अंग
383
आसा
अंग बदलें या अंश चुनें · ४ अंश
आगै ही ते सभु किछु हूआ अवरु कि जाणै गिआना ॥
आसा महला 5 ॥
आगै ही ते सभु किछु हूआ अवरु कि जाणै गिआना ॥
भूल चूक अपना बारिकु बखसिआ पारब्रहम भगवाना ॥1॥
सतिगुरु मेरा सदा दइआला मोहि दीन कउ राखि लीआ ॥
काटिआ रोगु महा सुखु पाइआ हरि अंम्रितु मुखि नामु दीआ ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक पाप मेरे परहरिआ बंधन काटे मुकत भए ॥
अंध कूप महा घोर ते बाह पकरि गुरि काढि लीए ॥2॥
निरभउ भए सगल भउ मिटिआ राखे राखनहारे ॥
ऐसी दाति तेरी प्रभ मेरे कारज सगल सवारे ॥3॥
गुण निधान साहिब मनि मेला ॥
सरणि पइआ नानक सोुहेला ॥4॥9॥48॥
आगै ही ते सभु किछु हूआ अवरु कि जाणै गिआना ॥
भूल चूक अपना बारिकु बखसिआ पारब्रहम भगवाना ॥1॥
सतिगुरु मेरा सदा दइआला मोहि दीन कउ राखि लीआ ॥
काटिआ रोगु महा सुखु पाइआ हरि अंम्रितु मुखि नामु दीआ ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक पाप मेरे परहरिआ बंधन काटे मुकत भए ॥
अंध कूप महा घोर ते बाह पकरि गुरि काढि लीए ॥2॥
निरभउ भए सगल भउ मिटिआ राखे राखनहारे ॥
ऐसी दाति तेरी प्रभ मेरे कारज सगल सवारे ॥3॥
गुण निधान साहिब मनि मेला ॥
सरणि पइआ नानक सोुहेला ॥4॥9॥48॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ जो बख्शिश मेरे ऊपर हुई है धुर से ही हुई है, इसके बिना जीव और क्या ज्ञान समझ सकता है। मेरी अनेकों भूलें-चूकें देख के भी पारब्रहम भगवान ने मुझे अपने बालक को बख्श लिया है। 1। (हे भाई !) मेरा सतिगुरू सदा ही दयावान रहता है उसने मुझे (आत्मिक जीवन के सरमाए से) कंगाल को (आत्मिक मौत लाने वाले रोग से) बचा लिया। (सतिगुरू ने) मेरे मुंह में परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल डाला (मेरा विकारों का) रोग काटा गया।मुझे बड़ा आत्मिक आनंद प्राप्त हुआ। 1।रहाउ। (हे भाई !) गुरू ने मेरे अनेकों पाप दूर कर दिए हैं।मेरे (माया के मोह के) बंधन काट दिए हैं।मैं (मोह के बंधनों से) स्वतंत्र हो गया हूँ। गुरू ने मेरी बाँह पकड़ के मुझे (माया के मोह के) घोर अंधकार में से निकाल लिया है। 2। (हे भाई ! विकारों से) बचा सकने की ताकत रखने वाले परमात्मा ने (मुझे विकारों से) बचा लिया है।अब (माया के हमलों से) बे-फिक्र हूँ। (इस ओर से) मेरा हरेक किस्म का डर-खतरा समाप्त हो गया है। हे मेरे प्रभू ! आपकी ऐसी बख्शिश मेरे ऊपर हुई है कि मेरे (आत्मिक जीवन के) सारे ही कारज सफल हो गए हैं। 3। हे नानक ! (कह, हे भाई !) गुणों के खजाने मालिक-प्रभू का मेरे मन में मिलाप हो गया है (जब का गुरू की कृपा से) मैं (उसकी) शरण पड़ा हूँ मैं निष्चिंत हो गया हूँ। 4। 9। 48।
तूं विसरहि तां सभु को लागू चीति आवहि तां सेवा ॥
आसा महला 5 ॥
तूं विसरहि तां सभु को लागू चीति आवहि तां सेवा ॥
अवरु न कोऊ दूजा सूझै साचे अलख अभेवा ॥1॥
चीति आवै तां सदा दइआला लोगन किआ वेचारे ॥
बुरा भला कहु किस नो कहीऐ सगले जीअ तुम॑ारे ॥1॥ रहाउ ॥
तेरी टेक तेरा आधारा हाथ देइ तूं राखहि ॥
जिसु जन ऊपरि तेरी किरपा तिस कउ बिपु न कोऊ भाखै ॥2॥
ओहो सुखु ओहा वडिआई जो प्रभ जी मनि भाणी ॥
तूं दाना तूं सद मिहरवाना नामु मिलै रंगु माणी ॥3॥
तुधु आगै अरदासि हमारी जीउ पिंडु सभु तेरा ॥
कहु नानक सभ तेरी वडिआई कोई नाउ न जाणै मेरा ॥4॥10॥49॥
तूं विसरहि तां सभु को लागू चीति आवहि तां सेवा ॥
अवरु न कोऊ दूजा सूझै साचे अलख अभेवा ॥1॥
चीति आवै तां सदा दइआला लोगन किआ वेचारे ॥
बुरा भला कहु किस नो कहीऐ सगले जीअ तुम॑ारे ॥1॥ रहाउ ॥
तेरी टेक तेरा आधारा हाथ देइ तूं राखहि ॥
जिसु जन ऊपरि तेरी किरपा तिस कउ बिपु न कोऊ भाखै ॥2॥
ओहो सुखु ओहा वडिआई जो प्रभ जी मनि भाणी ॥
तूं दाना तूं सद मिहरवाना नामु मिलै रंगु माणी ॥3॥
तुधु आगै अरदासि हमारी जीउ पिंडु सभु तेरा ॥
कहु नानक सभ तेरी वडिआई कोई नाउ न जाणै मेरा ॥4॥10॥49॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे प्रभू ! यदि आप मेरे मन में से बिसर जाएँ तो हरेक जीव मुझे वैरी प्रतीत होता है।पर अगर आप मेरे चित्त में आ बसें तो हर कोई मेरा आदर-सत्कार करता है। हे सदा कायम रहने वाले ! हे अलख ! हे अभेव प्रभू ! मुझे (जगत में) आपके बराबर का और कोई नहीं दिखता। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में परमात्मा की याद टिकी रहती है उस पर परमात्मा सदा दयावान रहता है।दुनिया के बिचारे लोग उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। हे प्रभू ! सारे जीव आपके पैदा किए हुए हैं।फिर बता।किसको ठीक कहा जा सकता है और किसे बुरा कहा जा सकता है।(भाव।परमातमा की याद मन में बसाने वाले मनुष्य को सब जीव परमात्मा के पैदा किए हुए दिखते हैं।वह किसी को बुरा नहीं समझता)। 1।रहाउ। हे प्रभू ! मुझे आपकी ही ओट है।आपका ही आसरा है।आप अपना हाथ दे के स्वयं (हमारी) रक्षा करते हैं। जिस मनुष्य पे आपकी (मेहर की) नजर हो उसे कोई मनुष्य बुरे वचन नहीं कहता। 2। हे प्रभू जी !जो बात आपको अपने मन में अच्छी लगती है वही मेरे वास्ते सुख है।वही मेरे वास्ते आदर-सत्कार है। आप सबके दिल की जानने वाले हैं।आप सदा सब जीवों पे दयावान रहते हैं।मैं तभी आनंद ले सकता हूँ जब मुझे आपका नाम मिला रहे। 3। हे प्रभू ! आपके आगे मेरी अरदास है, मेरे ये प्राण ये शरीर सब कुछ आपका ही दिया हुआ है। हे नानक ! कह, (अगर कोई मेरा आदर-सत्कार करता है तो) ये आपकी ही बख्शी हुई वडिआई है।(यदि मैं आपको भुला बैठूँ तो) कोई जीव मेरा नाम पता करने की भी परवाह ना करे। 4। 10। 49।
करि किरपा प्रभ अंतरजामी साधसंगि हरि पाईऐ ॥
आसा महला 5 ॥
करि किरपा प्रभ अंतरजामी साधसंगि हरि पाईऐ ॥
खोलि किवार दिखाले दरसनु पुनरपि जनमि न आईऐ ॥1॥
मिलउ परीतम सुआमी अपुने सगले दूख हरउ रे ॥
पारब्रहमु जिनि॑ रिदै अराधिआ ता कै संगि तरउ रे ॥1॥ रहाउ ॥
महा उदिआन पावक सागर भए हरख सोग महि बसना ॥
सतिगुरु भेटि भइआ मनु निरमलु जपि अंम्रितु हरि रसना ॥2॥
तनु धनु थापि कीओ सभु अपना कोमल बंधन बांधिआ ॥
गुर परसादि भए जन मुकते हरि हरि नामु अराधिआ ॥3॥
राखि लीए प्रभि राखनहारै जो प्रभ अपुने भाणे ॥
जीउ पिंडु सभु तुम॑रा दाते नानक सद कुरबाणे ॥4॥11॥50॥
करि किरपा प्रभ अंतरजामी साधसंगि हरि पाईऐ ॥
खोलि किवार दिखाले दरसनु पुनरपि जनमि न आईऐ ॥1॥
मिलउ परीतम सुआमी अपुने सगले दूख हरउ रे ॥
पारब्रहमु जिनि॑ रिदै अराधिआ ता कै संगि तरउ रे ॥1॥ रहाउ ॥
महा उदिआन पावक सागर भए हरख सोग महि बसना ॥
सतिगुरु भेटि भइआ मनु निरमलु जपि अंम्रितु हरि रसना ॥2॥
तनु धनु थापि कीओ सभु अपना कोमल बंधन बांधिआ ॥
गुर परसादि भए जन मुकते हरि हरि नामु अराधिआ ॥3॥
राखि लीए प्रभि राखनहारै जो प्रभ अपुने भाणे ॥
जीउ पिंडु सभु तुम॑रा दाते नानक सद कुरबाणे ॥4॥11॥50॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे सबके दिल की जानने वाले प्रभू ! मेहर कर (और मुझे गुरू की संगति मिला)।(हे भाई !) गुरू की संगति में रहने से परमात्मा मिल जाता है। हमारे (माया के मोह के बंद पड़े) किवाड़ खोल के अपने दर्शन करवाता है।और दुबारा (हम) जन्मों के चक्करों में नहीं पड़ते। 1। हे भाई ! (यदि मेरे ऊपर प्रभू की कृपा हो जाए तो) मैं अपने प्यारे पति-प्रभू को मिल जाऊँ और अपने सारे दुख दूर कर लूँ। हे भाई ! जिस मनुष्य ने परमात्मा प्रभू को अपने हृदय में सिमरा है।मैं भी उसकी संगति में रहके संसार-समुंद्र से पार लांघ जाऊँ। 1।रहाउ। (हे भाई ! प्रभू से विछुड़ के ये जगत मनुष्य के वास्ते) एक बड़ा जंगल बन जाता है (जिसमें मनुष्य भटकता फिरता है) आग का समुंद्र बन जाता है (जिसमें मनुष्य जलता रहता है) कभी खुशी में बसता है।कभी ग़मीं में। जिस मनुष्य को गुरू मिल जाता है।आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम जीभ से जप के उस मनुष्य का मन पवित्र हो जाता है। 2। (हे भाई !) इस शरीर को अपना समझ के।इस धन को अपना मान के जीव (माया के मोह के) मीठे-मीठे बंधनों से बंधे रहते हैं। पर जिन मनुष्यों ने परमात्मा के नाम की आराधना की वे गुरू की कृपा से (इन कोमल बंधनों से) आजाद हो जाते हैं। 3। (हे भाई !) जो मनुष्य।प्यारे प्रभू को अच्छे लगने लग पड़ते हैं।उन्हें (माया के कोमल बंधनों से) बचाने की शक्ति वाले प्रभू ने बचा लिया। हे नानक ! (कह) हे दातार ! ये प्राण और ये शरीर सब कुछ आपका ही दिया हुआ है (मेहर कर।मैं इन्हें अपना ही ना समझता रहूँ)।हे दातार ! मैं आप पे कुर्बान जाता हूँ। 4। 11। 50।
मोह मलन नीद ते छुटकी कउनु अनुग्रहु भइओ री ॥
आसा महला 5 ॥
मोह मलन नीद ते छुटकी कउनु अनुग्रहु भइओ री ॥
महा मोहनी तुधु न विआपै तेरा आलसु कहा गइओ री ॥1॥ रहाउ ॥
मोह मलन नीद ते छुटकी कउनु अनुग्रहु भइओ री ॥
महा मोहनी तुधु न विआपै तेरा आलसु कहा गइओ री ॥1॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे सहेली ! आप मन को मैला करने वाली मोह की नींद से बच गई हैं।आपके ऊपर कौन सी कृपा हुई है। (जीवों के मन को) मोह लेने वाली बली माया भी आपके पर जोर नहीं डाल सकती।आपका आलस भी सदा के लिए समाप्त हो गया है। 1।रहाउ।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३८३ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।