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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 475 · आसा

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अंग
475
आसा
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  1. नानक सा करमाति साहिब तुठै जो मिलै ॥1॥
  2. एह किनेही चाकरी जितु भउ खसम न जाइ ॥
  3. नानक अंत न जापन॑ी हरि ता के पारावार ॥
  4. आपे भांडे साजिअनु आपे पूरणु देइ ॥
  5. आपे साजे करे आपि जाई भि रखै आपि ॥
  6. वडे कीआ वडिआईआ किछु कहणा कहणु न जाइ ॥
  7. रागु आसा बाणी भगता की ॥

गुरु अंगद देव जी · आसा की वार, सलोक · राग आसा

नानक सा करमाति साहिब तुठै जो मिलै ॥1॥

अंग 474 से चला आ रहा अंश

नानक सा करमाति साहिब तुठै जो मिलै ॥1॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! बख्शिश वही हैजो मालिक के प्रसन्न होने से मिले। 1।

गुरु अंगद देव जी · आसा की वार, सलोक · राग आसा

एह किनेही चाकरी जितु भउ खसम न जाइ ॥

महला 2 ॥
एह किनेही चाकरी जितु भउ खसम न जाइ ॥
नानक सेवकु काढीऐ जि सेती खसम समाइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ जिस सेवा के करने से (सेवक के दिल में से) अपने मालिक का डर दूर ना हो। वह सेवा असली सेवा नहीं। हे नानक ! (सच्चा) सेवक वही कहलवाता है जो अपने मालिक के साथ एक-रूप हो जाता है। 2।

गुरु नानक देव जी · आसा की वार, पउड़ी · राग आसा

नानक अंत न जापन॑ी हरि ता के पारावार ॥

पउड़ी ॥
नानक अंत न जापन॑ी हरि ता के पारावार ॥
आपि कराए साखती फिरि आपि कराए मार ॥
इकन॑ा गली जंजीरीआ इकि तुरी चड़हि बिसीआर ॥
आपि कराए करे आपि हउ कै सिउ करी पुकार ॥
नानक करणा जिनि कीआ फिरि तिस ही करणी सार ॥23॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे नानक ! उस प्रभू के उस पार इस पार के किनारों का अंत नहीं पाया जा सकता। वह खुद ही जीवों की पैदायश करता है और खुद ही उनको मार देता है। कई जीवों के गले में जंजीरें पड़ी हुई हैं (भाव। कई कैद गुलामी आदि के कष्ट सह रहे हैं)।और बेशुमार जीव घोड़ सवारी कर रहे हैं (अर्थात। माया की मौजें ले रहे हैं)। (ये सारे खेल तमाशे) वह प्रभू खुद ही कर रहा है। (उसके बिना और कोई दूसरा नहीं है) मैं किस के आगे इसकी फरियाद कर सकता हूँ। हे नानक ! जिस करतार ने सृष्टि रची है। फिर वही उसकी संभाल कर रहा है। 23।

गुरु नानक देव जी · आसा की वार, सलोक · राग आसा

आपे भांडे साजिअनु आपे पूरणु देइ ॥

सलोकु मः 1 ॥
आपे भांडे साजिअनु आपे पूरणु देइ ॥
इकन॑ी दुधु समाईऐ इकि चुल॑ै रहनि॑ चड़े ॥
इकि निहाली पै सवनि॑ इकि उपरि रहनि खड़े ॥
तिन॑ा सवारे नानका जिन॑ कउ नदरि करे ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ प्रभू ने (जीवों के शरीर रूपी) बर्तन खुद ही बनाए हैं। और वह जो कुछ इनमें डालता है। (भाव। जो दुख-सुख इनकी किस्मत में देता है)। कई बर्तनों में दूध पड़ा रहता है और कई बिचारे चूल्हे पर ही तपते रहते हैं (अर्थात। कई जीवों के भाग्यों में सुख और बढ़िया-बढ़िया पदार्थ हैं। और कई जीव सदा कष्ट ही सहते हैं)। कई (भाग्यशाली) गद्दों पे बेफिक्र हो के सोते हैं। कई बिचारे (उनकी रक्षा आदि सेवा के लिए) उनकी हजूरी में खड़े रहते हैं। पर। हे नानक ! जिन पे मेहर की नजर करता है। उनको सँवारता है (भाव। उनका जीवन सुधारता है)। 1।

गुरु अंगद देव जी · आसा की वार, सलोक · राग आसा

आपे साजे करे आपि जाई भि रखै आपि ॥

महला 2 ॥
आपे साजे करे आपि जाई भि रखै आपि ॥
तिसु विचि जंत उपाइ कै देखै थापि उथापि ॥
किस नो कहीऐ नानका सभु किछु आपे आपि ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ प्रभू स्वयं ही सृष्टि को पैदा करता है। स्वयं ही इसे सजाता है। सृष्टि की संभाल भी खुद ही करता है। इस सृष्टि में जीवों को पैदा करके देखता है। खुद ही टिकाता है खुद ही गिराता है। हे नानक ! (उसके बिना) किसी और के आगे फरियाद नहीं हो सकती। वह खुद सब कुछ करने के समर्थ है। 2।

गुरु नानक देव जी · आसा की वार, पउड़ी · राग आसा

वडे कीआ वडिआईआ किछु कहणा कहणु न जाइ ॥

पउड़ी ॥
वडे कीआ वडिआईआ किछु कहणा कहणु न जाइ ॥
सो करता कादर करीमु दे जीआ रिजकु संबाहि ॥
साई कार कमावणी धुरि छोडी तिंनै पाइ ॥
नानक एकी बाहरी होर दूजी नाही जाइ ॥
सो करे जि तिसै रजाइ ॥24॥1॥ सुधु

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ प्रभू के गुणों के संबंध में कोई बात कही नहीं जा सकती। (भाव। गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता)। वह खुद ही सृजनहार है। खुद ही कुदरत का मालिक है। खुद ही बख्शिशें करने वाला है और खुद ही जीवों को रिजक पहुँचाता है। सारे जीव वही करते हैं जो उस प्रभू ने खुद ही (उनके भाग्यों में) डाल दिया है। हे नानक ! एक प्रभू की टेक के बिना और कोई जगह नहीं। जो कुछ उसकी मर्जी है वही करता है। 24। 1।सुध।

भगत कबीर जी · शबद · राग आसा

रागु आसा बाणी भगता की ॥

ੴ सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
रागु आसा बाणी भगता की ॥
कबीर जीउ नामदेउ जीउ रविदास जीउ ॥
आसा स्री कबीर जीउ ॥
गुर चरण लागि हम बिनवता पूछत कह जीउ पाइआ ॥
कवन काजि जगु उपजै बिनसै कहहु मोहि समझाइआ ॥1॥
देव करहु दइआ मोहि मारगि लावहु जितु भै बंधन तूटै ॥
जनम मरन दुख फेड़ करम सुख जीअ जनम ते छूटै ॥1॥ रहाउ ॥
माइआ फास बंध नही फारै अरु मन सुंनि न लूके ॥
आपा पदु निरबाणु न चीनि॑आ इन बिधि अभिउ न चूके ॥2॥
कही न उपजै उपजी जाणै भाव अभाव बिहूणा ॥
उदै असत की मन बुधि नासी तउ सदा सहजि लिव लीणा ॥3॥
जिउ प्रतिबिंबु बिंब कउ मिली है उदक कुंभु बिगराना ॥
कहु कबीर ऐसा गुण भ्रमु भागा तउ मनु सुंनि समानां ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: परमात्मा एक हैं। उनका नाम ‘सत्’ है, यानी सदा अस्तित्व में रहने वाला। वे सृष्टि के रचयिता हैं और सबमें व्याप्त हैं। वे भय और वैर से रहित हैं। उनका स्वरूप काल से परे है। वे जन्म नहीं लेते और स्वयं प्रकाशमान हैं। उन्हें सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु आसा बाणी भगता की ॥ कबीर जी नामदेउ जी रविदास जी ॥ आसा श्री कबीर जी ॥ मैं अपने गुरू के चरणों में लग के विनती करता हूँ और पूछता हूँ- हे गुरू ! मुझे ये बात समझा के बताएँ कि जीव किस लिए पैदा किया जाता है। और किस कारण जगत पैदा होता मरता रहता है (भाव। जीव को मानस-जनम की सूझ गुरू से ही पड़ सकती है)। 1। हे गुरदेव ! मुझ पर मेहर करें। मुझे (जिंदगी के सही) रास्ते पर डालें। जिस राह पर चलने से मेरे दुनिया वाले सहम और माया वाली जंजीरें टूट जाएं। मेरे पिछले किए कर्मों के अनुसार मेरी जिंद के सारी उम्र के जंजाल बिल्कुल ही समाप्त हो जाएं। 1।रहाउ। हे मेरे गुरदेव ! मेरा मन (अपने गले से) माया की जंजीरों के बंधन तोड़ता नहीं। ना ही यह (माया के प्रभाव से बचने के लिए) सुंन प्रभू में जुड़ता है। मेरे इस मन ने अपने वासना-रहित असल की पहचान नहीं की। और इन बातों से इसका कोरा-पन दूर नहीं हुआ। 2। हे गुरदेव ! मेरा मन, जो अच्छे-बुरे ख्यालों की परख करने में असमर्थ था, इस जगत को प्रभू से अलग हस्ती वाला समझता रहा है, जबकि जगत किसी हालत में भी प्रभू से अलग टिक नहीं सकता। (पर आपकी मेहर से जब से) मेरे मन की वह मति नाश हो गई है। जो जनम-मरण के चक्कर में डालती थी। तब से (ये मन) सदा अडोल अवस्था में टिका रहता है। 3। हे कबीर ! अब कहें, (हे गुरदेव !) जैसे। जब पानी से भरा हुआ घड़ा टूट जाता है तब (उस पानी में पड़ने वाला) प्रतिबिंब पानी के साथ ही मिल जाता है (अर्थात। जैसे पानी और प्रतिबिंब की हस्ती उस घड़े में से समाप्त हो जाती है)। वैसे ही आपकी मेहर से रस्सी (और साँप) वाला भुलेखा मिट गया है (ये भुलेखा नहीं रहा कि ये दिखता जगत परमात्मा से कोई अलग हस्ती है)।और मेरा मन सुंन प्रभू में टिक गया है। 4। 1।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 2: गुरु अंगद देव जी; भगत कबीर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 475 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।