कहु नानक गुरि अमिउ पीआइआ रसकि रसकि बिगसाना रे ॥4॥5॥44॥
बंधन काटि बिसारे अउगन अपना बिरदु सम॑ारिआ ॥
होए क्रिपाल मात पित निआई बारिक जिउ प्रतिपारिआ ॥1॥
गुरसिख राखे गुर गोपालि ॥
काढि लीए महा भवजल ते अपनी नदरि निहालि ॥1॥ रहाउ ॥
जा कै सिमरणि जम ते छुटीऐ हलति पलति सुखु पाईऐ ॥
सासि गिरासि जपहु जपु रसना नीत नीत गुण गाईऐ ॥2॥
भगति प्रेम परम पदु पाइआ साधसंगि दुख नाठे ॥
छिजै न जाइ किछु भउ न बिआपे हरि धनु निरमलु गाठे ॥3॥
अंति काल प्रभ भए सहाई इत उत राखनहारे ॥
प्रान मीत हीत धनु मेरै नानक सद बलिहारे ॥4॥6॥45॥
जा तूं साहिबु ता भउ केहा हउ तुधु बिनु किसु सालाही ॥
एकु तूं ता सभु किछु है मै तुधु बिनु दूजा नाही ॥1॥
बाबा बिखु देखिआ संसारु ॥
रखिआ करहु गुसाई मेरे मै नामु तेरा आधारु ॥1॥ रहाउ ॥
जाणहि बिरथा सभा मन की होरु किसु पहि आखि सुणाईऐ ॥
विणु नावै सभु जगु बउराइआ नामु मिलै सुखु पाईऐ ॥2॥
किआ कहीऐ किसु आखि सुणाईऐ जि कहणा सु प्रभ जी पासि ॥
सभु किछु कीता तेरा वरतै सदा सदा तेरी आस ॥3॥
जे देहि वडिआई ता तेरी वडिआई इत उत तुझहि धिआउ ॥
नानक के प्रभ सदा सुखदाते मै ताणु तेरा इकु नाउ ॥4॥7॥46॥
अंम्रितु नामु तुम॑ारा ठाकुर एहु महा रसु जनहि पीओ ॥
जनम जनम चूके भै भारे दुरतु बिनासिओ भरमु बीओ ॥1॥
दरसनु पेखत मै जीओ ॥
सुनि करि बचन तुम॑ारे सतिगुर मनु तनु मेरा ठारु थीओ ॥1॥ रहाउ ॥
तुम॑री क्रिपा ते भइओ साधसंगु एहु काजु तुम॑ आपि कीओ ॥
दिड़ु करि चरण गहे प्रभ तुम॑रे सहजे बिखिआ भई खीओ ॥2॥
सुख निधान नामु प्रभ तुमरा एहु अबिनासी मंत्रु लीओ ॥
करि किरपा मोहि सतिगुरि दीना तापु संतापु मेरा बैरु गीओ ॥3॥
धंनु सु माणस देही पाई जितु प्रभि अपनै मेलि लीओ ॥
धंनु सु कलिजुगु साधसंगि कीरतनु गाईऐ नानक नामु अधारु हीओ ॥4॥8॥47॥
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जो मनुष्य (निरा ज़बानी ज़बानी) कहता है कि मैंने (आत्मिक जीवन के भेद को) समझ लिया है वह अभी मूर्ख है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।