अंग
384
आसा
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कामु क्रोधु अहंकारु गाखरो संजमि कउन छुटिओ री ॥
कामु क्रोधु अहंकारु गाखरो संजमि कउन छुटिओ री ॥
सुरि नर देव असुर त्रै गुनीआ सगलो भवनु लुटिओ री ॥1॥
दावा अगनि बहुतु त्रिण जाले कोई हरिआ बूटु रहिओ री ॥
ऐसो समरथु वरनि न साकउ ता की उपमा जात न कहिओ री ॥2॥
काजर कोठ महि भई न कारी निरमल बरनु बनिओ री ॥
महा मंत्रु गुर हिरदै बसिओ अचरज नामु सुनिओ री ॥3॥
करि किरपा प्रभ नदरि अवलोकन अपुनै चरणि लगाई ॥
प्रेम भगति नानक सुखु पाइआ साधू संगि समाई ॥4॥12॥51॥
सुरि नर देव असुर त्रै गुनीआ सगलो भवनु लुटिओ री ॥1॥
दावा अगनि बहुतु त्रिण जाले कोई हरिआ बूटु रहिओ री ॥
ऐसो समरथु वरनि न साकउ ता की उपमा जात न कहिओ री ॥2॥
काजर कोठ महि भई न कारी निरमल बरनु बनिओ री ॥
महा मंत्रु गुर हिरदै बसिओ अचरज नामु सुनिओ री ॥3॥
करि किरपा प्रभ नदरि अवलोकन अपुनै चरणि लगाई ॥
प्रेम भगति नानक सुखु पाइआ साधू संगि समाई ॥4॥12॥51॥
हिन्दी अर्थ: हे बहन ! ये काम।क्रोध।ये अहंकार (ये हरेक।जीवों को) बहुत मुश्किलें देने वाले हैं।(आपके अंदर से) किस युक्ति से इनका नाश हुआ। हे बहन ! भले मनुष्य।देवते।दैत्य।सारे त्रिगुणी जीव- सारा जगत ही इन्होंने लूट लिया है (सारे जगत का आत्मिक जीवन का सरमाया इन्होंने लूट लिया है)। 1। हे सहेली ! जब जंगल को आग लगती है तो बहुत सारा घास-बूटा जल जाता है।कोई विरला हरा पौधा ही बचता है (इसी तरह जगत-जंगल को तृष्णा की आग जला रही है।कोई विरला आत्मिक तौर पे बली मनुष्य ही बच सकता है। जो इस तृष्णा-अग्नि की जलन से बचा है) ऐसे बली मनुष्य की आत्मिक अवस्था मैं बयान नहीं कर सकती।मैं बता नहीं सकती कि उस जैसा और कौन हो सकता है। 2। हे बहन ! मेरे हृदय में सतिगुरू का (शबद रूपी) बड़ा बली मंत्र बस रहा है।मैं आश्चर्य (ताकत वाले) प्रभू का नाम सुनती रहती हूँ। (इस वास्ते इस) काजल भरी कोठड़ी (संसार में रहते हुए भी) मैं विकारों की (कालिख़ से) काली नहीं हुई।मेरा साफ-सुथरा रंग ही टिका रहा है। 3। हे नानक ! (कह) हे बहिन ! प्रभू ने कृपा करके अपनी (मेहर की) निगाह से मुझे देखा।मुझे अपने चरणों में जोड़े रखा। मुझे उसका प्रेम प्राप्त हुआ।मुझे उसकी भक्ति (की दाति) मिली।मैं (तृष्णा-अग्नि में जल रहे संसार में भी) आत्मिक आनंद पा रही हूँ।मैं साध-संगति में लीन रहती हूँ। 4। 12। 51।
लालु चोलना तै तनि सोहिआ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु आसा घरु 7 महला 5 ॥
लालु चोलना तै तनि सोहिआ ॥
सुरिजन भानी तां मनु मोहिआ ॥1॥
कवन बनी री तेरी लाली ॥
कवन रंगि तूं भई गुलाली ॥1॥ रहाउ ॥
तुम ही सुंदरि तुमहि सुहागु ॥
तुम घरि लालनु तुम घरि भागु ॥2॥
तूं सतवंती तूं परधानि ॥
तूं प्रीतम भानी तुही सुर गिआनि ॥3॥
प्रीतम भानी तां रंगि गुलाल ॥
कहु नानक सुभ द्रिसटि निहाल ॥4॥
सुनि री सखी इह हमरी घाल ॥
प्रभ आपि सीगारि सवारनहार ॥1॥ रहाउ दूजा ॥1॥52॥
रागु आसा घरु 7 महला 5 ॥
लालु चोलना तै तनि सोहिआ ॥
सुरिजन भानी तां मनु मोहिआ ॥1॥
कवन बनी री तेरी लाली ॥
कवन रंगि तूं भई गुलाली ॥1॥ रहाउ ॥
तुम ही सुंदरि तुमहि सुहागु ॥
तुम घरि लालनु तुम घरि भागु ॥2॥
तूं सतवंती तूं परधानि ॥
तूं प्रीतम भानी तुही सुर गिआनि ॥3॥
प्रीतम भानी तां रंगि गुलाल ॥
कहु नानक सुभ द्रिसटि निहाल ॥4॥
सुनि री सखी इह हमरी घाल ॥
प्रभ आपि सीगारि सवारनहार ॥1॥ रहाउ दूजा ॥1॥52॥
हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु आसा घरु 7 महला 5 ॥ (हे बहिन !) आपके शरीर पे लाल रंग का चोला सुंदर लग रहा है (आपके मुंह की लाली सुंदर झलक मार रही है। शायद) आप सज्जन हरी को प्यारी लग रही हैं।तभी तो आपने मेरा मन (भी) मोह लिया है। 1। हे बहिन ! (बता।) आपके चेहरे पे लाली कैसे आ गई है। किस रंग की बरकति से आप सुंदर गाढ़े गुलाल रंग वाली बन गई हैं। 1।रहाउ। हे बहिन ! आप बड़ी खूबसूरत दिख रही हैं।आपके सुहाग-भाग्य उघड़ के सामने आ गए हैं (ऐसा प्रतीत होता है कि) आपके हृदय घर में प्रीतम प्रभू आ बसा है।आपके हृदय घर में किस्मत जाग पड़ी है। 2। हे बहिन ! आप स्वच्छ आचरण वाली हो गई हैं आप अब हर जगह आदर-मान पा रही हैं। (अगर) आप प्रीतम प्रभू को अच्छी लग रही हैं (तो) आप श्रेष्ठ ज्ञान वाली बन गई हैं। 3। हे नानक ! कह, (हे बहिन ! मैं) प्रीतम प्रभू को अच्छी लग गई हूँ।तभी तो मैं गाढ़े प्रेम रंग में रंगी गई हूँ। वह प्रीतम प्रभू मुझे अच्छी (प्यार भरी) निगाह से देखता है। 4। (पर) हे सहेली ! आप पूछती हैं (मैंने कौन सी मेहनत की। बस !) यही है मेहनत जो मैंने की कि उस सुंदरता की दाति देने वाले प्रभू ने खुद ही मुझे (अपने प्यार की दाति दे के) सुंदरी बना लिया है। 1।रहाउ दूसरा। 1। 52।
दूखु घनो जब होते दूरि ॥
आसा महला 5 ॥
दूखु घनो जब होते दूरि ॥
अब मसलति मोहि मिली हदूरि ॥1॥
चुका निहोरा सखी सहेरी ॥
भरमु गइआ गुरि पिर संगि मेरी ॥1॥ रहाउ ॥
निकटि आनि प्रिअ सेज धरी ॥
काणि कढन ते छूटि परी ॥2॥
मंदरि मेरै सबदि उजारा ॥
अनद बिनोदी खसमु हमारा ॥3॥
मसतकि भागु मै पिरु घरि आइआ ॥
थिरु सोहागु नानक जन पाइआ ॥4॥2॥53॥
दूखु घनो जब होते दूरि ॥
अब मसलति मोहि मिली हदूरि ॥1॥
चुका निहोरा सखी सहेरी ॥
भरमु गइआ गुरि पिर संगि मेरी ॥1॥ रहाउ ॥
निकटि आनि प्रिअ सेज धरी ॥
काणि कढन ते छूटि परी ॥2॥
मंदरि मेरै सबदि उजारा ॥
अनद बिनोदी खसमु हमारा ॥3॥
मसतकि भागु मै पिरु घरि आइआ ॥
थिरु सोहागु नानक जन पाइआ ॥4॥2॥53॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे सखी ! हे सहेली ! जब मैं प्रभू-चरणों से दूर रहती थी मुझे बहुत दुख (होता था) अब (गुरू की) शिक्षा की बरकति से मुझे (प्रभू की) हजूरी प्राप्त हो गई है (मैं प्रभू-चरणों में टिकी रहती हूँ। इस वास्ते कोई दुख-कलेश मुझे छू नहीं सकता)। 1। हे सखी ! हे सहेली ! (प्रभू चरणों से पहले विछोड़े के कारण पैदा हुए दुख कलेशों का) उलाहमा देना खत्म हो गया है। मुझे गुरू ने पति-प्रभू के साथ मिला दिया है।अब मेरी भटकना दूर हो गई है 1।रहाउ। हे सखी ! (गुरू ने) मुझे प्रभू-चरणों के नजदीक ला के प्यारे प्रभू-पति की सेज पर बैठा दिया है (प्रभू-चरणों में जोड़ दिया है)। अब (हरेक की) मुथाजी करने से मैं बच गई हूँ। 2। (हे सखी ! हे सहेली !) गुरू के शबद की बरकति से मेरे हृदय मंदिर में (सही आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो गया है। सारे आनंदों और खेल-तमाशों का मालिक मेरा पति-प्रभू (मुझे मिल गया है)। 3। माथे (के) भाग जाग पड़े हैं (क्योंकि) मेरा पति-प्रभू मेरे (हृदय-) घर में आ गया है। हे दास नानक ! (कह, हे सखी !) मेरे मैंने अब वह सुहाग ढूँढ लिया है। 4। 2। 53।
साचि नामि मेरा मनु लागा ॥
आसा महला 5 ॥
साचि नामि मेरा मनु लागा ॥
लोगन सिउ मेरा ठाठा बागा ॥1॥
बाहरि सूतु सगल सिउ मउला ॥
अलिपतु रहउ जैसे जल महि कउला ॥1॥ रहाउ ॥
मुख की बात सगल सिउ करता ॥
जीअ संगि प्रभु अपुना धरता ॥2॥
दीसि आवत है बहुतु भीहाला ॥
सगल चरन की इहु मनु राला ॥3॥
नानक जनि गुरु पूरा पाइआ ॥
साचि नामि मेरा मनु लागा ॥
लोगन सिउ मेरा ठाठा बागा ॥1॥
बाहरि सूतु सगल सिउ मउला ॥
अलिपतु रहउ जैसे जल महि कउला ॥1॥ रहाउ ॥
मुख की बात सगल सिउ करता ॥
जीअ संगि प्रभु अपुना धरता ॥2॥
दीसि आवत है बहुतु भीहाला ॥
सगल चरन की इहु मनु राला ॥3॥
नानक जनि गुरु पूरा पाइआ ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई !) मेरा मन सदा कायम रहने वाले परमात्मा के नाम में (सदा) जुड़ा रहता है। दुनिया के लोगों से मेरा उतना ही वरतन-व्यवहार है जितने की अति जरूरी जरूरत पड़ती है। 1। (हे भाई !) दुनिया से बरतने-व्यवहार के समय मैं सबसे प्यार वाला संबंध रखता हूँ। (पर दुनिया के साथ बरतता हुआ भी दुनिया से ऐसे) निर्लिप रहता हूँ जैसे पानी में (रहते हुए भी) कमल का फूल (पानी से निर्लिप रहता है)। 1।रहाउ। (हे भाई !) मैं सब लोगों से (जरूरत के मुताबिक) मुंह से बातें करता हूँ (पर। कहीं भी मोह में अपने मन को फसने नहीं देता) अपने हृदय में मैं सिर्फ परमात्मा को ही टिकाए रखता हूँ। 2। (हे भाई ! मेरे इस तरह के आत्मिक जीवन के अभ्यास के कारण लोगों को मेरा मन) बड़ा रूखा और कोरा दिखता है; पर (दरअसल मेरा) ये मन सबके चरणों की धूल बना रहता है। 3। हे नानक ! जिस (भी) मनुष्य ने पूरा गुरू पा लिया है
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३८४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।