लुल्ला परिवारLulla Family
English
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 348 · आसा

इस पृष्ठ पर
अंग
348
आसा
अंग बदलें या अंश चुनें · 3 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. सो पातिसाहु साहा पति साहिबु नानक रहणु रजाई ॥1॥1॥
  2. सो पुरखु निरंजनु हरि पुरखु निरंजनु हरि अगमा अगम अपारा ॥
  3. सुणि वडा आखै सभ कोई ॥

सो पातिसाहु साहा पति साहिबु नानक रहणु रजाई ॥1॥1॥

अंग 347 से चला आ रहा अंश

सो पातिसाहु साहा पति साहिबु नानक रहणु रजाई ॥1॥1॥

हिन्दी अर्थ: अकाल पुरख बादशाह है। शाहों का शाह है। मालिक है। हे नानक ! (हमें) उसकी रजा में रहना (ही फबता है)।

सो पुरखु निरंजनु हरि पुरखु निरंजनु हरि अगमा अगम अपारा ॥

आसा महला 4 ॥
सो पुरखु निरंजनु हरि पुरखु निरंजनु हरि अगमा अगम अपारा ॥
सभि धिआवहि सभि धिआवहि तुधु जी हरि सचे सिरजणहारा ॥
सभि जीअ तुमारे जी तूं जीआ का दातारा ॥
हरि धिआवहु संतहु जी सभि दूख विसारणहारा ॥
हरि आपे ठाकुरु हरि आपे सेवकु जी किआ नानक जंत विचारा ॥1॥
तूं घट घट अंतरि सरब निरंतरि जी हरि एको पुरखु समाणा ॥
इकि दाते इकि भेखारी जी सभि तेरे चोज विडाणा ॥
तूं आपे दाता आपे भुगता जी हउ तुधु बिनु अवरु न जाणा ॥
तूं पारब्रहमु बेअंतु बेअंतु जी तेरे किआ गुण आखि वखाणा ॥
जो सेवहि जो सेवहि तुधु जी जनु नानकु तिन॑ कुरबाणा ॥2॥
हरि धिआवहि हरि धिआवहि तुधु जी से जन जुग महि सुख वासी ॥
से मुकतु से मुकतु भए जिन॑ हरि धिआइआ जीउ तिन टूटी जम की फासी ॥
जिन निरभउ जिन॑ हरि निरभउ धिआइआ जीउ तिन का भउ सभु गवासी ॥
जिन॑ सेविआ जिन॑ सेविआ मेरा हरि जीउ ते हरि हरि रूपि समासी ॥
से धंनु से धंनु जिन हरि धिआइआ जीउ जनु नानकु तिन बलि जासी ॥3॥
तेरी भगति तेरी भगति भंडार जी भरे बेअंत बेअंता ॥
तेरे भगत तेरे भगत सलाहनि तुधु जी हरि अनिक अनेक अनंता ॥
तेरी अनिक तेरी अनिक करहि हरि पूजा जी तपु तापहि जपहि बेअंता ॥
तेरे अनेक तेरे अनेक पड़हि बहु सिंम्रिति सासत जी करि किरिआ खटु करम करंता ॥
से भगत से भगत भले जन नानक जी जो भावहि मेरे हरि भगवंता ॥4॥
तूं आदि पुरखु अपरंपरु करता जी तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥
तूं जुगु जुगु एको सदा सदा तूं एको जी तूं निहचलु करता सोई ॥
तुधु आपे भावै सोई वरतै जी तूं आपे करहि सु होई ॥
तुधु आपे स्रिसटि सभ उपाई जी तुधु आपे सिरजि सभ गोई ॥
जनु नानकु गुण गावै करते के जी जो सभसै का जाणोई ॥5॥2॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 ॥ वह परमात्मा सब जीवों में व्यापक है। (फिर भी) माया के प्रभाव से ऊपर है। अपहुँच है और बेअंत है। हे सदा कायम रहने वाले और सब जीवों को पैदा करने वाले हरी ! सारे जीव-जंतु आपको सिमरते हैं। सारे जीव आपकेही पैदा किए हुए हैं। आप सब जीवों को रिज़क देने वाले हैं। हे संत जनों ! उस प्रभू को सिमरो। वह सारे दुखों का नाश करने वाला है। वह प्रभू (जीवों में व्यापक होने के कारण) खुद ही मालिक है और खुद ही सेवक है। हे नानक ! जीव बिचारे क्या हैं। (भाव। जीवों की उस प्रभू से कोई अलग हस्ती नहीं)। 1। हे हरी ! आप हरेक शरीर में व्यापक हैं। आप सब जीवों में एक रस मौजूद हैं। आप एक स्वयं ही सब जीवों में समाए हुए हैं। (फिर भी) कई जीव दानी हैं। कई जीव मंगते हैं,ये आपके ही आश्चर्यजनक तमाशे हैं (क्योंकि असल में) आप खुद ही दातें देने वाले हैं। और खुद ही (उन दातों को) बरतने वाले हैं। (सारी सृष्टि में) मैं आपके बिना किसी और को नहीं जानता (भाव। आपके बिना और कोई दूसरा नहीं दिखता)। मैं आपके कौन-कौन से गुण कह के बताऊँ। आप बेअंत पारब्रहम हैं। आप बेअंत पारब्रहम हैं। हे प्रभू ! जो आपको याद करते हैं जो आपको सिमरते हैं। दास नानक उनसे सदके जाता है। 2। हे हरी ! जो मनुष्य आपको सिमरते हैं। जो आपको ध्याते हैं। वो अपनी जिंदगी में सुखी बसते हैं। जिन मनुष्यों ने हरी का नाम सिमरा है। वे सदा के लिए माया के बंधनों से आजाद हो गए हैं। उनकी जमों वाली फाही कट गई है। जिन्होंने निरभउ प्रभू को ध्याया है प्रभू उनका सारा डर दूर कर देता है। जिन्होंने प्यारे प्रभू को सिमरा है। वे प्रभू के स्वरूप् में ही लीन हो गए हैं। भाग्यशाली हैं वे मनुष्य। धन्य हैं वे मनुष्य। जिन्होंने प्रभू को ध्याया है। दास नानक उनसे कुर्बान जाता है। 3। अर्थ। हे प्रभू ! आपकी भगती के बेअंत खजाने भरे पड़े हैं। हे हरी ! अनेकों और बेअंत आपके भगत आपकी सिफत सालाह करते हैं। हे प्रभू ! अनेकों जीव आपकी पूजा करते हैं। बेअंत जीव (आपके मिलाप के लिए) तपसाधना करते हैं। आपके अनेकों सेवक कई समृतियां व शास्त्र पढ़ते हैं। (और उनके बताए हुए) छे धार्मिक कर्म और अन्य कर्म करते हैं। हे दास नानक ! वो भगत भले हैं (अर्थात। उनकी मेहनत सफल हुई जानो) जो प्यारे हरि भगवंत को प्यारे लगते हैं। 4। अर्थ। हे प्रभू ! आप सबका मूल हैं। सब में व्यापक हैं। बेअंत हैं। सबको पैदा करने वाले हैं। आपके बराबर का कोई नहीं। आप हरेक युग में खुद ही हैं। आप सदा एक स्वयं ही हैं। आप सदा कायम रहने वाले हैं। सबका पैदा करने वाले हैं और सबकी सार लेने वाले हैं। जगत में वही कुछ होता है जो आपको खुद को पसंद है। वही होता है जो आप स्वयं ही करते हैं। (हे प्रभू !) सारी सृष्टि आपने खुद ही पैदा की है। आप खुद ही पैदा करके खुद ही नाश करते हैं। दास नानक उस करतार के गुण गाता है। जो हरेक के दिल की जानने वाला है। 5। 2।

सुणि वडा आखै सभ कोई ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु आसा महला 1 चउपदे घरु 2 ॥
सुणि वडा आखै सभ कोई ॥
केवडु वडा डीठा होई ॥

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु आसा महला 1 चउपदे घरु 2 ॥ हरेक जीव (औरों से सिर्फ) सुन के (कि) कह देता है कि (हे प्रभू !) आप बड़े हैं। पर आप कितने बड़े हैं ये बात आपको देख के ही बताई जा सकती है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 348 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।