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आसा
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जे सउ वर्हिआ जीवण खाणु ॥
जे सउ वर्हिआ जीवण खाणु ॥
खसम पछाणै सो दिनु परवाणु ॥2॥
दरसनि देखिऐ दइआ न होइ ॥
लए दिते विणु रहै न कोइ ॥
राजा निआउ करे हथि होइ ॥
कहै खुदाइ न मानै कोइ ॥3॥
माणस मूरति नानकु नामु ॥
करणी कुता दरि फुरमानु ॥
गुर परसादि जाणै मिहमानु ॥
ता किछु दरगह पावै मानु ॥4॥4॥
खसम पछाणै सो दिनु परवाणु ॥2॥
दरसनि देखिऐ दइआ न होइ ॥
लए दिते विणु रहै न कोइ ॥
राजा निआउ करे हथि होइ ॥
कहै खुदाइ न मानै कोइ ॥3॥
माणस मूरति नानकु नामु ॥
करणी कुता दरि फुरमानु ॥
गुर परसादि जाणै मिहमानु ॥
ता किछु दरगह पावै मानु ॥4॥4॥
हिन्दी अर्थ: (इस हालत में) अगर सौ साल मनुष्य जी ले। और आराम का खाना-पीना बना रहे (तो भी ये उम्र व्यर्थ ही समझो)। (जिंदगी का सिर्फ) वही दिन भाग्यशाली है जब मनुष्य अपने मालिक प्रभू से सांझ पाता है। 2। मनुष्य एक-दूसरे को देख के (अपना भाई जान के आपस में) प्यार की भावना नहीं ला रहे (क्योंकि संबंध ही माया का बन रहा है)। रिश्वत लिए-दिए बिना नहीं रहता। (यहां तक कि) राजा भी (हाकम भी) तभी इन्साफ़ करता है अगर उसे देने के लिए (सवाली के) हाथ-पल्ले माया हैं। अगर कोई निरा रॅब का वास्ता डाले तो उसकी पुकार कोई नहीं सुनता। 3। नानक (कहता है, देखने को ही) मनुष्य की शकल है। नाम-मात्र को ही मनुष्य है। पा आचरण में मनुष्य (वह) कुत्ता है जो (मालिक के) दर पर (रोटी की खातिर) हुकम (मान रहा है)। अगर गुरू की मेहर से (संसार में अपने आप को) मेहमान समझे (और माया से) इतनी पकड़ ना रखे। मनुष्य परमात्मा की हजूरी में तभी कुछ आदर-सत्कार ले सकता है 4। 4।
जेता सबदु सुरति धुनि तेती जेता रूपु काइआ तेरी ॥
आसा महला 1 ॥
जेता सबदु सुरति धुनि तेती जेता रूपु काइआ तेरी ॥
तूं आपे रसना आपे बसना अवरु न दूजा कहउ माई ॥1॥
साहिबु मेरा एको है ॥
एको है भाई एको है ॥1॥ रहाउ ॥
आपे मारे आपे छोडै आपे लेवै देइ ॥
आपे वेखै आपे विगसै आपे नदरि करेइ ॥2॥
जो किछु करणा सो करि रहिआ अवरु न करणा जाई ॥
जैसा वरतै तैसो कहीऐ सभ तेरी वडिआई ॥3॥
कलि कलवाली माइआ मदु मीठा मनु मतवाला पीवतु रहै ॥
आपे रूप करे बहु भांतीं नानकु बपुड़ा एव कहै ॥4॥5॥
जेता सबदु सुरति धुनि तेती जेता रूपु काइआ तेरी ॥
तूं आपे रसना आपे बसना अवरु न दूजा कहउ माई ॥1॥
साहिबु मेरा एको है ॥
एको है भाई एको है ॥1॥ रहाउ ॥
आपे मारे आपे छोडै आपे लेवै देइ ॥
आपे वेखै आपे विगसै आपे नदरि करेइ ॥2॥
जो किछु करणा सो करि रहिआ अवरु न करणा जाई ॥
जैसा वरतै तैसो कहीऐ सभ तेरी वडिआई ॥3॥
कलि कलवाली माइआ मदु मीठा मनु मतवाला पीवतु रहै ॥
आपे रूप करे बहु भांतीं नानकु बपुड़ा एव कहै ॥4॥5॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (हे प्रभू !) (जगत में) ये जितना बोलना और सुनना है (जितनी ये बोलने और सुनने की क्रिया है)। ये सारी आपकी जीवन-लौअ (के सदके) है। ये जितना दिखाई देता आकार है। ये सारा आपका ही शरीर है (आपके स्वै का विस्तार है)। (सारे जीवों में व्यापक हो के) आप खुद ही रस लेने वाले हैं। आप खुद ही (जीवों की) जिंदगी हैं। हे माँ ! परमात्मा के बिना और कोई दूसरी हस्ती नहीं है जिसके प्रथाय मैं कह सकूँ (कि ये हस्ती परमात्मा के बराबर की है)। 1। जितनी भी यह दुनिया दिखाई देती है, यह सब आपकी ही काया है। हे भाई ! परमात्मा ही हमारा एकमेव पति-मालिक है। बस ! वही एक मालिक है। उस जैसा। और कोई नहीं। 1। रहाउ। हे भाई ! मेरा मालिक केवल एक ही है और एक वही मेरा स्वामी है॥1॥ रहाउ ॥ प्रभू खुद ही (सब जीवों को) मारता है खुद ही बचाता है। खुद ही (जिंद) ले लेता है खुद ही (जिंद) देता है। प्रभू स्वयं ही (सबकी) संभाल करता है। स्वयं ही (संभाल करके) खुश होता है। स्वयं ही (सब पर) मेहर की नजर करता है। 2। (जगत में) जो कुछ घटित हो रहा है (प्रभू से आक़ी हो के किसी और जीव द्वारा) कुछ नहीं किया जा सकता। जैसी कार्रवाही प्रभू करता है। वैसा ही उसका नाम पड़ जाता है। (हे प्रभू !) ये जो कुछ दिखाई दे रहा है आपकी ही बुजुर्गीयत (का प्रकाश) है। 3। जैसे एक शराब बेचने वाली है उसके पास शराब है; शराबी आ के रोज पीता रहता है वैसे ही जगत में कलियुगी स्वभाव है (उसके असर तले) माया मीठी लग रही है। और जीवों का मन (माया में) मस्त हो रहा है, ऐ भांति-भांति के रूप भी प्रभू खुद ही बना रहा है (चाहे ये बात अलौकिक ही प्रतीत होती है; पर उस प्रभू को हर अच्छे-बुरे में व्यापक देख के) बिचारा नानक यही कह सकता है। 4। 5।
वाजा मति पखावजु भाउ ॥
आसा महला 1 ॥
वाजा मति पखावजु भाउ ॥
होइ अनंदु सदा मनि चाउ ॥
एहा भगति एहो तप ताउ ॥
इतु रंगि नाचहु रखि रखि पाउ ॥1॥
पूरे ताल जाणै सालाह ॥
होरु नचणा खुसीआ मन माह ॥1॥ रहाउ ॥
सतु संतोखु वजहि दुइ ताल ॥
पैरी वाजा सदा निहाल ॥
रागु नादु नही दूजा भाउ ॥
इतु रंगि नाचहु रखि रखि पाउ ॥2॥
भउ फेरी होवै मन चीति ॥
बहदिआ उठदिआ नीता नीति ॥
लेटणि लेटि जाणै तनु सुआहु ॥
इतु रंगि नाचहु रखि रखि पाउ ॥3॥
सिख सभा दीखिआ का भाउ ॥
गुरमुखि सुणणा साचा नाउ ॥
नानक आखणु वेरा वेर ॥
इतु रंगि नाचहु रखि रखि पैर ॥4॥6॥
वाजा मति पखावजु भाउ ॥
होइ अनंदु सदा मनि चाउ ॥
एहा भगति एहो तप ताउ ॥
इतु रंगि नाचहु रखि रखि पाउ ॥1॥
पूरे ताल जाणै सालाह ॥
होरु नचणा खुसीआ मन माह ॥1॥ रहाउ ॥
सतु संतोखु वजहि दुइ ताल ॥
पैरी वाजा सदा निहाल ॥
रागु नादु नही दूजा भाउ ॥
इतु रंगि नाचहु रखि रखि पाउ ॥2॥
भउ फेरी होवै मन चीति ॥
बहदिआ उठदिआ नीता नीति ॥
लेटणि लेटि जाणै तनु सुआहु ॥
इतु रंगि नाचहु रखि रखि पाउ ॥3॥
सिख सभा दीखिआ का भाउ ॥
गुरमुखि सुणणा साचा नाउ ॥
नानक आखणु वेरा वेर ॥
इतु रंगि नाचहु रखि रखि पैर ॥4॥6॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ जिस मनुष्य ने श्रेष्ठ बुद्धि को बाजा बनाया है। प्रभू के प्यार को तबला बनाया है (इन साजों के बजने से। श्रेष्ठ बुद्धि और प्रभू-प्रेम की बरकति से) उसके अंदर सदा आनंद बना रहता है। उसके मन में उत्साह रहता है। असल भक्ति यही है। और यही है महान तप। इस आत्मिक आनंद में टिके रहके सदैव जीवन राह पर चलें। बस ! यही नृत्य करें (रासों में नाच-नाच के उसको कृष्ण लीला समझना भुलेखा है)। 1। जो मनुष्य परमात्मा की सिफत सालाह करनी जानता है वह (जीवन-नृत्य में) ताल में नाचता है (जीवन की सही राहों पर चलता है)। (रास आदि में कृष्ण मूर्ति के आगे ये) नाच और ही हैं निरी मन का परचावा मात्र हैं। मन के चाव हैं (ये भगती नहीं। ये तो मन के नचाए नाचना है)। 1। रहाउ। (ख़लकत की) सेवा, संतोख (वाला जीवन) - ये दोनों छेणैं बजें। सदा प्रसन्न मुद्रा में रहना- ये पैरों में घुंघरू (बजें); (प्रभू-प्रेम के बिना) कोई और लगन ना हो - ये (हर समय अंदर) राग व अलाप (होता रहे)। (हे भाई !) इस आत्मिक आनंद में टिकें। इस जीवन-राह पर चलें। बस ! ये नाच नाचें (भाव। इस तरह जीवन के आत्मिक हिलोरों का आनंद लें)। 2। प्रभू का डर-अदब मन-चित्त में टिका रहे- उठते-बैठते सदा हर समय नृत्य का ये चक्कर हो; अपने शरीर को मनुष्य नाशवंत समझे- ये लेट के नृत्यकारी हो। (हे भाई !) इस आनंद में टिके रहें; ये जीवन जिएँ। बस ! ये नाच नाचें (ये आत्मिक हिलोरे लें)। 3। सत्संग में रहके गुरू के उपदेश का प्यार (अपने अंदर पैदा करना); गुरू के सन्मुख रहके परमात्मा का अटल नाम सुनते रहना; परमात्मा का नाम बरंबार जपना- इस रंग में। हे नानक ! टिकें। इस जीवन-राह पर पैर धरें। बस ! ये नाच नाचें (ये जीवन आनंद लें)। 4। 6।
पउणु उपाइ धरी सभ धरती जल अगनी का बंधु कीआ ॥
आसा महला 1 ॥
पउणु उपाइ धरी सभ धरती जल अगनी का बंधु कीआ ॥
अंधुलै दहसिरि मूंडु कटाइआ रावणु मारि किआ वडा भइआ ॥1॥
किआ उपमा तेरी आखी जाइ ॥
तूं सरबे पूरि रहिआ लिव लाइ ॥1॥ रहाउ ॥
जीअ उपाइ जुगति हथि कीनी काली नथि किआ वडा भइआ ॥
किसु तूं पुरखु जोरू कउण कहीऐ सरब निरंतरि रवि रहिआ ॥2॥
नालि कुटंबु साथि वरदाता ब्रहमा भालण स्रिसटि गइआ ॥
आगै अंतु न पाइओ ता का कंसु छेदि किआ वडा भइआ ॥3॥
रतन उपाइ धरे खीरु मथिआ होरि भखलाए जि असी कीआ ॥
पउणु उपाइ धरी सभ धरती जल अगनी का बंधु कीआ ॥
अंधुलै दहसिरि मूंडु कटाइआ रावणु मारि किआ वडा भइआ ॥1॥
किआ उपमा तेरी आखी जाइ ॥
तूं सरबे पूरि रहिआ लिव लाइ ॥1॥ रहाउ ॥
जीअ उपाइ जुगति हथि कीनी काली नथि किआ वडा भइआ ॥
किसु तूं पुरखु जोरू कउण कहीऐ सरब निरंतरि रवि रहिआ ॥2॥
नालि कुटंबु साथि वरदाता ब्रहमा भालण स्रिसटि गइआ ॥
आगै अंतु न पाइओ ता का कंसु छेदि किआ वडा भइआ ॥3॥
रतन उपाइ धरे खीरु मथिआ होरि भखलाए जि असी कीआ ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ परमात्मा ने हवा बनाई। सारी धरती की रचना की। आग व पानी का मेल किया (भाव। ये सारे विरोधी तत्व इकट्ठे करके जगत रचना की। रचनहार प्रभू की ये एक आश्चर्य भरी लीला है। जिससे दिखता है किवह बेअंत बड़ी ताकतों वाला है। पर उसकी ये महिमा भूल के निरा रावण को मारने में ही उसकी महानता समझनी भूल है)। अकल के अंधे रावण ने अपनी मौत को (मूर्खता में) दावत दी। परमात्मा (निरा उस मूर्ख) रावण को ही मार के बड़ा नहीं हो गया। 1। (हे प्रभू !) आपकी महिमा बयान नहीं की जा सकती। आप सब जीवों में व्यापक हैं। मौजूद है। 1। रहाउ। (हे अकाल-पुरख !) सृष्टि के सारे जीव पैदा करके सब की जीवन जुगति आपने अपने हाथ में रखी हुई है। (सबको नाथा हुआ है) सिर्फ काली-नाग को नाथ के आप बड़े नहीं हो गए। ना आप किसी खास स्त्री (स्त्री विशेष) के पति हैं। ना कोई स्त्री आपकी पत्नी है। आप सब जीवों के अंदर एक-रस मौजूद हैं। 2। (कहते हैं कि जो) ब्रहमा कमल की नाल में से पैदा हुआ था। विष्णु उसका हिमायती था। वह ब्रहमा परमात्मा का अंत तलाशने के लिए गया। (उस नालि में ही भटकता रहा) पर अंत ना मिल सका। (अकाल-पुरख बेअंत कुदरत का मालिक है) सिर्फ कंस को मार के वह कितना बड़ा बन गया। (ये तो उसके आगे एक साधारण सी बात है)। 3। (कहते हैं कि देवताओं और दैत्यों ने मिल के) समुंद्र-मंथन किया और (उसमें से) चौदह रत्न निकाले। (बाँटने के समय दोनों धड़े) गुस्से में आ-आ के कहने लगे कि ये रत्न हमने निकाले हैं। हमने निकाले हैं (अपनी ओर से परमात्मा की महिमा बयान करने के लिए कहते हैं कि परमात्मा ने मोहनी अवतार धार के वह रत्न) एक-एक करके बाँट दिए।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 350 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।