अंग
327
गउड़ी
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तन महि होती कोटि उपाधि ॥
तन महि होती कोटि उपाधि ॥
उलटि भई सुख सहजि समाधि ॥
आपु पछानै आपै आप ॥
रोगु न बिआपै तीनौ ताप ॥2॥
अब मनु उलटि सनातनु हूआ ॥
तब जानिआ जब जीवत मूआ ॥
कहु कबीर सुखि सहजि समावउ ॥
आपि न डरउ न अवर डरावउ ॥3॥17॥
उलटि भई सुख सहजि समाधि ॥
आपु पछानै आपै आप ॥
रोगु न बिआपै तीनौ ताप ॥2॥
अब मनु उलटि सनातनु हूआ ॥
तब जानिआ जब जीवत मूआ ॥
कहु कबीर सुखि सहजि समावउ ॥
आपि न डरउ न अवर डरावउ ॥3॥17॥
हिन्दी अर्थ: (मेरे शरीर में विकारों के) करोड़ों बखेड़े थे; प्रभू के नाम-रस में जुड़े रहने के कारण वे सारे पलट के सुख बन गए हैं। (मेरे मन ने) अपने असल स्वरूप को पहचान लिया है (अब इसे) प्रभू ही प्रभू दिखाई दे रहा है। रोग और तीनों ताप (अब) छू नहीं सकते। 2। अब मेरा मन (अपने पहले विकारों वाले स्वभाव से) हट के प्रभू का रूप हो गया है; (इस बात की) तब समझ आई है जब (यह मन) माया में विचरता हुआ भी माया के मोह से ऊँचा हो गया है। हे कबीर ! (अब बेशक) कह, मैं आत्मिक आनंद में अडोल अवस्था में जुड़ा हुआ हूँ; ना मैं खुद किसी और से डरता हूँ और ना ही औरों को डराता हूँ। 3। 17।
गउड़ी कबीर जी ॥
गउड़ी कबीर जी ॥
पिंडि मूऐ जीउ किह घरि जाता ॥
सबदि अतीति अनाहदि राता ॥
जिनि रामु जानिआ तिनहि पछानिआ ॥
जिउ गूंगे साकर मनु मानिआ ॥1॥
ऐसा गिआनु कथै बनवारी ॥
मन रे पवन द्रिड़ सुखमन नारी ॥1॥ रहाउ ॥
सो गुरु करहु जि बहुरि न करना ॥
सो पदु रवहु जि बहुरि न रवना ॥
सो धिआनु धरहु जि बहुरि न धरना ॥
ऐसे मरहु जि बहुरि न मरना ॥2॥
उलटी गंगा जमुन मिलावउ ॥
बिनु जल संगम मन महि न॑ावउ ॥
लोचा समसरि इहु बिउहारा ॥
ततु बीचारि किआ अवरि बीचारा ॥3॥
अपु तेजु बाइ प्रिथमी आकासा ॥
ऐसी रहत रहउ हरि पासा ॥
कहै कबीर निरंजन धिआवउ ॥
तितु घरि जाउ जि बहुरि न आवउ ॥4॥18॥
पिंडि मूऐ जीउ किह घरि जाता ॥
सबदि अतीति अनाहदि राता ॥
जिनि रामु जानिआ तिनहि पछानिआ ॥
जिउ गूंगे साकर मनु मानिआ ॥1॥
ऐसा गिआनु कथै बनवारी ॥
मन रे पवन द्रिड़ सुखमन नारी ॥1॥ रहाउ ॥
सो गुरु करहु जि बहुरि न करना ॥
सो पदु रवहु जि बहुरि न रवना ॥
सो धिआनु धरहु जि बहुरि न धरना ॥
ऐसे मरहु जि बहुरि न मरना ॥2॥
उलटी गंगा जमुन मिलावउ ॥
बिनु जल संगम मन महि न॑ावउ ॥
लोचा समसरि इहु बिउहारा ॥
ततु बीचारि किआ अवरि बीचारा ॥3॥
अपु तेजु बाइ प्रिथमी आकासा ॥
ऐसी रहत रहउ हरि पासा ॥
कहै कबीर निरंजन धिआवउ ॥
तितु घरि जाउ जि बहुरि न आवउ ॥4॥18॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ (प्रश्न:) शरीर का मोह दूर होने से आत्मा कहाँ टिकती है? (भाव। पहले तो जीव अपने शरीर के मोह के कारण माया में मस्त रहता है। जब ये मोह दूर हो जाए, तब जीव की सुरति कहाँ जुड़ी रहती है?) (उक्तर:) (तब आत्मा) सतिगुरू के शबद की बरकति से उस प्रभू में जुड़ा रहता है जो माया के बंधनों से परे है और बेअंत है। (पर) जिस मनुष्य ने प्रभू को (अपने अंदर) जाना है उसने ही उसको पहचाना है। जैसे गूँगे का मन शक्कर में पतीजता है (कोई और उस स्वाद को नहीं समझता। किसी और को वह समझा भी नहीं सकता)। 1। ऐसा ज्ञान प्रभू खुद ही प्रगट करता है (भाव। प्रभू से मिलाप वाला ये स्वाद प्रभू खुद ही बख्शता है। इसलिए) हे मन ! स्वास-स्वास नाम जप। यही है सुखमना नाड़ी का अभ्यास। 1। रहाउ। ऐसा गुरू धारण करो कि दूसरी बार गुरू धारण करने की जरूरत ना रहे; (भाव। पूरे गुरू की चरणी लगो); उस ठिकाने का आनंद लो कि किसी और स्वाद को भोगने की चाह ही ना रहे; ऐसी बिरती जोड़ो कि फिर (और कहीं) जोड़ने की जरूरत ही ना रहे; इस तरह मरो (भाव। स्वै भाव दूर करो कि) फिर (जनम) मरण में पड़ना ही ना पड़े। 2। मैंने अपने मन की बिरती को पलट दिया है (इस तरह) मैं गंगा और जमुना को मिला रहा हूँ (भाव। अपने अंदर तृवेणी का संगम बना रहा हूँ); (इस उद्यम से) मैं उस मन-स्वरूप (तृवेणी) संगम में स्नान कर रहा हूँ जहाँ (गंगा-जमुना-सरस्वती वाला) जल नहीं है; (अब मैं) इन आँखों से (सब को) एक सा देख रहा हूँ- ये मेरा व्यवहार है। एक प्रभू को सिमर के मुझे अब और विचारों की जरूरत नहीं रही। 3। जैसे पानी, आग, हवा, धरती और आकाश (भाव। इन तत्वों के शीतलता आदि सब गुणों की तरह मैंने भी सब गुण धारण किए हैं)। प्रभू के चरणों में जुड़ के मैं इस तरह का रहन-सहन (रहणी) रह रहा हूँ। कबीर कहता है, मैं माया से रहित प्रभू को सिमर रहा हूँ। (सिमरन करके) उस घर (सहज अवस्था) में पहुँच गया हूँ कि फिर (पलट के वहाँ) आना नहीं पड़ेगा। 4। 18।
गउड़ी कबीर जी तिपदे ॥
गउड़ी कबीर जी तिपदे ॥
कंचन सिउ पाईऐ नही तोलि ॥
मनु दे रामु लीआ है मोलि ॥1॥
अब मोहि रामु अपुना करि जानिआ ॥
सहज सुभाइ मेरा मनु मानिआ ॥1॥ रहाउ ॥
ब्रहमै कथि कथि अंतु न पाइआ ॥
राम भगति बैठे घरि आइआ ॥2॥
कहु कबीर चंचल मति तिआगी ॥
केवल राम भगति निज भागी ॥3॥1॥19॥
कंचन सिउ पाईऐ नही तोलि ॥
मनु दे रामु लीआ है मोलि ॥1॥
अब मोहि रामु अपुना करि जानिआ ॥
सहज सुभाइ मेरा मनु मानिआ ॥1॥ रहाउ ॥
ब्रहमै कथि कथि अंतु न पाइआ ॥
राम भगति बैठे घरि आइआ ॥2॥
कहु कबीर चंचल मति तिआगी ॥
केवल राम भगति निज भागी ॥3॥1॥19॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी तिपदे ॥ शुद्ध सोना तोल के बदले में ईश्वर नहीं मिलता। मैंने तो बतौर मूल्य अपना मन दे के ईश्वर को पाया है। 1। अब तो मुझे यकीन हो गया है कि ईश्वर मेरा अपना ही है। सहज ही मेरे मन में ये बात गाँठ की तरह बंध गई है। 1। रहाउ। जिस ईश्वर के गुण बता-बता के ब्रहमा ने (भी) अंत ना पाया। वह ईश्वर मेरे भजन के कारण सहज स्वभाव ही मुझे मेरे हृदय में आ के मिल गया है। 2। हे कबीर ! (अब) कह, मैंने चंचल स्वभाव छोड़ दिया है। (अब तो) निरी ईश्वर की भगती ही मेरे हिस्से आई हुई है। ३।१।१९।
गउड़ी कबीर जी ॥
गउड़ी कबीर जी ॥
जिह मरनै सभु जगतु तरासिआ ॥
सो मरना गुर सबदि प्रगासिआ ॥1॥
अब कैसे मरउ मरनि मनु मानिआ ॥
मरि मरि जाते जिन रामु न जानिआ ॥1॥ रहाउ ॥
मरनो मरनु कहै सभु कोई ॥
सहजे मरै अमरु होइ सोई ॥2॥
कहु कबीर मनि भइआ अनंदा ॥
गइआ भरमु रहिआ परमानंदा ॥3॥20॥
जिह मरनै सभु जगतु तरासिआ ॥
सो मरना गुर सबदि प्रगासिआ ॥1॥
अब कैसे मरउ मरनि मनु मानिआ ॥
मरि मरि जाते जिन रामु न जानिआ ॥1॥ रहाउ ॥
मरनो मरनु कहै सभु कोई ॥
सहजे मरै अमरु होइ सोई ॥2॥
कहु कबीर मनि भइआ अनंदा ॥
गइआ भरमु रहिआ परमानंदा ॥3॥20॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ जिस मौत ने सारा संसार डराया हुआ है। गुरू के शबद की बरकति से मुझे समझ आ गई है कि वह मौत असल में क्या चीज है। 1। अब मैं जनम-मरण के चक्कर में क्यूँ पड़ूंगा? (भाव। नहीं पड़ूंगा) (क्योंकि) मेरा मन स्वै भाव की मौत में पतीज गया है। (केवल) वह मनुष्य सदा पैदा होते मरते रहते हैं जिन्होंने प्रभू को नहीं पहचाना (प्रभू से सांझ नहीं डाली)। 1। रहाउ। (दुनिया में) हरेक जीव ‘मौत मौत’ कह रहा है (भाव। हरेक जीव मौत से घबरा रहा है)। (पर जो मनुष्य) अडोलता में (रह के) दुनियां की ख्वाहिशों से बेपरवाह हो जाता है वह अमर हो जाता है (उसे मौत डरा नहीं सकती)। 2। हे कबीर ! कह, (गुरू की कृपा से मेरे) मन में आनंद पैदा हो गया है। मेरा भुलेखा दूर हो चुका है। और परम सुख (मेरे हृदय में) टिक गया है। 3। 20।
गउड़ी कबीर जी ॥
गउड़ी कबीर जी ॥
कत नही ठउर मूलु कत लावउ ॥
खोजत तन महि ठउर न पावउ ॥1॥
लागी होइ सु जानै पीर ॥
राम भगति अनीआले तीर ॥1॥ रहाउ ॥
एक भाइ देखउ सभ नारी ॥
किआ जानउ सह कउन पिआरी ॥2॥
कहु कबीर जा कै मसतकि भागु ॥
सभ परहरि ता कउ मिलै सुहागु ॥3॥21॥
कत नही ठउर मूलु कत लावउ ॥
खोजत तन महि ठउर न पावउ ॥1॥
लागी होइ सु जानै पीर ॥
राम भगति अनीआले तीर ॥1॥ रहाउ ॥
एक भाइ देखउ सभ नारी ॥
किआ जानउ सह कउन पिआरी ॥2॥
कहु कबीर जा कै मसतकि भागु ॥
सभ परहरि ता कउ मिलै सुहागु ॥3॥21॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ (शरीर में) कहीं (ऐसी) जगह नहीं। (तो फिर) मैं दवा कहाँ इस्तेमाल करूँ? (भाव। कोई बाहरी दवा प्रभू से विछोड़े का दुख दूर करने के स्मर्थ नहीं है)। तलाश करते हुए भी शरीर में कहीं (ऐसी खास) जगह मुझे नहीं मिली (जहाँ विरह की पीड़ा बताई जा सके); 1। जिसे (इन तीरों के लगे हुए के जख्म की) दर्द हो रही हो वही जानता है (कि ये पीड़ा कैसी होती है)। प्रभू की भगती तीखे तीर हैं। 1। रहाउ। मैं सभी जीव-सि्त्रयों को एक प्रभू के प्यार में देख रहा हूँ (पर) मैं क्या जानूं कि कौन सी (जीव स्त्री) प्रभू पति की प्यारी है। 2। हे कबीर ! कह,जिस (जिज्ञासु) जीव-सत्री के माथे पे बढ़िया लेख हैं (जिसके भाग्य अच्छे हैं)। पति प्रभू और सभी को छोड़ के उसे आ मिलता है (भाव। औरों से ज्यादा उससे प्यार करता है और उसका बिरह का दुख दूर हो जाता है)। 3। 21।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३२७ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।