Lulla Family

अंग ४६७ · आसा

अंग
467
आसा
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  1. ओन॑ी मंदै पैरु न रखिओ करि सुक्रितु धरमु कमाइआ ॥
  2. पुरखां बिरखां तीरथां तटां मेघां खेतांह ॥
  3. लख नेकीआ चंगिआईआ लख पुंना परवाणु ॥
  4. सचा साहिबु एकु तूं जिनि सचो सचु वरताइआ ॥
  5. पड़ि पड़ि गडी लदीअहि पड़ि पड़ि भरीअहि साथ ॥
  6. लिखि लिखि पड़िआ ॥

ओन॑ी मंदै पैरु न रखिओ करि सुक्रितु धरमु कमाइआ ॥

अंग ४६६ से चला आ रहा अंश

ओन॑ी मंदै पैरु न रखिओ करि सुक्रितु धरमु कमाइआ ॥
ओन॑ी दुनीआ तोड़े बंधना अंनु पाणी थोड़ा खाइआ ॥
तूं बखसीसी अगला नित देवहि चड़हि सवाइआ ॥
वडिआई वडा पाइआ ॥7॥

हिन्दी अर्थ: वह कभी बुरे काम के नजदीक नहीं जाते।भला काम करते हैं और धर्म अनुसार अपना जीवन निभाते हैं। दुनिया के धंधों में खचित करने वाली माया के मोह रूपी जंजीर उन्होंने तोड़ दी है।थोड़ा खाते हैं।थोड़ा ही पीते हैं (भाव।खाना-पीना चस्के की खातिर नहीं।शारीरिक निर्वाह के वास्ते है)। “हे प्रभू ! आप बड़ी बख्शिशें करने वाले हैं। सदा जीवों को दातें बख्शता है”- इस तरह की प्रभू की सिफत सालाह करके वह संतोषी मनुष्य प्रभू को प्राप्त कर लेते हैं। 7।

पुरखां बिरखां तीरथां तटां मेघां खेतांह ॥

सलोक मः 1 ॥
पुरखां बिरखां तीरथां तटां मेघां खेतांह ॥
दीपां लोआं मंडलां खंडां वरभंडांह ॥
अंडज जेरज उतभुजां खाणी सेतजांह ॥
सो मिति जाणै नानका सरां मेरां जंताह ॥
नानक जंत उपाइ कै संमाले सभनाह ॥
जिनि करतै करणा कीआ चिंता भि करणी ताह ॥
सो करता चिंता करे जिनि उपाइआ जगु ॥
तिसु जोहारी सुअसति तिसु तिसु दीबाणु अभगु ॥
नानक सचे नाम बिनु किआ टिका किआ तगु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ मनुष्य।वृक्ष।तीरथ।तट (भाव।नदियां)।बादल।खेत। द्वीप।लोक।मण्डल।खंड-ब्रहमण्ड।सरोवर।मेरु आदि पर्वत। चारे खाणियां (अण्डज।जेरज।उतभुज व सेतज) के जीव-जंतु - इन सबकी गिनती का अंदाजा वही प्रभू जानता है (जिसने ये सब पैदा किए हैं)। हे नानक ! सारे जीव-जंतु पैदा करके।प्रभू उन सब की पालना भी करता है। जिस करतार ने ये सृष्टि रची है।इसकी पालना का फिक्र भी उसे ही है। जिस करतार ने जगत पैदा किया है।वही इनका ख्याल रखता है। मैं उसी से सदके हूँ।उसी की ही जै-जैकार करता हूँ (भाव।उसी की सिफत सालाह करता हूँ) उस प्रूभ का आसरा (जीव के वास्ते) सदा अटल है। हे नानक ! उस हरी का सच्चा नाम सिमरन के बिना तिलक जनेऊ आदि धार्मिक भेष कोई मायने नहीं रखते। 1।

लख नेकीआ चंगिआईआ लख पुंना परवाणु ॥

मः 1 ॥
लख नेकीआ चंगिआईआ लख पुंना परवाणु ॥
लख तप उपरि तीरथां सहज जोग बेबाण ॥
लख सूरतण संगराम रण महि छुटहि पराण ॥
लख सुरती लख गिआन धिआन पड़ीअहि पाठ पुराण ॥
जिनि करतै करणा कीआ लिखिआ आवण जाणु ॥
नानक मती मिथिआ करमु सचा नीसाणु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ लाखों नेकी के अच्छे काम किए जाएं।लाखों धर्म के काम किए जाएं।जो लोगों की नजरों में ठीक हों। तीर्थों पे जा के लाखों तप साधे जाएं।जंगलों में जा के सुन्न समाधि में टिक के योग-साधनाएं की जाएं; रण-भूमियों में जा के सूरमों के वाले बेअंत बहादरी वाले कारनामें दिखाए जाएं।युद्ध में (ही वैरी के सन्मुख हो के) जान दे दी जाए। लाखों (तरीकों से) सुरति पकाई जाए।ज्ञान-चर्चा की जाए और मन को एकाग्र करने के यत्न किए जाएं।बेअंत बार ही पुराण आदि धर्म-पुस्तकों के पाठ पढ़े जाएं; जिसने ये सारी सृष्टि रची है और जिसने जीवों का जीना-मरना नियत किया है (पर) हे नानक ! ये सारी समझदारियां व्यर्थ हैं।(दरगाह में कबूल होने के लिए) उस प्रभू की बख्शिश ही सच्चा परवाना है।(इसलिए उसकी बख्शिश का पात्र बनने के लिए उसका नाम सिमरना ही उक्तम मत है)। 2।

सचा साहिबु एकु तूं जिनि सचो सचु वरताइआ ॥

पउड़ी ॥
सचा साहिबु एकु तूं जिनि सचो सचु वरताइआ ॥
जिसु तूं देहि तिसु मिलै सचु ता तिन॑ी सचु कमाइआ ॥
सतिगुरि मिलिऐ सचु पाइआ जिन॑ कै हिरदै सचु वसाइआ ॥
मूरख सचु न जाणन॑ी मनमुखी जनमु गवाइआ ॥
विचि दुनीआ काहे आइआ ॥8॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे प्रभू ! केवल आप ही पूरन तौर पर अडोल रहने वाले मालिक (पूरन तौर पे खिड़ाव में) हैं।और आपने खुद ही अपनी अडोलता का गुण (जगत में) वरता दिया है। (पर) ये खिड़ाव वाला गुण (केवल) उस-उस जीव को ही मिलता है जिस जिस को स्वयं देता है।आपकी किरपा की बरकति से।वह मनुष्य उस खिड़ाव अनुसार अपना जीवन बनाते हैं। जिन्हें सतिगुरू मिल जाता है।उन्हें इस पूरन खिड़ाव वाली दाति मिलती है।सतिगुरू उनके हृदय में ये खिड़ाव टिका देता है। मूर्खों को खिड़ाव की सार नहीं आती।वे मनमुख (उससे वंचित रह के) अपना जनम व्यर्थ गवाते हैं। जगत में उनके जन्म का कोई लाभ नहीं होता। 8।

पड़ि पड़ि गडी लदीअहि पड़ि पड़ि भरीअहि साथ ॥

सलोकु मः 1 ॥
पड़ि पड़ि गडी लदीअहि पड़ि पड़ि भरीअहि साथ ॥
पड़ि पड़ि बेड़ी पाईऐ पड़ि पड़ि गडीअहि खात ॥
पड़ीअहि जेते बरस बरस पड़ीअहि जेते मास ॥
पड़ीऐ जेती आरजा पड़ीअहि जेते सास ॥
नानक लेखै इक गल होरु हउमै झखणा झाख ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ अगर इतनी पोथियां पढ़ लें।जिनसे कई गड्डियां लादी जा सकें।जिनके ढेरों के ढेर लगाए जा सकें; अगर इतनी पुस्तकें पढ़ जायं।जिनसे एक बेड़ी भरी जा सके। कई गड्ढे भरे जा सकें; अगर पढ़-पढ़ के सालों के साल गुजारे जाएं अगर पढ़-पढ़ के (साल के) सारे महीने बिता दिए जाएं; अगर पुस्तकें पढ़-पढ़ के सारी उम्र गुजार दी जाए। और पढ़-पढ़ के सारे स्वास गुजार दिए जाएं (तो भी ईश्वर के दरबार में इस में से कुछ भी परवान नहीं होता)। हे नानक ! प्रभू की दरगाह में केवल प्रभू की सिफत सालाह कबूल होती है।(प्रभू की वडिआई के बिना) कोई उद्यम करना।अपने अहंकार में ही भटकते फिरना है। 1।

लिखि लिखि पड़िआ ॥

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मः 1 ॥
लिखि लिखि पड़िआ ॥
तेता कड़िआ ॥
बहु तीरथ भविआ ॥
तेतो लविआ ॥
बहु भेख कीआ देही दुखु दीआ ॥
सहु वे जीआ अपणा कीआ ॥
अंनु न खाइआ सादु गवाइआ ॥
बहु दुखु पाइआ दूजा भाइआ ॥
बसत्र न पहिरै ॥
अहिनिसि कहरै ॥
मोनि विगूता ॥
किउ जागै गुर बिनु सूता ॥
पग उपेताणा ॥
अपणा कीआ कमाणा ॥
अलु मलु खाई सिरि छाई पाई ॥
मूरखि अंधै पति गवाई ॥
विणु नावै किछु थाइ न पाई ॥
रहै बेबाणी मड़ी मसाणी ॥
अंधु न जाणै फिरि पछुताणी ॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जितना कोई मनुष्य (किसी विद्या) को लिखना-पढ़ना जानता है। उतना ही उसे अपनी विद्या पे घमण्ड है (सो।यह जरूरी नहीं कि ईश्वर के दर पे परवान होने के लिए विद्या की जरूरत है); जितना ही कोई बहुत तीर्थों की यात्रा करता है। उतना ही जगह-जगह पे बताता फिरता है (कि मैं फलाने तीर्थ पर स्नान कर आया हूँ।सो।तीर्थ यात्रा भी अहंकार का कारण बनती है)। किसी ने (लोगों को रिझाने के लिए।धर्म के) कई चिन्ह धारण किए हुए हैं।और कोई अपने शरीर को कष्ट दे रहा है (उसके लिए भी यही कहना ठीक है कि) हे भाई ! अपने किए का दुख सह (भाव।ये भेष धारन करने।शरीर को दुख देने भी ईश्वर के दर पर कबूल नहीं हैं)।(और देखो। जिसने) अन्न छोड़ा हुआ है (प्रभू का सिमरन नहीं करता।सिमरन त्याग के) उसे यही अच्छा काम लगता है। उसने भी अपनी जिंदगी तल्ख बनाई हुई है और दुख सह रहा है। कपड़े नहीं पहनता। दिन-रात दुखी हो रहा है। (एकांत में) चुप रह के (असली राह से) टूटा हुआ।भला। बताओ (माया की नींद में) सोया हुआ मनुष्य गुरू के बिना कैसे जाग सकता है। (एक) पैरों से नंगा फिरता है और अपनी इस की हुई भूल का दुख सह रहा है। (साफ-बढ़िया भोजन छोड़ के) झूठ-मीठ खाता है।और सिर पर राख डाल रखी है। अज्ञानी मूर्ख ने (इस तरह) अपनी इज्जत गवा ली है। प्रभू के नाम के बिना और कोई उद्यम परवान नहीं। अंधा (मूर्ख) उजाड़ों में।मढ़ियों में।मसाणों में जा रहता है। (ईश्वर वाला रास्ता) नहीं समझता और समय बीत जाने पर पछताता है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी; महला २: गुरु अंगद देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ४६७ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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