए करता अवरु न दूजा तुझै सरे ॥9॥
सतिगुर की सेवा सफल है जे को करे चितु लाइ ॥
नामु पदारथु पाईऐ अचिंतु वसै मनि आइ ॥
जनम मरन दुखु कटीऐ हउमै ममता जाइ ॥
उतम पदवी पाईऐ सचे रहै समाइ ॥
नानक पूरबि जिन कउ लिखिआ तिना सतिगुरु मिलिआ आइ ॥1॥
नामि रता सतिगुरू है कलिजुग बोहिथु होइ ॥
गुरमुखि होवै सु पारि पवै जिना अंदरि सचा सोइ ॥
नामु सम॑ाले नामु संग्रहै नामे ही पति होइ ॥
नानक सतिगुरु पाइआ करमि परापति होइ ॥2॥
आपे पारसु आपि धातु है आपि कीतोनु कंचनु ॥
आपे ठाकुरु सेवकु आपे आपे ही पाप खंडनु ॥
आपे सभि घट भोगवै सुआमी आपे ही सभु अंजनु ॥
आपि बिबेकु आपि सभु बेता आपे गुरमुखि भंजनु ॥
जनु नानकु सालाहि न रजै तुधु करते तू हरि सुखदाता वडनु ॥10॥
बिनु सतिगुर सेवे जीअ के बंधना जेते करम कमाहि ॥
बिनु सतिगुर सेवे ठवर न पावही मरि जंमहि आवहि जाहि ॥
बिनु सतिगुर सेवे फिका बोलणा नामु न वसै मनि आइ ॥
नानक बिनु सतिगुर सेवे जम पुरि बधे मारीअहि मुहि कालै उठि जाहि ॥1॥
इकि सतिगुर की सेवा करहि चाकरी हरि नामे लगै पिआरु ॥
नानक जनमु सवारनि आपणा कुल का करनि उधारु ॥2॥
आपे चाटसाल आपि है पाधा आपे चाटड़े पड़ण कउ आणे ॥
आपे पिता माता है आपे आपे बालक करे सिआणे ॥
इक थै पड़ि बुझै सभु आपे इक थै आपे करे इआणे ॥
इकना अंदरि महलि बुलाए जा आपि तेरै मनि सचे भाणे ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मनमुख का माया में मोह है (इस करके) नाम में उसका प्यार नहीं बनता।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।