कामु क्रोधु लोभु अंतरि सबला नित धंधा करत विहाए ॥
चरण कर देखत सुणि थके दिह मुके नेड़ै आए ॥
सचा नामु न लगो मीठा जितु नामि नव निधि पाए ॥
जीवतु मरै मरै फुनि जीवै तां मोखंतरु पाए ॥
धुरि करमु न पाइओ पराणी विणु करमा किआ पाए ॥
गुर का सबदु समालि तू मूड़े गति मति सबदे पाए ॥
नानक सतिगुरु तद ही पाए जां विचहु आपु गवाए ॥2॥
जिस दै चिति वसिआ मेरा सुआमी तिस नो किउ अंदेसा किसै गलै दा लोड़ीऐ ॥
हरि सुखदाता सभना गला का तिस नो धिआइदिआ किव निमख घड़ी मुहु मोड़ीऐ ॥
जिनि हरि धिआइआ तिस नो सरब कलिआण होए नित संत जना की संगति जाइ बहीऐ मुहु जोड़ीऐ ॥
सभि दुख भुख रोग गए हरि सेवक के सभि जन के बंधन तोड़ीऐ ॥
हरि किरपा ते होआ हरि भगतु हरि भगत जना कै मुहि डिठै जगतु तरिआ सभु लोड़ीऐ ॥4॥
सा रसना जलि जाउ जिनि हरि का सुआउ न पाइआ ॥
नानक रसना सबदि रसाइ जिनि हरि हरि मंनि वसाइआ ॥1॥
सा रसना जलि जाउ जिनि हरि का नाउ विसारिआ ॥
नानक गुरमुखि रसना हरि जपै हरि कै नाइ पिआरिआ ॥2॥
हरि आपे ठाकुरु सेवकु भगतु हरि आपे करे कराए ॥
हरि आपे वेखै विगसै आपे जितु भावै तितु लाए ॥
हरि इकना मारगि पाए आपे हरि इकना उझड़ि पाए ॥
हरि सचा साहिबु सचु तपावसु करि वेखै चलत सबाए ॥
गुर परसादि कहै जनु नानकु हरि सचे के गुण गाए ॥5॥
दरवेसी को जाणसी विरला को दरवेसु ॥
जे घरि घरि हंढै मंगदा धिगु जीवणु धिगु वेसु ॥
जे आसा अंदेसा तजि रहै गुरमुखि भिखिआ नाउ ॥
तिस के चरन पखालीअहि नानक हउ बलिहारै जाउ ॥1॥
नानक तरवरु एकु फलु दुइ पंखेरू आहि ॥
आवत जात न दीसही ना पर पंखी ताहि ॥
बहु रंगी रस भोगिआ सबदि रहै निरबाणु ॥
हरि रसि फलि राते नानका करमि सचा नीसाणु ॥2॥
आपे धरती आपे है राहकु आपि जंमाइ पीसावै ॥
आपि पकावै आपि भांडे देइ परोसै आपे ही बहि खावै ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(जिस कारण) हर रोज किसी भी वक्त उसकी चिंता दूर नहीं होती।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।