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अंग ३४९ · आसा

अंग
349
आसा
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  1. कीमति पाइ न कहिआ जाइ ॥
  2. आखा जीवा विसरै मरि जाउ ॥
  3. जे दरि मांगतु कूक करे महली खसमु सुणे ॥
  4. ताल मदीरे घट के घाट ॥

कीमति पाइ न कहिआ जाइ ॥

अंग ३४८ से चला आ रहा अंश

कीमति पाइ न कहिआ जाइ ॥
कहणै वाले तेरे रहे समाइ ॥1॥
वडे मेरे साहिबा गहिर गंभीरा गुणी गहीरा ॥
कोई न जाणै तेरा केता केवडु चीरा ॥1॥ रहाउ ॥
सभि सुरती मिलि सुरति कमाई ॥
सभ कीमति मिलि कीमति पाई ॥
गिआनी धिआनी गुर गुर हाई ॥
कहणु न जाई तेरी तिलु वडिआई ॥2॥
सभि सत सभि तप सभि चंगिआईआ ॥
सिधा पुरखा कीआ वडिआईआं ॥
तुधु विणु सिधी किनै न पाईआ ॥
करमि मिलै नाही ठाकि रहाईआ ॥3॥
आखण वाला किआ बेचारा ॥
सिफती भरे तेरे भंडारा ॥
जिसु तूं देहि तिसै किआ चारा ॥
नानक सचु सवारणहारा ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: आपके बड़प्पन का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। (यह) नहीं कहा जा सकता (कि आप कितने बड़े हैं) आपकी वडिआई (महानता) कहने वाले (खुद को भूल के) आपके में (ही) लीन हो जाते हैं। 1। हे मेरे बड़े मालिक ! आप (मानो, एक) गहरा (समुंद्र) हैं। आप बड़े जिगरे वाले हैं। और बेअंत गुणों वाले हैं। कोई भी जीव नहीं जानता कि आपका विस्तार कितना बड़ा है। 1। रहाउ। (आप कितने बड़े हैं, ये बात जानने के लिए) समाधियां लगाने वाले कई बड़े-बड़े प्रसिद्ध जोगियों ध्यान जोड़ने के यत्न किए। बार-बार प्रयत्न किए; बड़े-बड़े प्रसिद्ध (शास्त्र-वेत्ताओं) विचारवानों ने आपस में एक दूसरे की सहायता लेकर आपके बराबर की कोई हस्ती तलाशने की कोशिश की। पर आपकी महानता का एक तिल जितना भी नहीं बता सके । 2। (विचारवान क्या और सिद्ध योगी क्या। आपकी महानता का अंदाजा तो कोई भी नहीं लगा सका; पर विचारवानों के) सारे भले काम। सारे तप। सारे अच्छे गुण। सिद्ध लोगों की (रिद्धियां-यिद्धियां आदि) बड़े-बड़े काम-किसी को भी ये कामयाबी आपकी सहायता के बिना हासिल नहीं हुई। (जिस किसी को सफलता हासिल हुई है) आपकी मेहर से प्राप्त हुई है। और कोई और (व्यक्ति) इस प्राप्ति के राह में रुकावट नहीं डाल सका। 3। जीव की क्या मजाल (स्मर्था) है कि इन गुणों को बयान कर सके। (हे प्रभू !) आपके गुणों के (मानो) खजाने भरे पड़े हैं। जिसे आप सिफत सालाह करने की दाति बख्शते हैं। उसके राह में रुकावट डालने के लिए किसी का जोर नहीं चल सकता। क्योंकि। हे नानक ! (कह, आप) सदा कायम रहने वाले प्रभु उस (भाग्यशाली) को सँवारने वाले खुद हैं। 4। 1।

आखा जीवा विसरै मरि जाउ ॥

आसा महला 1 ॥
आखा जीवा विसरै मरि जाउ ॥
आखणि अउखा साचा नाउ ॥
साचे नाम की लागै भूख ॥
तितु भूखै खाइ चलीअहि दूख ॥1॥
सो किउ विसरै मेरी माइ ॥
साचा साहिबु साचै नाइ ॥1॥ रहाउ ॥
साचे नाम की तिलु वडिआई ॥ आखि थके कीमति नही पाई ॥
जे सभि मिलि कै आखण पाहि ॥
वडा न होवै घाटि न जाइ ॥2॥
ना ओहु मरै न होवै सोगु ॥
देंदा रहै न चूकै भोगु ॥
गुणु एहो होरु नाही कोइ ॥
ना को होआ ना को होइ ॥3॥
जेवडु आपि तेवड तेरी दाति ॥
जिनि दिनु करि कै कीती राति ॥
खसमु विसारहि ते कमजाति ॥
नानक नावै बाझु सनाति ॥4॥2॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ ज्यों-ज्यों मैं प्रभू का नाम उचारता हूँ मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है। जब मुझे नाम भूल जाता है। मेरी आत्मिक मौत होने लग जाती है। (ये पता होते हुए भी प्रभू का) सदा स्थिर नाम सिमरना (एक) मुश्किल काम है। (जिस मनुष्य के अंदर) प्रभू के सदा स्थिर नाम के सिमरन की भूख पैदा होती है। इस भूख की बरकति से (नाम भोजन) खा के उसके सारे दुख दूर हो जाते हैं। 1। हे मेरी माँ ! (अरदास कर कि) वह प्रभू मुझे कभी ना भूले। ज्यों-ज्यों उस सदा स्थिर रहने वाले का नाम सिमरें। त्यों-त्यों वह सदा स्थिर रहने वाला मालिक (मन में बसता है)। 1। रहाउ। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के नाम की रत्ती जितनी भी महिमा (सारे जीव) बयान करके थक गए है (बयान नहीं कर सकते)। कोई भी बता नहीं सका कि उसके बराबर की कौन सी और हस्ती है। अगर (जगत के) सारे ही जीव मिल के (परमात्मा की महिमा) बयान करने का यत्न करें। तो वह परमात्मा (अपने असल से) बड़ा नहीं हो जाता (और अगर कोई उसकी महिमा का बखान ना करे) तो वह (पहले से) कम नहीं हो जाता। 2। वह परमात्मा कभी मरता नहीं। ना ही (उसकी खातिर) सोग होता है। वह प्रभू सदा (जीवों को रिज़क) देता है। उसकी दी हुई दातों का वितरण कभी खत्म नहीं होता (भाव। जीव उस की दी हुई दातें सदैव बरतते हैं पर वे खत्म नहीं होतीं)। उस प्रभू की बड़ी खूबी ये है कि कोई और उस जैसा नहीं। (उस जैसा अभी तक) ना कोई हुआ है ना ही कभी होगा। 3। (हे प्रभू !) जितना (बेअंत आप) खुद हैं। उतनी (बेअंत) आपकी बख्शिश है। (आप ऐसे हैं) जिसने दिन बनाया है और रात बनाई है। हे नानक ! वह लोग बुरी अस्लियत वाले (बन जाते) हैं जो पति-प्रभू को बिसारते हैं। नाम से वंचित हुए जीव नीच हैं। 4। 2।

जे दरि मांगतु कूक करे महली खसमु सुणे ॥

आसा महला 1 ॥
जे दरि मांगतु कूक करे महली खसमु सुणे ॥
भावै धीरक भावै धके एक वडाई देइ ॥1॥
जाणहु जोति न पूछहु जाती आगै जाति न हे ॥1॥ रहाउ ॥
आपि कराए आपि करेइ ॥
आपि उलाम॑े चिति धरेइ ॥
जा तूं करणहारु करतारु ॥
किआ मुहताजी किआ संसारु ॥2॥
आपि उपाए आपे देइ ॥
आपे दुरमति मनहि करेइ ॥
गुर परसादि वसै मनि आइ ॥
दुखु अन॑ेरा विचहु जाइ ॥3॥
साचु पिआरा आपि करेइ ॥
अवरी कउ साचु न देइ ॥
जे किसै देइ वखाणै नानकु आगै पूछ न लेइ ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ कोई मंगता (चाहे किसी भी जाति का हो) प्रभू के दर पे पुकार करे। तो वह महल का मालिक पति-प्रभू (उसकी पुकार) सुन लेता है। (फिर) उसकी मर्जी। हौसला दे। उसकी मर्जी धक्के दे (मंगते की अरदास सुन लेने में ही) प्रभू उसे इज्जत ही दे रहा है। 1। हे भाई ! सभी में एक प्रभू की ज्योति समझ के किसी की भी जाति ना पूछो (क्योंकि) आगे (परलोक में) किसी की जाति साथ नहीं जाती। 1। रहाउ। (हरेक जीव के अंदर व्यापक हो के) प्रभू खुद ही (प्रेरणा करके जीव से पुकार) करवाता है। (हरेक में व्यापक हो के) खुद ही (पुकार) करता है। खुद ही प्रभू (हरेक जीव के) गिले-शिकवे सुनता है। जब (हे प्रभू ! किसी जीव को आप ये निश्चय करा देते हैं कि) आप सृजनहार सब कुछ करने के समर्थ (सिर पर रक्षक) हैं। तो उसे (जगत की) कोई मुहताजी नहीं रहती। जगत उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। 2। परमात्मा खुद ही जीवों को पैदा करता है। खुद ही (सबको रिज़क आदि) देता है। प्रभू खुद ही जीवों को बुरी मति से बचाता है। गुरू की कृपा से प्रभू जिसके मन में आ बसता है। उसके अंदर से डर दूर हो जाता है। अज्ञानता मिट जाती है। 3। प्रभू खुद ही जीवों के मन में अपना सिमरन प्यारा बनाता है (सिमरन का प्यार पैदा करता है); जिनके अंदर प्यार की अभी कमी है। उन्हें खुद ही सिमरन की दाति नहीं देता। नानक कहता है जिस किसी को सिमरन की दाति प्रभू देता है उससे फिर कर्मों का लेखा नहीं मांगता (भाव। वह जीव कोई ऐसे कर्म करता ही नहीं जिससे उसकी कोई खिचाई हो)। 4। 3।

ताल मदीरे घट के घाट ॥

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आसा महला 1 ॥
ताल मदीरे घट के घाट ॥
दोलक दुनीआ वाजहि वाज ॥
नारदु नाचै कलि का भाउ ॥
जती सती कह राखहि पाउ ॥1॥
नानक नाम विटहु कुरबाणु ॥
अंधी दुनीआ साहिबु जाणु ॥1॥ रहाउ ॥
गुरू पासहु फिरि चेला खाइ ॥
तामि परीति वसै घरि आइ ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (मनुष्य के) मन के संकल्प-विकल्प (जैसे) छैणे और पैरों के घुंघरू हैं। दुनिया का मुंह ढोलकी है, ये बाजे बज रहे हैं। और (प्रभू के नाम से सूना) मन (माया के हाथों पे) नाच रहा है। (इसे कहते हैं) कलियुग का प्रभाव। जत-सत को संसार में कहीं जगह नहीं रही। 1। हे नानक ! परमात्मा के नाम से सदके हो। (नाम के बिना) दुनिया (माया में) अंधी हो रही है। ये मालिक प्रभू स्वयं ही आँखों वाला है (उसकी शरण पड़ने से ही जिंदगी का सही रास्ता दिख सकता हैं1। रहाउ। (चेले ने गुरू की सेवा करनी होती है। अब) बल्कि चेला ही गुरू से उदर-पूर्ति करवाता है। रोटी की खातिर ही चेला आ बनता है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३४९ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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