अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! मैं गुनहगार हूँ।बुद्धिहीन हूँ।गुणहीन हूँ।निआसरा हूँ।बुरे स्वभाव वाला हूँ। हे प्रभू ! मैं विकारी हूँ।कठोर हूँ।नीच कुल वाला हूँ।मोह का कीचड़ मेरे पर हावी है। हे प्रभू ! भटकना में पड़ने वाले कर्मों की मैल मुझे लगी हुई है।मेरे अंदर अहंकार है।ममता है (इस वास्ते) मौत मुझे याद नहीं आती। मैं स्त्री के रंग-तमाशों में माया के मौज-मेलों में (ग़र्क हूँ)।मुझे अज्ञानता चिपकी हुई है। हे प्रभू ! मेरी जवानी ढल रही है।बुढ़ापा बढ़ रहा है।मौत (मेरे) साथ (मेरी जिंदगी के) दिन देख रही है। आपका दास नानक (आपके दर पर) विनती करता है।मुझे आपकी ही आस है।मुझ नीच को गुरू की शरण रख। 2। हे प्रभू ! हे मुरारी ! मैं अनेकों जन्मों में भटका हूँ।मैंने कई जूनियों के बड़े दुख सहे हैं। धन और पदार्थों के भोग मुझे मीठे लग रहे हैं।मैं इनके साथ ही चिपका रहता हूँ। अनेकों पापों का भार उठा के मैं भटकता आ रहा हूँ।अनेको परदेसों में (जूनियों में) दौड़ चुका हूँ (दुख ही दुख देखे हैं)। अब मैंने आपका पल्लू पकड़ा है।और।हे हरी ! आपके नाम में मुझे सारे सुख मिल गए हैं। हे रक्षा करने के समर्थ प्यारे प्रभू ! (संसार समुंद्र से पार लांघने के लिए) मुझसे अब तक कुछ नहीं हो सका।आगे भी कुछ नहीं हो सकेगा। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) जिस मनुष्य पर आपकी कृपा हैं जाती है।उसे आत्मिक अडोलता और सुख आनंद प्राप्त हैं जाते हैं।वह संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है। 3। हे भाई ! परमात्मा ने तो वह लोग भी (विकारों से) बचा लिए जिन्होंने सिर्फ अपना नाम ही भगत रखाया हुआ था।(सच्चे) भक्तों को (तो संसार-समुंद्र का) कोई सहम रह ही नहीं सकता। (सो।हे भाई !) जिस तरह भी हो सके अपने कानों से परमात्मा की सिफत सालाह सुनते रहा करो। हे ज्ञानवान बंदे ! अपने कानों से आप प्रभू की सिफत सालाह की बाणी सुन (इस तरह आप) मन में नाम-खजाना ढूँढलेगा। (हे भाई ! भाग्यशाली हैं वह मनुष्य जो) सृजनहार हरी प्रभू के प्रेम रंग में मस्त हो के उस के गुण गाते हैं। (हे भाई !) अगर सारी धरती कागज बन जाए।और सारी बनस्पति कलम बन जाए।और हवा लिखने के लिए (लिखारी) बन जाए। तो भी बेअंत परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता।हे नानक ! (कह, मैंने उस परमात्मा के) चरणों का आसरा लिया है। 4। 5। 8।
आसा महला 5 ॥ पुरख पते भगवान ता की सरणि गही ॥ निरभउ भए परान चिंता सगल लही ॥ मात पिता सुत मीत सुरिजन इसट बंधप जाणिआ ॥ गहि कंठि लाइआ गुरि मिलाइआ जसु बिमल संत वखाणिआ ॥ बेअंत गुण अनेक महिमा कीमति कछू न जाइ कही ॥ प्रभ एक अनिक अलख ठाकुर ओट नानक तिसु गही ॥1॥ अंम्रित बनु संसारु सहाई आपि भए ॥ राम नामु उर हारु बिखु के दिवस गए ॥ गतु भरम मोह बिकार बिनसे जोनि आवण सभ रहे ॥ अगनि सागर भए सीतल साध अंचल गहि रहे ॥ गोविंद गुपाल दइआल संम्रिथ बोलि साधू हरि जै जए ॥ नानक नामु धिआइ पूरन साधसंगि पाई परम गते ॥2॥ जह देखउ तह संगि एको रवि रहिआ ॥ घट घट वासी आपि विरलै किनै लहिआ ॥ जलि थलि महीअलि पूरि पूरन कीट हसति समानिआ ॥ आदि अंते मधि सोई गुर प्रसादी जानिआ ॥ ब्रहमु पसरिआ ब्रहम लीला गोविंद गुण निधि जनि कहिआ ॥ सिमरि सुआमी अंतरजामी हरि एकु नानक रवि रहिआ ॥3॥ दिनु रैणि सुहावड़ी आई सिमरत नामु हरे ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई !) जो भगवान सब जीवों का पति है मालिक है जिन संत जनों ने उसका आसरा लिया हुआ है (उस आसरे की बरकति से) उनकी जीवात्मा (दुनिया के) डरों से रहित हो गई है। उनकी हरेक किस्म की चिंता दूर हो गई है। उन्होंने भगवान को अपना माता-पिता-पुत्र-मित्र-सज्जन-रिश्तेदार समझ रखा है। गुरू ने उन्हें भगवान के चरणों में जोड़ दिया है।(भगवान ने उनकी बाँह) पकड़ के उनको अपने गले से लगा लिया है।वह संत-जन परमात्मा की सिफत उचारते रहते हैं। हे भाई ! उस परमात्मा के बेअंत गुण हैं।अनेकों वडिआईआं हैं।उस (की बुर्जुगियत) का रत्ती भर भी मूल्य नहीं आँका जा सकता। वह प्रभू अपने एक स्वरूप से अनेक रूप बना हुआ है।उसके सही स्वरूप का बयान नहीं किया जा सकता।वह सबका मालिक है।हे नानक ! (कह, संत-जनों ने) उस परमातमा का आसरा लिया हुआ है। 1। हे भाई ! परमात्मा स्वयं जिस मनुष्य का मददगार बनता है।उसके वास्ते संसार-समुंद्र आत्मिक जीवन देने वाला जल बन जाता है। जो मनुष्य परमात्मा के नाम को अपने हृदय का हार बना लेता है।उसके वास्ते (आत्मिक मौत लाने वाली माया के मोह के) जहर खाने वाले दिन बीत जाते हैं। उसकी भटकना समाप्त हो जाती है।उसके अंदर मोह और विकार नाश हो जाते हैं।उसके जन्मों के चक्कर समाप्त हो जाते हैं। जो मनुष्य गुरू का पल्ला पकड़े रखता है।विकारों की आग से भरा हुआ संसार-समुंद्र उसके वास्ते ठंडा-ठार हो जाता है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर गोविंद गोपाल दयालु समर्थ परमात्मा की जै-जैकार करता रहा कर। गुरू की संगति में रहके पूर्ण परमात्मा का नाम सिमर के सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त कर ली जाती है। 2। हे भाई ! मैं जिधर देखता हूँ।उधर ही मेरे साथ मुझे एक परमात्मा ही मौजूद दिखता है। वह स्वयं ही एक शरीर में निवास रखता है।पर किसी विरले ने ये बात समझी है। वह व्यापक प्रभू पानी में धरती में अंतरिक्ष में हर जगह बस रहा है।कीड़ी में हाथी में एक सा ही। जगत-रचना के आरम्भ में वह स्वयं ही था।रचना के अंत में भी वह स्वयं ही होंगे।अब भी वह स्वयं ही स्वयं है।गुरू की किरपा से ही इस बात की समझ आती है। हे भाई ! हर तरफ परमात्मा का ही पसारा है।परमात्मा की ही रची हुई खेल चल रही है।वह परमात्मा सारे गुणों का खजाना है।किसी विरले सेवक ने उसको जपा है। हे नानक ! हरेक के दिल की जानने वाले उस मालिक को सिमरता रह।वह हरी खुद ही हर जगह मौजूद है। 3। हे भाई ! मनुष्य के लिए वह दिन सोहाना आता है वह रात सुहावनी आती है जब वह परमात्मा का नाम सिमरता है।
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा।
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।