गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: दृश्य-अदृश्य सारे जीव-जंतु जिस परमात्मा की आराधना करते हैं।हवा पानी दिन-रात जिसे ध्याते हैं; (बेअंत) तारे चंद्रमा और सूरज जिस परमात्मा का ध्यान धरते हैं।धरती जिसकी सिफत सालाह करती है। सारी खाणियों और सारी बोलियों (का हरेक जीव) जिस परमात्मा का सदा ही ध्यान धर रहा है। सत्ताइस स्मृतियां, अठारह पुराण, चार वेद, छे शास्त्र जिस परमात्मा को जपते रहते हैं। उस पतित-पावन प्रभू को उस भगत-वछल हरी को।हे नानक ! सदा कायम रहने वाली साध-संगति के द्वारा ही मिल सकते हैं। 3। हे भाई ! जितनी सृष्टि की सूझ प्रभू ने मुझे दी है उनती मेरी जीभ ने बयान कर दी है (कि इतनी सुष्टि परमात्मा की सेवा-भक्ति कर रही है)। पर और जितनी दुनिया का मुझे पता नहीं जो वह दुनिया प्रभू की सेवा-भक्ति करती है वह मुझसे गिनी नहीं जा सकती। वह परमात्मा अदृश्य है।उसके गुण गिने नहीं जा सकते।वह (जैसे) बेअंत गहरा समुंद्र है।वह सबका मालिक है।सब जीवों के अंदर भी है और सबसे अलग भी है। सारे जीव-जंतु उस (के दर) के मंगते हैं।वह एक सबको दातें देने वाला है।वह किसी भी जीव से दूर नहीं है वह सबके साथ बसता है और प्रत्यक्ष है। हे भाई ! वह परमात्मा अपने भक्तों के वश में है।जो जीव उसे मिल जाते हैं उनकी मैं कितनी महिमा बयान करूँ।(बयान नहीं की जा सकती)। (अगर उसकी मेहर हो तो) नानक (उसके भक्त-जनों के) चरणों पर अपना सिर रखी रखे। 4। 2। 5।
आसा महला 5 ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक II उस प्रभू-पातशाह का सिमरन करते रहो।(उसके सिमरन का सदा) उद्यम करते रहो। हे नानक ! (कह) हे बड़े भाग्यों वालो ! जिस परमात्मा का सिमरन करने से सारे सुख मिल जाते हैं।और हरेक किस्म के दुख-दर्द व भटकना दूर हो जाती है। 1।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: छंत। हे भाग्यशालियो ! गोबिंद का नाम जपते हुए (कभी) आलस नहीं करना चाहिए। गुरू की संगति में मिलने से (और हरी-नाम जपने से) जम पुरी में नहीं जाना पड़ता। परमात्मा का नाम सिमरते हुए कोई दुख कोई दर्द कोई डर अपना जोर नहीं डाल सकता।सदा सुखी रहते हैं। हे भाई ! हरेक सांस के साथ परमात्मा की आराधना करता रह।उस प्रभू को अपने मन में सिमर।अपने मुंह से (उसका नाम) उचार। हे कृपा के श्रोत ! हे दया के घर ! हे गुणों के खजाने प्रभू ! (मेरे पर) दया कर (मुझे नानक को अपनी) सेवा-भक्ति में जोड़। नानक (आपके दर पर) बिनती करता है।आपके चरणों में ध्यान धरता है।हे भाई ! गोबिंद का नाम जपते हुए कभी आलस नहीं करनी चाहिए। 1। हे भाई ! निर्लिप परमात्मा का नाम पवित्र है।विकारों में गिरे हुए जीवों को पवित्र करने वाला है। हे भाई ! गुरू की बख्शी हुई आत्मिक जीवन की सूझ (एक ऐसा) सुर्मा है (जो मन की) भटकना के अंधकार का नाश कर देता है। गुरू के दिए ज्ञान का अंजन (सुर्मा) (ये समझ पैदा कर देता है कि) परमात्मा निर्लिप (होते हुए भी) पानी में धरती में आकाश में हर जगह व्यापक है। जिसके हृदय में वह प्रभू आँख के फरकने जितने समय के लिए भी बसता है उसके सारे चिंता-फिक्र मिट जाते हैं। हे भाई ! परमात्मा अथाह ज्ञान का मालिक है।सब कुछ करने योग्य है।सबका मालिक है।सबका डर नाश करने वाला है। नानक विनती करता है उसके चरणों में ध्यान धरता है (और कहता है कि) निर्लिप परमात्मा का नाम पवित्र है।विकारों में डूबे हुए जीवों को पवित्र करने वाला है। 2। हे सृष्टि के पालणहार ! हे दया के श्रोत ! हे कृपा के खजाने ! मैंने आपकी ओट ली है। मुझे आपके ही चरणों का सहारा है।आपकी शरण में रहना ही मेरे जीवन की कामयाबी है। हे हरी ! हे स्वामी ! हे जगत के मूल ! आपके चरनों का आसरा विकारों में गिरे हुए लोगों को बचाने-योग्य है। संसार-समंद्र के जनम-मरण के चक्कर में से पार लंघाने योग्य है।आपका नाम सिमर के अनेकों लोग (संसार समुंद्र में) पार लांघ रहे हैं। हे प्रभू ! जगत-रचना के आरम्भ में भी आप ही है।अंत में भी आप ही (स्थिर) है।बेअंत जीव आपकी तलाश कर रहे हैं।आपके संत-जनों की संगति ही एक ऐसा तरीका है जिससे संसार-समंद्र के विकारों से बच सकते हैं। नानक आपके दर पर विनती करता है।आपके चरनों का ध्यान धरता है।हे गोपाल ! हे दयाल ! हे कृपा के खजाने ! मैंने आपका पल्ला पकड़ा है। 3। हे भाई ! परमात्मा अपनी भक्ति (के कारण अपने भक्तों) से प्यार करने वाला है।अपना ये बिरद (मूल आदि स्वभाव) उसने खुद ही बनाया हुआ है।सो। जहां-जहां (उसके) संत (उसकी) आराधना करते हैं वहाँ-वहाँ वह जा के दर्शन देता है। हे भाई ! परमात्मा ने खुद ही (अपने भक्त अपने चरणों मेंलीन किए हुए हैं।आत्मिक अडोलता में और प्रेम में टिकाए हुए हैं।अपने भक्तों के सारे काम प्रभू आप ही सँवारता है। भगत परमात्मा की सिफत सालाह करते हैं।हरि-मिलाप की खुशी के गीत गाते हैं।आत्मिक आनंद पाते हैं।और अपने सारे दुख भुला लेते हैं।
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “दृश्य-अदृश्य सारे जीव-जंतु जिस परमात्मा की आराधना करते हैं।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।