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अंग 382

अंग
382
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सोई अजाणु कहै मै जाना जानणहारु न छाना रे ॥
कहु नानक गुरि अमिउ पीआइआ रसकि रसकि बिगसाना रे ॥4॥5॥44॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जो मनुष्य (निरा ज़बानी ज़बानी) कहता है कि मैंने (आत्मिक जीवन के भेद को) समझ लिया है वह अभी मूर्ख है।जिसने (सचमुच आत्मिक जीवन को नाम-रस को) समझ लिया है वह कभी छुपा नहीं रहता है। हे नानक ! कह, जिसको गुरू ने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पिला दिया है वह इस नाम-जल का स्वाद ले ले के सदा खिला रहता है। 4। 5। 44।
आसा महला 5 ॥
बंधन काटि बिसारे अउगन अपना बिरदु सम॑ारिआ ॥
होए क्रिपाल मात पित निआई बारिक जिउ प्रतिपारिआ ॥1॥
गुरसिख राखे गुर गोपालि ॥
काढि लीए महा भवजल ते अपनी नदरि निहालि ॥1॥ रहाउ ॥
जा कै सिमरणि जम ते छुटीऐ हलति पलति सुखु पाईऐ ॥
सासि गिरासि जपहु जपु रसना नीत नीत गुण गाईऐ ॥2॥
भगति प्रेम परम पदु पाइआ साधसंगि दुख नाठे ॥
छिजै न जाइ किछु भउ न बिआपे हरि धनु निरमलु गाठे ॥3॥
अंति काल प्रभ भए सहाई इत उत राखनहारे ॥
प्रान मीत हीत धनु मेरै नानक सद बलिहारे ॥4॥6॥45॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई ! गुरू की शरण आए सिखों के माया के) बंधन काट के परमात्मा (उनके पिछले किए) अवगुणों को भुला देता है (और इस तरह) अपना मूल स्वभाव (बिरद) याद रखता है। माता-पिता की तरह उन पर दयावान होता है और बच्चों की तरह उन्हें पालता है। 1। (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ने वाले (भाग्यशाली) सिखों को सबसे बड़ा जगत-पालक प्रभू (विकारों से) बचा लेता है। अपनी मेहर की नजर से देख के उन्हें बड़े संसार-समुंद्र में से निकाल लेता है। 1।रहाउ। जिस परमात्मा के सिमरन की बरकति से जमों से (आत्मिक मौत से) खलासी मिलती है,इस लोक और परलोक में सुख भोगते हैं (हे भाई !) हरेक सांस से हरेक ग्रास से उसका नाम अपनी जीभ से जपा करो।आएँ सदा ही उसकी सिफत सालाह के गीत गाते रहें। 2। (हे भाई ! गुरू की शरण आने वाले) सिखों के पास परमात्मा के नाम का पवित्र धन इकट्ठा हो जाता है (उस धन को किसी चोर आदि का) डर नहीं व्याप्तता। वह धन कम नहीं होता।वह धन गायब भी नहीं होता।साध-संगति में आ के (उन गुरसिखों के सारे) दुख दूर हो जाते हैं।परमात्मा के प्रेम और भक्ति की बरकति से वह सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लेते हैं। 3। (हे भाई !) प्रभू जी (गुरसिखों के) अंत समय भी मददगार बनते हैं। इस लोक और परलोक में रक्षा करते हैं। हे नानक ! (कह) मैं परमात्मा पर से सदा कुर्बान जाता हूँ उसका नाम ही मेरे पास ऐसा धन है जो मेरे प्राणों का हितैषी और मेरा मित्र है। 4। 6। 45।
आसा महला 5 ॥
जा तूं साहिबु ता भउ केहा हउ तुधु बिनु किसु सालाही ॥
एकु तूं ता सभु किछु है मै तुधु बिनु दूजा नाही ॥1॥
बाबा बिखु देखिआ संसारु ॥
रखिआ करहु गुसाई मेरे मै नामु तेरा आधारु ॥1॥ रहाउ ॥
जाणहि बिरथा सभा मन की होरु किसु पहि आखि सुणाईऐ ॥
विणु नावै सभु जगु बउराइआ नामु मिलै सुखु पाईऐ ॥2॥
किआ कहीऐ किसु आखि सुणाईऐ जि कहणा सु प्रभ जी पासि ॥
सभु किछु कीता तेरा वरतै सदा सदा तेरी आस ॥3॥
जे देहि वडिआई ता तेरी वडिआई इत उत तुझहि धिआउ ॥
नानक के प्रभ सदा सुखदाते मै ताणु तेरा इकु नाउ ॥4॥7॥46॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे प्रभू ! अगर आप मालिक (मेरे सिर पर हाथ रखे रहे।तो मुझे माया-जहर से) कोई डर-खतरा नहीं हैं सकता।मैं आप बिना किसी और की सराहना नहीं करता (मैं आपके बिना किसी और को माया-जहर से बचाने के समर्थ नहीं समझता)। हे प्रभू ! अगर एक आप ही मेरी ओर रहे तो हरेक जरूरत वाली चीज मेरे पास है।आपके बिना मेरा और कोई सहायता करने वाला नहीं। 1। हे प्रभू ! मैंने देख लिया है कि संसार (का मोह) जहर है (जो आत्मिक जीवन को मार डालता है)। हे मेरे पति-प्रभू ! (इस जहर से) मुझे बचाए रख।आपका नाम मेरी जिंदगी का आसरा बना रहे। 1।रहाउ। हे प्रभु ! आप ही (हरेक जीव के) मन की सारी पीड़ा जानता है।आपके बिना किसी और को अपने मन का दुख-दर्द बताना व्यर्थ है। (हे भाई !) परमात्मा के नाम से टूट के सारा जगत झल्ला हुआ फिरता है।अगर परमात्मा का नाम प्राप्त हो जाए तो आत्मिक आनंद मिल जाता है। 2। (हे भाई ! अपने मन का दुख-दर्द) जो कुछ भी कहना हो परमात्मा के पास ही कहना चाहिए (क्योंकि परमात्मा ही हमारे दुख दूर करने के काबिल है)। हे मालिक ! जो कुछ आपने किया है, जगत में सब कुछ आपका किया ही हैं रहा है। मुझे सदैव ही आपकी आशा है॥ 3॥ हे प्रभू ! अगर आप मुझे कोई मान-वडिआई (मान-सम्मान) बख्शता है तो इससे भी आपकी ही शोभा फैलती है क्योंकि मैं तो इस लोक और परलोक में सदा आपका ही ध्यान धरता हूँ। हे नानक के प्रभू ! हे सदा सुख देने वाले प्रभू ! आपका नाम ही मेरे वास्ते सहारा है। 4। 7। 46।
आसा महला 5 ॥
अंम्रितु नामु तुम॑ारा ठाकुर एहु महा रसु जनहि पीओ ॥
जनम जनम चूके भै भारे दुरतु बिनासिओ भरमु बीओ ॥1॥
दरसनु पेखत मै जीओ ॥
सुनि करि बचन तुम॑ारे सतिगुर मनु तनु मेरा ठारु थीओ ॥1॥ रहाउ ॥
तुम॑री क्रिपा ते भइओ साधसंगु एहु काजु तुम॑ आपि कीओ ॥
दिड़ु करि चरण गहे प्रभ तुम॑रे सहजे बिखिआ भई खीओ ॥2॥
सुख निधान नामु प्रभ तुमरा एहु अबिनासी मंत्रु लीओ ॥
करि किरपा मोहि सतिगुरि दीना तापु संतापु मेरा बैरु गीओ ॥3॥
धंनु सु माणस देही पाई जितु प्रभि अपनै मेलि लीओ ॥
धंनु सु कलिजुगु साधसंगि कीरतनु गाईऐ नानक नामु अधारु हीओ ॥4॥8॥47॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे ठाकुर ! आपका नाम आत्मिक जीवन देने वाला जल है (गुरू की सहायता से) ये श्रेष्ठ रस आपके किसी दास ने ही पीया है (जिसने पीया उसके) जन्मों-जन्मांतरों के डर और (किये विकारों के) भार खत्म हो गए।(उसके अंदर से) पाप नाश हो गया (उसके अंदर की) दूसरी भटकना (माया की भटकना) दूर हो गई। 1। हे सतिगुरू ! आपका दर्शन करके मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा हैं जाता है। आपके बचन सुन के मेरा मन ठंडा-ठार हैं जाता है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आपकी मेहर से (मुझे) गुरू की संगति हासिल हुई।ये (सुंदर) काम तूने स्वयं ही किया। (गुरू की शिक्षा से) मैंने।हे प्रभू ! आपके चरण कस कर पकड़ लिए।मैं आत्मिक अडोलता में टिक गया और (मेरे अंदर से) माया का जोर खत्म हो गया है। 2। हे सुखों के खजाने प्रभू ! कभी ना नाश होने वाला आपका नाम-मंत्र मैंने जपना शुरू कर दिया। आपका ये नाम-मंत्र मेहर करके मुझे सतिगुरू ने दिया (जिसकी बरकति से) मेरे अंदर से (हरेक किस्म का) दुख-कलेश और वैर-विरोध दूर हो गया। 3। हे नानक ! (कह) मुझे भाग्यशाली मानस शरीर मिला जिसकी बरकति से प्रभू ने मुझे अपने चरणों में जोड़ लिया (लोग कलियुग की निंदा करते हैं। पर) ये कलियुग भी मुबारक है अगर गुरू की संगति में टिक के परमात्मा का कीर्तन किया जाए और अगर परमात्मा का नाम हृदय का आसरा बना रहे। 4। 8। 47।

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जो मनुष्य (निरा ज़बानी ज़बानी) कहता है कि मैंने (आत्मिक जीवन के भेद को) समझ लिया है वह अभी मूर्ख है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।