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अंग 328

अंग
328
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गउड़ी कबीर जी ॥
जा कै हरि सा ठाकुरु भाई ॥
मुकति अनंत पुकारणि जाई ॥1॥
अब कहु राम भरोसा तोरा ॥
तब काहू का कवनु निहोरा ॥1॥ रहाउ ॥
तीनि लोक जा कै हहि भार ॥
सो काहे न करै प्रतिपार ॥2॥
कहु कबीर इक बुधि बीचारी ॥
किआ बसु जउ बिखु दे महतारी ॥3॥22॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ हे सज्जन ! जिस मनुष्य के हृदय रूपी घर में प्रभू मालिक खुद मौजूद है। मुक्ति उसके आगे अपना आप अनेकों बार भेटा करती है। 1। (हे कबीर ! प्रभू की हजूरी में) अब कह, हे प्रभू ! जिस मनुष्य को एक आपका आसरा है उसे अब किसी की खुशामद (करने की जरूरत) नहीं। 1। रहाउ। जिस प्रभू के आसरे तीनों लोक हैं। वह (आपकी) पालना क्यूँ ना करेगा?। 2। हे कबीर ! कह, हमने एक सोच सोची है (वह ये है कि) अगर माँ ही जहर देने लगे तो (पुत्र का) कोई जोर नहीं चल सकता। 3। 22।
गउड़ी कबीर जी ॥
बिनु सत सती होइ कैसे नारि ॥
पंडित देखहु रिदै बीचारि ॥1॥
प्रीति बिना कैसे बधै सनेहु ॥
जब लगु रसु तब लगु नही नेहु ॥1॥ रहाउ ॥
साहनि सतु करै जीअ अपनै ॥
सो रमये कउ मिलै न सुपनै ॥2॥
तनु मनु धनु ग्रिहु सउपि सरीरु ॥
सोई सुहागनि कहै कबीरु ॥3॥23॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ भला सॅत-धर्म के बिना कोई स्त्री सती कैसे बन सकती है?। हे पंडित ! मन में विचार के देख।1। (इसी तरह हृदय में) प्रीति के बिना (प्रभू पति से) प्यार कैसे बन सकता है? जब तक (मन में) माया का चस्का है। तब तक (पति परमात्मा से) प्यार नहीं हो सकता। 1। रहाउ। जो मनुष्य माया को ही अपने दिल में सॅत समझता है वह प्रभू को सपने में भी (भाव। कभी भी) नहीं मिल सकता। 2। जो अपना तन-मन-धन-घर और शरीर (अपने पति के) हवाले कर देती है। कबीर कहता है, वह (जीव-) स्त्री भाग्यशाली है 3। 23।
गउड़ी कबीर जी ॥
बिखिआ बिआपिआ सगल संसारु ॥
बिखिआ लै डूबी परवारु ॥1॥
रे नर नाव चउड़ि कत बोड़ी ॥
हरि सिउ तोड़ि बिखिआ संगि जोड़ी ॥1॥ रहाउ ॥
सुरि नर दाधे लागी आगि ॥
निकटि नीरु पसु पीवसि न झागि ॥2॥
चेतत चेतत निकसिओ नीरु ॥
सो जलु निरमलु कथत कबीरु ॥3॥24॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ सारा जहान ही माया के (प्रभाव तले) दबा हुआ है; माया सारे ही कुटंब को (सारे ही जीवों को) डुबोए बैठी है। 1। हे मनुष्य ! तूने (अपनी जिंदगी की) बेड़ी क्यूँ खुली जगह पर डुबो ली है? तूने प्रभू से प्रीति तोड़ के माया के साथ गाँठी हुई है। 1। रहाउ। (सारे जगत में माया की तृष्णा की) आग लगी हुई है (जिस में) देवते और मनुष्य जल रहे हैं। (इस आग को शांत करने के लिए नाम-रूपी) पानी भी नजदीक ही है पर (यह) पशु (जीव) कोशिश करके पीता नहीं। 2। कबीर कहता है, (वह नाम-रूपी) पानी सिमरन करते करते ही (मनुष्य के दिल में) प्रगट होता है। और वह (अमृत) जल पवित्र होता है। (तृष्णा की आग उसी जल से बुझ सकती है)। 3। 24।
गउड़ी कबीर जी ॥
जिह कुलि पूतु न गिआन बीचारी ॥
बिधवा कस न भई महतारी ॥1॥
जिह नर राम भगति नहि साधी ॥
जनमत कस न मुओ अपराधी ॥1॥ रहाउ ॥
मुचु मुचु गरभ गए कीन बचिआ ॥
बुडभुज रूप जीवे जग मझिआ ॥2॥
कहु कबीर जैसे सुंदर सरूप ॥ नाम बिना जैसे कुबज कुरूप ॥3॥25॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ जिस कुल में ज्ञान की विचार करने वाला (कोई) पुत्र नहीं (पैदा हुआ) वह माँ बाँझ क्यों ना हो गई?।1। जिस मनुष्य ने प्रभू की बँदगी नहीं की। वह अपराधी पैदा होते ही मर क्यों नहीं गया ?। 1। रहाउ। (संसार में) कई गर्भ छन गए हैं। ये (बंदगी-हीन चंदरा) क्यूँ बच रहा? (बंदगी से वंचित यह) जगत में एक कोढ़ी जी रहा है। 2। वे (चाहे देखने में) सुंदर रूप वाले हैं (पर असल में) हे कबीर ! (बेशक) कह, जो मनुष्य नाम से वंचित हैं वह कुब्बे और बद्शकल हैं। 3। 24।
गउड़ी कबीर जी ॥
जो जन लेहि खसम का नाउ ॥ तिन कै सद बलिहारै जाउ ॥1॥
सो निरमलु निरमल हरि गुन गावै ॥
सो भाई मेरै मनि भावै ॥1॥ रहाउ ॥
जिह घट रामु रहिआ भरपूरि ॥ तिन की पग पंकज हम धूरि ॥2॥
जाति जुलाहा मति का धीरु ॥
सहजि सहजि गुण रमै कबीरु ॥3॥26॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ जो मनुष्य मालिक प्रभू का नाम सिमरते हैं। मैं सदा उनके सदके जाता हूँ। 1। जो भाई प्रभू के सुंदर गुण गाता है। वह पवित्र है। और वह मेरे मन को प्यारा लगता है। 1। रहाउ। जिन मनुष्यों के हृदय में प्रभू प्रगट हो गया है। उनके कमल फूल जैसे (सुंदर) चरणों की हम धूड़ हैं (भाव। चरणों से सदके हैं)। 2। कबीर चाहे जाति का जुलाहा है।पर मति का धैर्यवान है (क्योंकि) अडोलता में रह के (प्रभू के) गुण गाता है। 3। 26।
गउड़ी कबीर जी ॥
गगनि रसाल चुऐ मेरी भाठी ॥
संचि महा रसु तनु भइआ काठी ॥1॥
उआ कउ कहीऐ सहज मतवारा ॥
पीवत राम रसु गिआन बीचारा ॥1॥ रहाउ ॥
सहज कलालनि जउ मिलि आई ॥
आनंदि माते अनदिनु जाई ॥2॥
चीनत चीतु निरंजन लाइआ ॥
कहु कबीर तौ अनभउ पाइआ ॥3॥27॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ मेरी गगन-रूपी भट्ठी में से स्वादिष्ट अमृत चू रहा है (भाव। ज्यों ज्यों मेरा मन प्रभू की याद में जुड़ता है। उस याद में जुड़े रहने की एक-तार लगन। जैसे अमृत की धार निकलनी शुरू हो जाती है)। उस उच्च नाम-रस को एकत्र करने के कारण शरीर (की ममता) लकड़ियों का काम कर रही है (भाव। शरीर की ममता जल गई है)। 1। उसे कुदरती तौर पे (भाव। स्वभाविक ही) मस्त हुआ हुआ कहते हैं। जिस मनुष्य ने ज्ञान के विचार के द्वारा (भाव। सुरति माया से ऊूंची करके) राम-रस पीया है।1। रहाउ। जब सहज अवस्था-रूप शराब पिलाने वाली आ मिलती है तब आनंद में मस्त हो के (उम्र का) हरेक दिन बीतता है (भाव। नाम सिमरते हुए मन में एक ऐसी हालत पैदा होती है जहाँ मन माया के झोकों में डोलता नहीं। इस हालत को सहज अवस्था कहते हैं; ये सहज अवस्था जैसे। एक कलालिन है। जो नाम का नशा दिए जाती है; इस नशे से विछुड़ने को चित्त नहीं करता। और बार-बार नाम की लिव में ही टिका रहता है)। 2। आनंद ले ले के जब मैंने अपना मन निरंकार के साथ जोड़ा। हे कबीर ! कह, (इस तरह) तब मुझे अंदरूनी रौशनी मिल गई। 3। 27।
गउड़ी कबीर जी ॥
मन का सुभाउ मनहि बिआपी ॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ (हरेक मनुष्य के) मन की अंदरूनी लगन (जो भी हो। वह उस मनुष्य के) सारे मन (भाव। मन की सारी दौड़-भाग। सारे मानस जीवन) पर प्रभाव डाले रखती है।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गउड़ी कबीर जी ॥ हे सज्जन ! जिस मनुष्य के हृदय रूपी घर में प्रभू मालिक खुद मौजूद है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।