Lulla Family

अंग ३८२ · आसा

अंग
382
आसा
अंग बदलें या अंश चुनें · ४ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. सोई अजाणु कहै मै जाना जानणहारु न छाना रे ॥
  2. बंधन काटि बिसारे अउगन अपना बिरदु सम॑ारिआ ॥
  3. जा तूं साहिबु ता भउ केहा हउ तुधु बिनु किसु सालाही ॥
  4. अंम्रितु नामु तुम॑ारा ठाकुर एहु महा रसु जनहि पीओ ॥

सोई अजाणु कहै मै जाना जानणहारु न छाना रे ॥

अंग ३८१ से चला आ रहा अंश

सोई अजाणु कहै मै जाना जानणहारु न छाना रे ॥
कहु नानक गुरि अमिउ पीआइआ रसकि रसकि बिगसाना रे ॥4॥5॥44॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जो मनुष्य (निरा ज़बानी ज़बानी) कहता है कि मैंने (आत्मिक जीवन के भेद को) समझ लिया है वह अभी मूर्ख है।जिसने (सचमुच आत्मिक जीवन को नाम-रस को) समझ लिया है वह कभी छुपा नहीं रहता है। हे नानक ! कह, जिसको गुरू ने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पिला दिया है वह इस नाम-जल का स्वाद ले ले के सदा खिला रहता है। 4। 5। 44।

बंधन काटि बिसारे अउगन अपना बिरदु सम॑ारिआ ॥

आसा महला 5 ॥
बंधन काटि बिसारे अउगन अपना बिरदु सम॑ारिआ ॥
होए क्रिपाल मात पित निआई बारिक जिउ प्रतिपारिआ ॥1॥
गुरसिख राखे गुर गोपालि ॥
काढि लीए महा भवजल ते अपनी नदरि निहालि ॥1॥ रहाउ ॥
जा कै सिमरणि जम ते छुटीऐ हलति पलति सुखु पाईऐ ॥
सासि गिरासि जपहु जपु रसना नीत नीत गुण गाईऐ ॥2॥
भगति प्रेम परम पदु पाइआ साधसंगि दुख नाठे ॥
छिजै न जाइ किछु भउ न बिआपे हरि धनु निरमलु गाठे ॥3॥
अंति काल प्रभ भए सहाई इत उत राखनहारे ॥
प्रान मीत हीत धनु मेरै नानक सद बलिहारे ॥4॥6॥45॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई ! गुरू की शरण आए सिखों के माया के) बंधन काट के परमात्मा (उनके पिछले किए) अवगुणों को भुला देता है (और इस तरह) अपना मूल स्वभाव (बिरद) याद रखता है। माता-पिता की तरह उन पर दयावान होता है और बच्चों की तरह उन्हें पालता है। 1। (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ने वाले (भाग्यशाली) सिखों को सबसे बड़ा जगत-पालक प्रभू (विकारों से) बचा लेता है। अपनी मेहर की नजर से देख के उन्हें बड़े संसार-समुंद्र में से निकाल लेता है। 1।रहाउ। जिस परमात्मा के सिमरन की बरकति से जमों से (आत्मिक मौत से) खलासी मिलती है,इस लोक और परलोक में सुख भोगते हैं (हे भाई !) हरेक सांस से हरेक ग्रास से उसका नाम अपनी जीभ से जपा करो।आएँ सदा ही उसकी सिफत सालाह के गीत गाते रहें। 2। (हे भाई ! गुरू की शरण आने वाले) सिखों के पास परमात्मा के नाम का पवित्र धन इकट्ठा हो जाता है (उस धन को किसी चोर आदि का) डर नहीं व्याप्तता। वह धन कम नहीं होता।वह धन गायब भी नहीं होता।साध-संगति में आ के (उन गुरसिखों के सारे) दुख दूर हो जाते हैं।परमात्मा के प्रेम और भक्ति की बरकति से वह सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लेते हैं। 3। (हे भाई !) प्रभू जी (गुरसिखों के) अंत समय भी मददगार बनते हैं। इस लोक और परलोक में रक्षा करते हैं। हे नानक ! (कह) मैं परमात्मा पर से सदा कुर्बान जाता हूँ उसका नाम ही मेरे पास ऐसा धन है जो मेरे प्राणों का हितैषी और मेरा मित्र है। 4। 6। 45।

जा तूं साहिबु ता भउ केहा हउ तुधु बिनु किसु सालाही ॥

आसा महला 5 ॥
जा तूं साहिबु ता भउ केहा हउ तुधु बिनु किसु सालाही ॥
एकु तूं ता सभु किछु है मै तुधु बिनु दूजा नाही ॥1॥
बाबा बिखु देखिआ संसारु ॥
रखिआ करहु गुसाई मेरे मै नामु तेरा आधारु ॥1॥ रहाउ ॥
जाणहि बिरथा सभा मन की होरु किसु पहि आखि सुणाईऐ ॥
विणु नावै सभु जगु बउराइआ नामु मिलै सुखु पाईऐ ॥2॥
किआ कहीऐ किसु आखि सुणाईऐ जि कहणा सु प्रभ जी पासि ॥
सभु किछु कीता तेरा वरतै सदा सदा तेरी आस ॥3॥
जे देहि वडिआई ता तेरी वडिआई इत उत तुझहि धिआउ ॥
नानक के प्रभ सदा सुखदाते मै ताणु तेरा इकु नाउ ॥4॥7॥46॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे प्रभू ! अगर आप मालिक (मेरे सिर पर हाथ रखे रहे।तो मुझे माया-जहर से) कोई डर-खतरा नहीं हो सकता।मैं आप बिना किसी और की सराहना नहीं करता (मैं आपके बिना किसी और को माया-जहर से बचाने के समर्थ नहीं समझता)। हे प्रभू ! अगर एक आप ही मेरी ओर रहें तो हरेक जरूरत वाली चीज मेरे पास है।आपके बिना मेरा और कोई सहायता करने वाला नहीं। 1। हे प्रभू ! मैंने देख लिया है कि संसार (का मोह) जहर है (जो आत्मिक जीवन को मार डालता है)। हे मेरे पति-प्रभू ! (इस जहर से) मुझे बचाए रख।आपका नाम मेरी जिंदगी का आसरा बना रहे। 1।रहाउ। हे प्रभु ! आप ही (हरेक जीव के) मन की सारी पीड़ा जानते हैं।आपके बिना किसी और को अपने मन का दुख-दर्द बताना व्यर्थ है। (हे भाई !) परमात्मा के नाम से टूट के सारा जगत झल्ला हुआ फिरता है।अगर परमात्मा का नाम प्राप्त हो जाए तो आत्मिक आनंद मिल जाता है। 2। (हे भाई ! अपने मन का दुख-दर्द) जो कुछ भी कहना हो परमात्मा के पास ही कहना चाहिए (क्योंकि परमात्मा ही हमारे दुख दूर करने के काबिल है)। हे मालिक ! जो कुछ आपने किया है, जगत में सब कुछ आपका किया ही हो रहा है। मुझे सदैव ही आपकी आशा है॥ 3॥ हे प्रभू ! अगर आप मुझे कोई मान-वडिआई (मान-सम्मान) बख्शते हैं तो इससे भी आपकी ही शोभा फैलती है क्योंकि मैं तो इस लोक और परलोक में सदा आपका ही ध्यान धरता हूँ। हे नानक के प्रभू ! हे सदा सुख देने वाले प्रभू ! आपका नाम ही मेरे वास्ते सहारा है। 4। 7। 46।

अंम्रितु नामु तुम॑ारा ठाकुर एहु महा रसु जनहि पीओ ॥

आसा महला 5 ॥
अंम्रितु नामु तुम॑ारा ठाकुर एहु महा रसु जनहि पीओ ॥
जनम जनम चूके भै भारे दुरतु बिनासिओ भरमु बीओ ॥1॥
दरसनु पेखत मै जीओ ॥
सुनि करि बचन तुम॑ारे सतिगुर मनु तनु मेरा ठारु थीओ ॥1॥ रहाउ ॥
तुम॑री क्रिपा ते भइओ साधसंगु एहु काजु तुम॑ आपि कीओ ॥
दिड़ु करि चरण गहे प्रभ तुम॑रे सहजे बिखिआ भई खीओ ॥2॥
सुख निधान नामु प्रभ तुमरा एहु अबिनासी मंत्रु लीओ ॥
करि किरपा मोहि सतिगुरि दीना तापु संतापु मेरा बैरु गीओ ॥3॥
धंनु सु माणस देही पाई जितु प्रभि अपनै मेलि लीओ ॥
धंनु सु कलिजुगु साधसंगि कीरतनु गाईऐ नानक नामु अधारु हीओ ॥4॥8॥47॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे ठाकुर ! आपका नाम आत्मिक जीवन देने वाला जल है (गुरू की सहायता से) ये श्रेष्ठ रस आपके किसी दास ने ही पीया है (जिसने पीया उसके) जन्मों-जन्मांतरों के डर और (किये विकारों के) भार खत्म हो गए।(उसके अंदर से) पाप नाश हो गया (उसके अंदर की) दूसरी भटकना (माया की भटकना) दूर हो गई। 1। हे सतिगुरू ! आपका दर्शन करके मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा हो जाता है। आपके बचन सुन के मेरा मन ठंडा-ठार हो जाता है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आपकी मेहर से (मुझे) गुरू की संगति हासिल हुई।ये (सुंदर) काम आपने स्वयं ही किया। (गुरू की शिक्षा से) मैंने।हे प्रभू ! आपके चरण कस कर पकड़ लिए।मैं आत्मिक अडोलता में टिक गया और (मेरे अंदर से) माया का जोर खत्म हो गया है। 2। हे सुखों के खजाने प्रभू ! कभी ना नाश होने वाला आपका नाम-मंत्र मैंने जपना शुरू कर दिया। आपका ये नाम-मंत्र मेहर करके मुझे सतिगुरू ने दिया (जिसकी बरकति से) मेरे अंदर से (हरेक किस्म का) दुख-कलेश और वैर-विरोध दूर हो गया। 3। हे नानक ! (कह) मुझे भाग्यशाली मानस शरीर मिला जिसकी बरकति से प्रभू ने मुझे अपने चरणों में जोड़ लिया (लोग कलियुग की निंदा करते हैं। पर) ये कलियुग भी मुबारक है अगर गुरू की संगति में टिक के परमात्मा का कीर्तन किया जाए और अगर परमात्मा का नाम हृदय का आसरा बना रहे। 4। 8। 47।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३८२ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English