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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 476 · आसा

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476
आसा
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  1. आसा ॥
  2. आसा ॥
  3. आसा ॥
  4. आसा ॥

भगत कबीर जी · शबद · राग आसा

आसा ॥

आसा ॥
गज साढे तै तै धोतीआ तिहरे पाइनि तग ॥
गली जिन॑ा जपमालीआ लोटे हथि निबग ॥
ओइ हरि के संत न आखीअहि बानारसि के ठग ॥1॥
ऐसे संत न मो कउ भावहि ॥
डाला सिउ पेडा गटकावहि ॥1॥ रहाउ ॥
बासन मांजि चरावहि ऊपरि काठी धोइ जलावहि ॥
बसुधा खोदि करहि दुइ चूले॑ सारे माणस खावहि ॥2॥
ओइ पापी सदा फिरहि अपराधी मुखहु अपरस कहावहि ॥
सदा सदा फिरहि अभिमानी सगल कुटंब डुबावहि ॥3॥
जितु को लाइआ तित ही लागा तैसे करम कमावै ॥
कहु कबीर जिसु सतिगुरु भेटै पुनरपि जनमि न आवै ॥4॥2॥

हिन्दी अर्थ: आसा ॥ (जो मनुष्य) साढ़े तीन-तीन गज (लंबी) धोतियां (पहनते हैं और) तिहरी तंदों वाले जनेऊ पहनते हैं। जिनके गलों में मालाएं हैं और हाथों में चमचमाते लोटे हैं (निरे इन लक्षणों को देख के) वे लोग परमात्मा के भक्त नहीं कहे जा सकते (भक्त नहीं बन जाते)। वह तो (असल में) बनारसी ठॅग हैं। 1। मुझे ऐसे संत नहीं भाते। जो मूल को ही टहनियों समेत खा जाते हैं (भाव। जो माया की खातिर मनुष्यों को जान से मार देने में भी संकोच ना करें)। 1।रहाउ। बर्तन मांज के (चूल्हों) पर रखते हैं। (नीचे) लकड़ियां धो के जलाते हैं (ये लोग) धरती खोद के दो चूल्हे बनाते हैं। (स्वच्छता तो इस तरह की। पर करतूत ये है कि)समूचे मनुष्य को खा जाते हैं। 2। इस तरह के मंद-कर्मी मनुष्य सदा विकारों में ही खचित फिरते हैं। वैसे मुंहसे कहलवाते हैं कि हम माया को छूते तक नहीं। सदा अहंकार में मतवाले हुए फिरते हैं (ये खुद तो डूबे ही थे) सारे साथियों को भी (इन बुरे कर्मों में) डुबोते हैं। 3। (पर जीवों के भी क्या वश।) जिस तरफ परमात्मा ने किसी मनुष्य को लगाया है उसी ही तरफ वह लगा हुआ है। और वैसे ही वह काम कर रहा है। हे कबीर ! सच तो ये है कि जिस को सतिगुरू मिल जाता है। वह फिर कभी जनम (मरण के चक्कर) में नहीं आता। 4। 2।

भगत कबीर जी · शबद · राग आसा

आसा ॥

आसा ॥
बापि दिलासा मेरो कीन॑ा ॥ सेज सुखाली मुखि अंम्रितु दीन॑ा ॥
तिसु बाप कउ किउ मनहु विसारी ॥
आगै गइआ न बाजी हारी ॥1॥
मुई मेरी माई हउ खरा सुखाला ॥
पहिरउ नही दगली लगै न पाला ॥1॥ रहाउ ॥
बलि तिसु बापै जिनि हउ जाइआ ॥
पंचा ते मेरा संगु चुकाइआ ॥
पंच मारि पावा तलि दीने ॥
हरि सिमरनि मेरा मनु तनु भीने ॥2॥
पिता हमारो वड गोसाई ॥
तिसु पिता पहि हउ किउ करि जाई ॥
सतिगुर मिले त मारगु दिखाइआ ॥
जगत पिता मेरै मनि भाइआ ॥3॥
हउ पूतु तेरा तूं बापु मेरा ॥
एकै ठाहर दुहा बसेरा ॥
कहु कबीर जनि एको बूझिआ ॥
गुर प्रसादि मै सभु किछु सूझिआ ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: आसा ॥ (मेरे अंदर टिक के) मेरे पिता-प्रभू ने मुझे सहारा दे दिया है। (जपने के लिए) मेरे मुंह में (उसने अपना) अमृत नाम दिया है। (इस वास्ते) मेरी (हृदय-रूपी) सेज सुखद हो गई। (जिस पिता ने इतना सुख दिया है) उस पिता को मैं (कभी) मन से नहीं भुलाऊँगा (जैसे यहाँ मैं सुखी हो गया हूँ। वैसे ही) आगे चल के (भी) मैं (मानस-जनम की) खेल नहीं हारूँगा। 1। मेरे पर माया का प्रभाव मिट गया है। अब मैं बड़ा सुखी हो गया हूँ; ना अब मुझे माया का मोह सताता है। और ना ही मैं अब (बार-बार) शरीर-रूपी गोदड़ी (चोला) पहिनूँगा। 1।रहाउ। जिस प्रभू-पिता ने मुझे (ये नया) जनम दिया है। उससे मैं सदके हूँ। उसने पाँच-कामादिकों से मेरा पीछा छुड़ा दिया है। अब वे पाँचों मार के मैंने अपने पैरों के तले दबा लिए हैं। क्योंकि (इनकी ओर से हट के) मेरा मन और तन प्रभू के सिमरन में मस्त हो गए हैं। 2। मेरा (वह) पिता बहुत बड़ा मालिक है (अगर कोई पूछे कि) मैं (कंगाल कबीर) उस पिता के पास कैसे पहुँच गया हूँ (तो इसका उत्तर ये है कि जब) मुझे सतिगुरू मिला तो उसने (पिता-प्रभू के देस का) राह दिखा दिया। और जगत का पिता-प्रभू मुझे मेरे मन में प्यारा लगने लगा। 3। (अब मैं निसंग हो के उसे कहता हूँ। हे प्रभू !) मैं आपका बच्चा हूँ। आप मेरे पिता हैं। हम दोनों का (अब) एक जगह ही (मेरे हृदय में) निवास है। हे कबीर ! अब आप कहें, मुझ दास ने उस एक प्रभू को पहिचान लिया है (प्रभू से सांझ डाल ली है) सतिगुरू की कृपा से मुझे (जीवन के रास्ते की) सारी सूझ पड़ गई है। 4। 3।

भगत कबीर जी · शबद · राग आसा

आसा ॥

आसा ॥
इकतु पतरि भरि उरकट कुरकट इकतु पतरि भरि पानी ॥
आसि पासि पंच जोगीआ बैठे बीचि नकट दे रानी ॥1॥
नकटी को ठनगनु बाडा डूं ॥
किनहि बिबेकी काटी तूं ॥1॥ रहाउ ॥
सगल माहि नकटी का वासा सगल मारि अउहेरी ॥
सगलिआ की हउ बहिन भानजी जिनहि बरी तिसु चेरी ॥2॥
हमरो भरता बडो बिबेकी आपे संतु कहावै ॥
ओहु हमारै माथै काइमु अउरु हमरै निकटि न आवै ॥3॥
नाकहु काटी कानहु काटी काटि कूटि कै डारी ॥
कहु कबीर संतन की बैरनि तीनि लोक की पिआरी ॥4॥4॥

हिन्दी अर्थ: आसा ॥ (माया के बलवान) पाँच कामादिकों का मेल-जोल रखने वाले मनुष्य एक बर्तन में मुर्गा (आदि) का पकाया हुआ मास डाल लेते हैं। और दूसरे बर्तन में शराब डाल लेते हैं। (इस मास-शराब के) इर्द-गिर्द बैठ जाते हैं। इन (विषयी लोगों) के अंदर निर्लज्ज माया (का प्रभाव) होता है। 1। निर्लज्ज माया का बाजा (सारे जगत में) ठन-ठन करके बज रहा है। हे माया ! किसी विरले विचारवान ने ही आपका बल नहीं चलने दिया। 1।रहाउ। (जिधर देखो) सब जीवों के मनों में निलज्ज माया का जोर पड़ रहा है। माया सभी के (आत्मिक जीवन) को मार के ध्यान से देखती है (कि कोई बच तो नहीं रहा)। (माया। मानो। कहती है) मैं सब जीवों की बहन-भांजी हूँ (भाव। सारे जीव मुझे तरले ले ले के इकट्ठी करते हैं)।पर जिस मनुष्य ने मुझे ब्याह लिया है (भाव। जिसने अपने ऊपर मेरा जोर नहीं पड़ने दिया) मैं उसकी दासी हो जाती हूँ। 2। कोई बड़ा ज्ञानवान मनुष्य ही। जिसको जगत संत कहता है। मेरा (माया का) पति बन सकता है। वही मुझ पर काबू रखने के समर्थ होता है। और कोई तो मेरे नजदीक भी नहीं फटक सकता (भाव। किसी और की मेरे आगे पेश नहीं जा सकती)। 3। हे कबीर ! कह,संत जनों ने माया को नाक से काट दिया है। अच्छी तरह काट के परे फेंक दिया है। माया हमेशा संतों से वैर करती है (क्योंकि। उनके आत्मिक जीवन पर चोट करने का यत्न करती है)।पर सारे जगत के जीव इससे प्यार करते हैं। 4। 4।

भगत कबीर जी · शबद · राग आसा

आसा ॥

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आसा ॥
जोगी जती तपी संनिआसी बहु तीरथ भ्रमना ॥
लुंजित मुंजित मोनि जटाधर अंति तऊ मरना ॥1॥
ता ते सेवीअले रामना ॥
रसना राम नाम हितु जा कै कहा करै जमना ॥1॥ रहाउ ॥
आगम निरगम जोतिक जानहि बहु बहु बिआकरना ॥

हिन्दी अर्थ: आसा ॥ (कई लोग) जोगी हैं। जती हैं। तपी हैं। सन्यासी हैं। बहुत से तीर्थों पे जाने वाले हैं। सरेवड़े हैं। वैरागी हैं। मौनधारी हैं। जटाधारी हैं, ये सारे साधन करते हुए भी जनम-मरण का चक्र बना रहता है। 1। सो सबसे अच्छी बात ये है कि प्रभू का नाम सिमरा जाए। जिस मनुष्य के हृदय में प्रभू के नाम का प्यार है। जो मनुष्य जीभ से नाम सिमरता है। जम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता (क्योंकि। उसका जनम-मरण खत्म हो जाता है)। 1।रहाउ। जो लोग शास्त्र-वेद-ज्योतिष और कई व्याकरण जानते हैं।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 476 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।