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अंग ३२६ · गउड़ी

अंग
326
गउड़ी
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  1. ऐसे घर हम बहुतु बसाए ॥
  2. ऐसो अचरजु देखिओ कबीर ॥
  3. गउड़ी कबीर जी पंचपदे ॥
  4. गउड़ी कबीर जी ॥
  5. गउड़ी कबीर जी तिपदे चारतुके ॥

ऐसे घर हम बहुतु बसाए ॥

अंग ३२५ से चला आ रहा अंश

ऐसे घर हम बहुतु बसाए ॥
जब हम राम गरभ होइ आए ॥1॥ रहाउ ॥
जोगी जती तपी ब्रहमचारी ॥
कबहू राजा छत्रपति कबहू भेखारी ॥2॥
साकत मरहि संत सभि जीवहि ॥
राम रसाइनु रसना पीवहि ॥3॥
कहु कबीर प्रभ किरपा कीजै ॥
हारि परे अब पूरा दीजै ॥4॥13॥

हिन्दी अर्थ: हे राम ! जब हम जूनियों में पड़ते गए और ऐसे कई शरीरों में से गुजर के आए हैं। 1। रहाउ। कभी हम जोगी बने। कभी जती। कभी तपस्वी। कभी ब्रहमचारी। कभी छत्रपति राजे बने और कभी मंगते। 2। जो मनुष्य ईश्वर से टूटे रहते हैं वह सदा (इसी तरह) कई जूनियों में पड़े रहते हैं। पर संत जन सदा जीते हैं (भाव। जनम मरण के चक्र में नहीं पड़ते। क्योंकि) वह जीभ से प्रभू के नाम का श्रेष्ठ रस पीते रहते हैं। 3। (सो) हे कबीर ! (परमात्मा के आगे इस तरह) अरदास कर- हे प्रभू ! हम थके-टूट के (आपके दर पर) आ गिरे हैं। मेहर करके अब अपना ज्ञान बख्श। 4। 13।

ऐसो अचरजु देखिओ कबीर ॥

गउड़ी कबीर जी की नालि रलाइ लिखिआ महला 5 ॥
ऐसो अचरजु देखिओ कबीर ॥
दधि कै भोलै बिरोलै नीरु ॥1॥ रहाउ ॥
हरी अंगूरी गदहा चरै ॥
नित उठि हासै हीगै मरै ॥1॥
माता भैसा अंमुहा जाइ ॥
कुदि कुदि चरै रसातलि पाइ ॥2॥
कहु कबीर परगटु भई खेड ॥
लेले कउ चूघै नित भेड ॥3॥
राम रमत मति परगटी आई ॥
कहु कबीर गुरि सोझी पाई ॥4॥1॥14॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी की नालि रलाइ लिखिआ महला 5 ॥ हे कबीर ! मैंने एक अजीब तमाशा देखा है कि (जीव) दही के भुलेखे पानी मथ रहा है। 1। रहाउ। मूर्ख जीव मन-भाते विकारों में खचित है। इसी तरह सदा हसता और (गधे की तरह) हींगता रहता है (आखिर) जनम-मरन के चक्कर में पड़ जाता है। 1। मस्ताए सांड जैसा मन दकियानूस-पना करता है। कूदता है (भाव। अहंकार करता है) विषियों की खेती चुगता रहता है। और नर्क में पड़ जाता है। 2। हे कबीर ! कह, (मुझे तो) ये अजीब तमाशा समझ में आ गया है (तमाशा यह है कि) संसारी जीवों की बुद्धि मन के पीछे लगी फिरती है। 3। (जिसकी बरकति से) प्रभू का सिमरन करते-करते (मेरी) बुद्धि जाग पड़ी है (और मन के पीछे चलने से हट गई है)। (ये समझ किस ने दी है?) हे कबीर कह, सतिगुरू ने ये समझ बख्शी है।4। 1। 14।

गउड़ी कबीर जी पंचपदे ॥

गउड़ी कबीर जी पंचपदे ॥
जिउ जल छोडि बाहरि भइओ मीना ॥
पूरब जनम हउ तप का हीना ॥1॥
अब कहु राम कवन गति मोरी ॥
तजी ले बनारस मति भई थोरी ॥1॥ रहाउ ॥
सगल जनमु सिव पुरी गवाइआ ॥
मरती बार मगहरि उठि आइआ ॥2॥
बहुतु बरस तपु कीआ कासी ॥
मरनु भइआ मगहर की बासी ॥3॥
कासी मगहर सम बीचारी ॥
ओछी भगति कैसे उतरसि पारी ॥4॥
कहु गुर गज सिव सभु को जानै ॥
मुआ कबीरु रमत स्री रामै ॥5॥15॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी पंचपदे ॥ (मुझे लोग कह रहे हैं कि) जैसे मछली पानी को छोड़ के बाहर निकल आती है (तो दुखी हो के मर जाती है। वैसे ही) मैंने भी पिछले जन्मों में तप नहीं किया (तभी मुक्ति देने वाली काशी को छोड़ के मगहर आ गया हूँ)। 1। हे मेरे राम ! अब मुझे बता। मेरा क्या हाल होंगे? मैं काशी छोड़ आया हूँ (क्या ये ठीक है कि) मेरी मति मारी गई है?। 1। रहाउ। (हे राम ! मुझे लोग कहते हैं) ‘आपने सारी उम्र काशी में व्यर्थ ही गुजार दी (क्योंकि अब जब मुक्ति मिलने का समय आया तो) मरने के समय काशी छोड़कर मगहर चले आए हैं’। 2। (हे प्रभू ! लोग कहते हैं-) आपने काशी में रह कर कई साल तप किया (पर। उस तप का क्या लाभ ?) जब मरने का वक्त आया तो मगहर आकर बस गया। 3। (हे राम ! लोक ताना मारते हैं) आपने काशी और मगहर को एक समान समझ लिया है। इस होछी भगती से (जो आप कर रहे हैं) कैसे संसार-समुंद्र से पार गुजरेगा?। 4। (हे कबीर !) कह, ‘हरेक मनुष्य गणेश और शिव को ही पहचानता है (भाव। हरेक मनुष्य यही समझ रहा है कि शिव मुक्ति दाता है और गणेश की नगरी मुक्ति छीनने वाली है); पर कबीर तो प्रभू का सिमरन कर करके स्वै भाव ही मिटा बैठा है (कबीर को ये पता करने की जरूरत ही नहीं रही कि उसकी क्या गति होगी)। 5। 15।

गउड़ी कबीर जी ॥

गउड़ी कबीर जी ॥
चोआ चंदन मरदन अंगा ॥
सो तनु जलै काठ कै संगा ॥1॥
इसु तन धन की कवन बडाई ॥
धरनि परै उरवारि न जाई ॥1॥ रहाउ ॥
राति जि सोवहि दिन करहि काम ॥
इकु खिनु लेहि न हरि को नाम ॥2॥
हाथि त डोर मुखि खाइओ तंबोर ॥
मरती बार कसि बाधिओ चोर ॥3॥
गुरमति रसि रसि हरि गुन गावै ॥
रामै राम रमत सुखु पावै ॥4॥
किरपा करि कै नामु द्रिड़ाई ॥
हरि हरि बासु सुगंध बसाई ॥5॥
कहत कबीर चेति रे अंधा ॥
सति रामु झूठा सभु धंधा ॥6॥16॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ (जिस शरीर के) अंगों को इत्र और चंदन मलते हैं। वह शरीर (आखिर को) लकड़ियों में डाल कर जलाया जाता है। 1। इस शरीर और धन पर क्या गुमान करना? ये यहाँ ही धरती पर पड़े रह जाते हैं (जीव के साथ) नहीं जाते। 1। रहाउ। जो मनुष्य रात को सोए रहते हैं (भाव। रात सो के गुजार देते हैं)। और दिन में (दुनियावी) काम-धंधे करते रहते हैं। पर एक पल मात्र भी प्रभू का नाम नहीं सिमरते। 2। जो मनुष्य मुंह में तो पान चबा रहे हैं। और जिनके हाथ में (बाजों की) डोरियां हैं (भाव। जो शिकार आदि शुगल में उलझे रहते हैं)। वे मरने के समय चोरों की तरह कस के बाँधे जाते हैं। 3। जो मनुष्य सतिगुरू की मति ले के बड़े प्रेम से प्रभू के गुण गाता है। वह केवल प्रभू को सिमर-सिमर के सुख पाते हैं। 4। प्रभू अपनी मेहर करके जिसके हृदय में अपना नाम बसाता है। उसमें वह ‘नाम’ की खुशबू भी बसा देता है। 5। कबीर कहता है, हे अज्ञानी जीव ! प्रभू को सिमर; प्रभू ही सदा स्थिर रहने वाला है। बाकी सारा जंजाल नाश हो जाने वाला है। 6। 16।

गउड़ी कबीर जी तिपदे चारतुके ॥

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गउड़ी कबीर जी तिपदे चारतुके ॥
जम ते उलटि भए है राम ॥
दुख बिनसे सुख कीओ बिसराम ॥
बैरी उलटि भए है मीता ॥
साकत उलटि सुजन भए चीता ॥1॥
अब मोहि सरब कुसल करि मानिआ ॥
सांति भई जब गोबिदु जानिआ ॥1॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी तिपदे चारतुके ॥ जमों से बदल के प्रभू (का रूप) हो गए हैं (भाव। पहले जो मुझे जम-रूप दिखते थे। अब वे प्रभू का रूप दिखाई देते हैं)। मेरे दुख दूर हो गए हैं और सुखों ने (मेरे अंदर) डेरा आ जमाया है। जो पहले वैरी थे। अब वे सज्जन बन गए हैं (भाव। जो इंद्रियां पहले विकारों की तरफ जा के वैरियों वाला काम कर रही थीं। अब वही भली ओर ले जा रही हैं); पहले ये ईश्वर से टूटे हुए थे। अब उलट के अंतर-आतमे गुरमुख बन गए हैं। 1। अब मुझे सारे सुख आनंद प्रतीत हो रहे हैं; जब का मैंने प्रभू को पहचान लिया है (प्रभू से सांझ डाल ली है) तब से ही (मेरे अंदर) ठंड पड़ गई हैं1। रहाउ।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी; भगत कबीर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३२६ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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