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अंग ४५७ · आसा

अंग
457
आसा
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  1. चमतकार प्रगासु दह दिस एकु तह द्रिसटाइआ ॥
  2. थिरु संतन सोहागु मरै न जावए ॥
  3. आसा महला 5 ॥
  4. हरि हरि नामु जपंतिआ कछु न कहै जमकालु ॥
  5. छंत ॥

चमतकार प्रगासु दह दिस एकु तह द्रिसटाइआ ॥

अंग ४५६ से चला आ रहा अंश

चमतकार प्रगासु दह दिस एकु तह द्रिसटाइआ ॥
नानकु पइअंपै चरण जंपै भगति वछलु हरि बिरदु आपि बनाइआ ॥4॥3॥6॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिस परमात्मा के नूर की झलक ज्योति का प्रकाश दसों दिशाओं में (सारे ही संसार में) हो रहा है वही परमात्मा भक्त-जनों के हृदय में प्रकट हो जाता है। नानक विनती करता है।प्रभू-चरनों का ध्यान धरता है।(और कहता है कि) परमात्मा अपनी भगती (के कारण अपने भक्तों) से प्यार करने वाला है।अपना ये आदि मूल स्वभाव (बिरद) उसने स्वयं ही बनाया हुआ है। 4। 3। 6।

थिरु संतन सोहागु मरै न जावए ॥

आसा महला 5 ॥
थिरु संतन सोहागु मरै न जावए ॥
जा कै ग्रिहि हरि नाहु सु सद ही रावए ॥
अविनासी अविगतु सो प्रभु सदा नवतनु निरमला ॥
नह दूरि सदा हदूरि ठाकुरु दह दिस पूरनु सद सदा ॥
प्रानपति गति मति जा ते प्रिअ प्रीति प्रीतमु भावए ॥
नानकु वखाणै गुर बचनि जाणै थिरु संतन सोहागु मरै न जावए ॥1॥
जा कउ राम भतारु ता कै अनदु घणा ॥
सुखवंती सा नारि सोभा पूरि बणा ॥
माणु महतु कलिआणु हरि जसु संगि सुरजनु सो प्रभू ॥
सरब सिधि नव निधि तितु ग्रिहि नही ऊना सभु कछू ॥
मधुर बानी पिरहि मानी थिरु सोहागु ता का बणा ॥
नानकु वखाणै गुर बचनि जाणै जा को रामु भतारु ता कै अनदु घणा ॥2॥
आउ सखी संत पासि सेवा लागीऐ ॥
पीसउ चरण पखारि आपु तिआगीऐ ॥
तजि आपु मिटै संतापु आपु नह जाणाईऐ ॥
सरणि गहीजै मानि लीजै करे सो सुखु पाईऐ ॥
करि दास दासी तजि उदासी कर जोड़ि दिनु रैणि जागीऐ ॥
नानकु वखाणै गुर बचनि जाणै आउ सखी संत पासि सेवा लागीऐ ॥3॥
जा कै मसतकि भाग सि सेवा लाइआ ॥
ता की पूरन आस जिन॑ साधसंगु पाइआ ॥
साधसंगि हरि कै रंगि गोबिंद सिमरण लागिआ ॥
भरमु मोहु विकारु दूजा सगल तिनहि तिआगिआ ॥
मनि सांति सहजु सुभाउ वूठा अनद मंगल गुण गाइआ ॥
नानकु वखाणै गुर बचनि जाणै जा कै मसतकि भाग सि सेवा लाइआ ॥4॥4॥7॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे भाई ! (परमात्मा के) संत-जनों के सौभाग्य सदा कायम रहते हैं (क्योंकि उनके) सिर का साई ना (कभी) मरता है ना (कभी उनको छोड़ के कहीं) जाता है। (हे भाई !) जिस जीव-स्त्री के हृदय-घर में प्रभू-पति आ बसे।वह सदा उसके मिलाप के आनंद को पाती है। वह परमात्मा नाश-रहित है।अदृश्य है।सदा नए प्यार वाला है।पवित्र स्वरूप है। वह मालिक किसी से भी दूर नहीं।सदा हरेक के अंग-संग बसता है।दसों ही दिशाओं में वह सदा ही सदा ही व्यापक रहता है। सब जीवों की जीवात्मा का मालिक वह परमात्मा ऐसा है जिससे जीवों को उच्च आत्मिक अवस्था मिलती है।अच्छी बुद्धि प्राप्त होती है।ज्यों-ज्यों उस प्यारे के साथ प्रीति बढ़ाएं।त्यों-त्यों वह प्रीतम प्रभू प्यारा लगता है। नानक कहता है,गुरू के शबद की बरकति से (उस प्रभू-प्रीतम के साथ) गहरी सांझ पड़ती है।(परमात्मा के) संत-जनों के अच्छे भाग्य सदा कायम रहते हैं (क्योंकि) उनका पति-प्रभू ना (कभी) मरता है ना (कभी उनको छोड़ के कहीं) जाता है। 1। हे भाई ! जिस (जीव-स्त्री) को प्रभू-पति (मिल जाता है) उसके हृदय-घर में बहुत आनंद बना रहता है। वह सुखी जीवन बिताती है।हर जगह उसकी शोभा-उपमा बनी रहती है। उस जीव-स्त्री को हर जगह आदर मिलता है वडिआई मिलती है सुख मिलता है (क्योंकि उसको) परमात्मा की सिफत-सालाह प्राप्त हुई रहती है। दैवी गुणों का मालिक-प्रभू उस के अंग-संग बसता है। उस (जीव-स्त्री के) हृदय घर में सारी करामाती ताकतें सारे ही नौ खजाने आ बसते हैं।उसे कोई कमी नहीं रहती।उसे सब कुछ प्राप्त रहता है। उस जीव-स्त्री के बोल मीठे हो जाते हैं।प्रभू-पति ने उसे आदर-मान दे के रखा होता है।उसके सौभाग्य सदा के लिए बने रहते हैं गुरू के शबद की बरकति से (उस प्रभू-प्रीतम के साथ) गहरी सांझ पड़ती है। जिसकाप्रभू-पति ने प्रेम हो जाता है उसको अत्यंत आनंद प्राप्त हो जाता है। 2। हे सहेली ! आ।गुरू के पास चलें।(गुरू की बताई हुई) सेवा में लगना चाहिए। हे सखी ! (मेरा जी करता है) मैं (गुरू के लंगरों के लिए चक्की) पीसूँ।मैं (गुरू के) चरण धोऊँ।हे सखी ! गुरू के दर पे जाकर अहंकार त्याग देना चाहिए। हे सखी ! कभी भी अपना आप जताना नहीं चाहिए। गुरू का पल्ला पकड़ लेना चाहिए (जो गुरू हुकम करे वह) मान लेना चाहिए।जो कुछ गुरू करे उसे सुख (जान के) ले लेना चाहिए। हे सखी ! अपने आप को उस गुरू के दासों की दासी बना के।(मन में से) उपरामता त्याग के दोनों हाथ जोड़ के दिन-रात (सेवा में) सुचेत रहना चाहिए। नानक कहता है, (हे सखी ! जीव) गुरू के शबद द्वारा ही (परमात्मा से) गहरी सांझ बना सकता है।(सो।) हे सखी ! आ।गुरू के पास चलें।(गुरू की बताई) सेवा में लगना चाहिए। 3। हे भाई ! जिनके माथे पर भाग्य जागते हैं उन्हें (गुरू।परमात्मा की) सेवा-भक्ति में जोड़ता है। जिनको गुरू की संगति प्राप्त होती है उनकी हरेक आस पूरी हो जाती है। साध-संगति की बरकति से परमात्मा के प्रेम में जुड़ के वे परमात्मा का सिमरन करने लग पड़ते हैं। माया की खातिर भटकना।दुनिया का मोह।विकार।मेर-तेर ये सारे अवगुण वे त्याग देते हैं। उनके मन में शांति पैदा हो जाती है।आत्मिक अडोलता आ जाती है।प्रेम पैदा हो जाता है।वे परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाते हैं।और आत्मिक आनंद पाते हैं। नानक कहता है, मनुष्य।गुरू के शबद की बरकति से ही परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल सकता है।जिन लोगों के माथे पर भाग्य जाग जाते हैं।गुरू उन्हें परमात्मा की सेवा-भक्ति में जोड़ता है। 4। 4। 7।

आसा महला 5 ॥

आसा महला 5 ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥

हरि हरि नामु जपंतिआ कछु न कहै जमकालु ॥

सलोकु ॥
हरि हरि नामु जपंतिआ कछु न कहै जमकालु ॥
नानक मनु तनु सुखी होइ अंते मिलै गोपालु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरते हुए मौत का डर छू नहीं सकता (आत्मिक मौत नजदीक नहीं आ सकती)। हे नानक ! (सिमरन की बरकति से) मन सुखी रहता है हृदय सुखी हो जाता है।और।आखिर परमात्मा भी मिल जाता है। 1।

छंत ॥

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छंत ॥
मिलउ संतन कै संगि मोहि उधारि लेहु ॥
बिनउ करउ कर जोड़ि हरि हरि नामु देहु ॥
हरि नामु मागउ चरण लागउ मानु तिआगउ तुम॑ दइआ ॥
कतहूं न धावउ सरणि पावउ करुणा मै प्रभ करि मइआ ॥
समरथ अगथ अपार निरमल सुणहु सुआमी बिनउ एहु ॥
कर जोड़ि नानक दानु मागै जनम मरण निवारि लेहु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: छंत। हे हरी ! मुझे (विकारों से) बचाए रख (मेहर कर) मैं आपके संत-जनों की संगति में टिका रहूँ। मैं दोनों हाथ जोड़ के (आपके दर पे) अरदास करता हूँ।मुझे अपने नाम की दाति बख्श। हे हरी ! मैं आपसे आपका नाम मांगता हूँ।अगर आप मेहर करे तो मैं आपके चरणों में लगा रहूँ।(और अपने अंदर से) अहंकार त्याग दूँ। हे करुणामय प्रभू ! (मेरे पर) मेहर कर।मैं आपकी शरण पड़ा रहूँ।और (आपका आसरा छोड़ के) किसी और तरफ ना भागूँ। हे सब ताकतों के मालिक ! हे अकॅथ ! हे बेअंत ! हे पवित्र-स्वरूप स्वामी ! मेरी ये अरदास सुन। आपका दास नानक आपसे ये दान मांगता है कि मेरा जनम-मरण का चक्कर खत्म कर दे। 1।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ४५७ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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