नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: उस पर माया का प्रभाव नहीं पड़ सकता और ये सारा (जगत रूप) आकार (उसी की ही) काया (शरीर) का है। जो मनुष्य दानी हैं उनके मन में खुशी पैदा होती है।जब (वे किसी जरूरतमंद को) कुछ देने की विचार करते हैं (पर जरूरतमंदों को) दे दे के (वे अंदर-अंदर करतार से उससे) हजारों गुना ज्यादा मांगते हैं और (बाहर) जगत (उनके दान की) उपमा करता है।(दूसरी तरफ। जगत में) बेअंत चोर।पर-स्त्रीगामी।झूठे।बुरे और विकारी भी हैं। जो (विकार कर-कर के) पिछली की कमाई को खत्म कर के (यहाँ से खाली हाथ) चले जाते हैं (पर ये करतार के रंग हैं) उनको भी (उसी ने ही) कोई ऐसा काम सौंपा हुआ है। जल में रहने वाले।धरती पर बसने वाले।बेअंत पुरियां।लोक और ब्रहमाण्ड के जीव- वह सारे जो कुछ कहते हैं सब कुछ। (हे करतार !) आप जानता है।उनको आपका ही आसरा है। हे नानक ! भगत-जनों को केवल प्रभू की सिफत-सालाह करने की चाहत लगी हुई है।हरी का सदा अटॅल रहने वाला नाम ही उनका आसरा है। वह सदा दिन-रात आनंद में रहते हैं और (खुद को) गुणवानों के पैरों की ख़ाक समझते हैं। 1।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ (मुसलमानों का ये विचार है कि मरने के बाद जिनका शरीर जलाया जाता है वे दोज़क की आग में जलते हैं।पर) उस जगह की मिट्टी भी जहाँ मुसलमान मुर्दे दबाते हैं (कई बार) कुम्हार के हाथ आ जाती है (भाव।वह मिट्टी चिकनी होने के कारण कुम्हार उस मिट्टी को बर्तन बनाने के लिए ले आते हैं); (कुम्हार उस मिट्टी को) घड़ के (उसके) बर्तन और ईटें बनाता है। (और भट्ठी में पड़ के।वह मिट्टी।मानो) जलती हुई पुकार करती है।जल के बिचारी रोती है और उस में से अंगिआरे झड़-झड़ के गिरते हैं। (पर निजात अथवा दोजक का।मुर्दा शरीर जलाने या दबाने से कोई संबंध नहीं है)। हे नानक ! जिस करतार ने जगत की माया रची है। वह (असल भेद को) जानता है। 2।
पउड़ी ॥ बिनु सतिगुर किनै न पाइओ बिनु सतिगुर किनै न पाइआ ॥ सतिगुर विचि आपु रखिओनु करि परगटु आखि सुणाइआ ॥ सतिगुर मिलिऐ सदा मुकतु है जिनि विचहु मोहु चुकाइआ ॥ उतमु एहु बीचारु है जिनि सचे सिउ चितु लाइआ ॥ जगजीवनु दाता पाइआ ॥6॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ किसी मनुष्य को (‘जग जीवनु दाता’) सतिगुरू के बिना (भाव।सतिगुरू की शरण पड़े बिना) नहीं मिला।(ये सच जानो कि) किसी मनुष्य को सतिगुरू की शरण पड़े बिना (‘जग जीवनु दाता’) नहीं मिला। (क्योंकि प्रभू ने) े अपने आप को रखा ही सतिगुरू के अंदर है।(भाव।प्रभू गुरू के अंदर साक्षात विद्यमान है) (हमने अब ये बात सबको) खुल्लम-खुल्ला कह के सुना दी है। अगर (ऐसा) गुरू।जिसने अपने अंदर से (माया का) मोह दूर कर दिया है।मनुष्य को मिल जाए तो मनुष्य मुक्त (भाव।मायावी बंधनों से आजाद) हो जाता है। (और सारी समझदारियों से) ये विचार सुंदर है कि जिस मनुष्य ने अपने गुरू के साथ चित्त जोड़ा है उसको जग जीवन दाता मिल गया है। 6।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ (जब तक जीव) अहम् में (है।भाव।ईश्वर से और ईश्वर की कुदरत से अपनी अलग हस्ती बनाए बैठा है।तब तक कभी) जगत में आता है (कभी) जगत से चला जाता है। कभी पैदा होता है।कभी मरता है। जीव इस अलग अस्तित्व की सीमा में रह के कभी (किसी जरूरतमंद को) देता है।कभी (अपनी जरूरत पूरी करने के लिए किसी से) लेता है। इसी ‘मैं-मैं’ के ख्याल में (कि ये काम ‘मैं’ करता हूँ।‘मैं’ करता हूँ) कभी कमाता कभी गवाता है। जब तक जीव मेर-तेर वाली हदबंदी में है।(लोगों की नजरों में) कभी सच्चा है कभी झूठा है जब तक अपने कादर से अलग अस्तित्व के भरम में है।तब तक अपने किए पापों और पुंन्यों की गिनती रहता है (भाव।ये सोचता है कि ‘मैंने’ ये भले काम किए हैं।‘मैंने’ ये बुरे काम किए हैं) और इसी दुविधा में रहने के कारण (भाव।ईश्वर में अपना आप एक-रूप ना करने के कारण) कभी नर्क में जाता है कभी स्वर्ग में। जब तक अपने करतार से अलग अस्तित्व में जीव बंधा पड़ा है।तब तक कभी हसता है कभी रोता है (भाव।अपने आप को कभी सुखी समझता है कभी दुखी)। रॅब से अपनी हस्ती अलग रखने के कारण कभी उसका मन पापों की मैल में लिबड़ जाता है।कभी वह (अपने ही उद्यम के आसरे) उस मैल को धोता है। इस अलग अस्तित्व में (अहंम् में) ग्रसा हुआ जीव कभी जाति-पाति के ख्याल में पड़ के (भाव।ये ख्याल करके कि मैं उच्च जाति का हूँ) अपना आप गवा लेता है। जब तक जीव अपने अलग अस्तित्व की चार दिवारी के अंदर है।ये (लोगों की नजर में) कभी मूर्ख (गिना जाता) है कभी सयाना (पर। चाहे ये मूर्ख समझा जाए चाहे समझदार।जब तक इस सीमा में बंधा हुआ है।इस हदबंदी से बाहर होने की।भाव) मोक्ष-मुक्ति की समझ इसे नहीं आ सकती। जब तक ईश्वर से विछोड़े की हालत में है।तब तक जीव ‘माया माया’ (चिल्लाता फिरता है)। तब तक इस पर माया का प्रभाव पड़ा हुआ है; ईश्वर से विछुड़ा रहके जीव बारंबार पैदा होता है। जब ईश्वर से (अपनी) विछुड़ी हुई हालत को समझ लेता है।भाव।जब इसे समझ आ जाती है में अलगाव वाली हदबंदी में कैद हूँ (रॅब से टूटा हुआ हूँ) तब इसे रॅब का दरवाजा मिल जाता है। (नहीं तो) जब तक इस ज्ञान से वंचित है।तब तक (ज़बानी) ज्ञान की बातें कह,कह के (अपने आपको ज्ञानवान समझ के अपना अंदर) नहीं बदलता। हे नानक ! (कर्म का) ये लेख (भी) ईश्वर के हुकम में लिखा जाता है(भाव।हरेक जीव की ये अलग-अलग हस्ती।अलग-अलग ‘अहम्’ ईश्वर के हुकम के अनुसार ही बनती है।ईश्वर का एक ऐसा नियम बना हुआ है कि हरेक मनुष्य के अपने किए कर्मों के संस्कार अनुसार।उसके आस-पास अपने ही इन संस्कारों का जाल तनता जाता है।और इस तरह ईश्वरीय नियम के अनुसार उस मनुष्य की अपनी ही एक स्वार्थी हस्ती बन जाती है)। जीव जैसे जैसे देखते हैं।वैसा ही उनका स्वरूप बन जाता है (भाव।जिस जिस नीयत से दूसरे मनुष्यों के साथ बरतते हैं।उसी तरह के अंदर संस्कार इकट्ठे हो के वैसा ही उनका अपना मानसिक-स्वरूप बन जाता है।वैसी ही उनकी अपनी अलग हस्ती बन जाती है।वैसा ही उनका ‘अहम्’ बन जाता है।) 1।
महला 2 ॥ हउमै एहा जाति है हउमै करम कमाहि ॥ हउमै एई बंधना फिरि फिरि जोनी पाहि ॥ हउमै किथहु ऊपजै कितु संजमि इह जाइ ॥ हउमै एहो हुकमु है पइऐ किरति फिराहि ॥ हउमै दीरघ रोगु है दारू भी इसु माहि ॥ किरपा करे जे आपणी ता गुर का सबदु कमाहि ॥ नानकु कहै सुणहु जनहु इतु संजमि दुख जाहि ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 2॥ ‘अहंम्’ का स्वभाव यही है (भाव।अगर ईश्वर से अलगाव बना रहे तो नतीजा ये निकलता है कि जीव) वही काम करते हैं।जिससे ये अलग अस्तित्व टिका रहे। इस अलग अस्तित्व के बंधन भी यही हैं (भाव।अलग अस्तित्व के आसरे किए हुए कामों की संस्कार-रूपी जंजीर भी यही है।जिनमें घिरे हुए जीव) बार-बार जूनियों में पड़ते हैं। (सहज ही मन में प्रश्न उठता है कि जीव का) इस अलग हस्ती वाला भरम कहाँ से पैदा होता है और किस तरीके से ये दूर हो सकता है। (इसका उक्तर ये है कि) ये अलग व्यक्तित्व बनाने वाले ईश्वर का रॅब का हुकम है और जीव पिछले किए हुए कर्मों को करने की ओर दौड़ते हैं (भाव।पहले ही व्यक्तित्व को कायम रखने वाले काम करना चाहते हैं)। ये अहंकार एक लंबा रोग है।पर ये ला-इलाज नहीं। अगर प्रभू अपनी मेहर करे।तो जीव गुरू का शबद कमाते हैं। नानक कहता है।हे लोगो ! इस तरीके से (अहंकार-रूपी दीर्घ रोग से पैदा हुए) दुख दूर हो जाते हैं। 2।
पउड़ी ॥ सेव कीती संतोखीइंी जिन॑ी सचो सचु धिआइआ ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो संतोषी मनुष्य सदा एक अविनाशी प्रभू को सिमरते हैं। (प्रभू की) सेवा वही करते हैं।
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उस पर माया का प्रभाव नहीं पड़ सकता और ये सारा (जगत रूप) आकार (उसी की ही) काया (शरीर) का है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।