जा कै हरि सा ठाकुरु भाई ॥
मुकति अनंत पुकारणि जाई ॥1॥
अब कहु राम भरोसा तोरा ॥
तब काहू का कवनु निहोरा ॥1॥ रहाउ ॥
तीनि लोक जा कै हहि भार ॥
सो काहे न करै प्रतिपार ॥2॥
कहु कबीर इक बुधि बीचारी ॥
किआ बसु जउ बिखु दे महतारी ॥3॥22॥
बिनु सत सती होइ कैसे नारि ॥
पंडित देखहु रिदै बीचारि ॥1॥
प्रीति बिना कैसे बधै सनेहु ॥
जब लगु रसु तब लगु नही नेहु ॥1॥ रहाउ ॥
साहनि सतु करै जीअ अपनै ॥
सो रमये कउ मिलै न सुपनै ॥2॥
तनु मनु धनु ग्रिहु सउपि सरीरु ॥
सोई सुहागनि कहै कबीरु ॥3॥23॥
बिखिआ बिआपिआ सगल संसारु ॥
बिखिआ लै डूबी परवारु ॥1॥
रे नर नाव चउड़ि कत बोड़ी ॥
हरि सिउ तोड़ि बिखिआ संगि जोड़ी ॥1॥ रहाउ ॥
सुरि नर दाधे लागी आगि ॥
निकटि नीरु पसु पीवसि न झागि ॥2॥
चेतत चेतत निकसिओ नीरु ॥
सो जलु निरमलु कथत कबीरु ॥3॥24॥
जिह कुलि पूतु न गिआन बीचारी ॥
बिधवा कस न भई महतारी ॥1॥
जिह नर राम भगति नहि साधी ॥
जनमत कस न मुओ अपराधी ॥1॥ रहाउ ॥
मुचु मुचु गरभ गए कीन बचिआ ॥
बुडभुज रूप जीवे जग मझिआ ॥2॥
कहु कबीर जैसे सुंदर सरूप ॥ नाम बिना जैसे कुबज कुरूप ॥3॥25॥
जो जन लेहि खसम का नाउ ॥ तिन कै सद बलिहारै जाउ ॥1॥
सो निरमलु निरमल हरि गुन गावै ॥
सो भाई मेरै मनि भावै ॥1॥ रहाउ ॥
जिह घट रामु रहिआ भरपूरि ॥ तिन की पग पंकज हम धूरि ॥2॥
जाति जुलाहा मति का धीरु ॥
सहजि सहजि गुण रमै कबीरु ॥3॥26॥
गगनि रसाल चुऐ मेरी भाठी ॥
संचि महा रसु तनु भइआ काठी ॥1॥
उआ कउ कहीऐ सहज मतवारा ॥
पीवत राम रसु गिआन बीचारा ॥1॥ रहाउ ॥
सहज कलालनि जउ मिलि आई ॥
आनंदि माते अनदिनु जाई ॥2॥
चीनत चीतु निरंजन लाइआ ॥
कहु कबीर तौ अनभउ पाइआ ॥3॥27॥
मन का सुभाउ मनहि बिआपी ॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गउड़ी कबीर जी ॥ हे सज्जन ! जिस मनुष्य के हृदय रूपी घर में प्रभू मालिक खुद मौजूद है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।