अंग
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गउड़ी
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ऊतमु ऊचौ पारब्रहमु गुण अंतु न जाणहि सेख ॥
ऊतमु ऊचौ पारब्रहमु गुण अंतु न जाणहि सेख ॥
नारद मुनि जन सुक बिआस जसु गावत गोबिंद ॥
रस गीधे हरि सिउ बीधे भगत रचे भगवंत ॥
मोह मान भ्रमु बिनसिओ पाई सरनि दइआल ॥
चरन कमल मनि तनि बसे दरसनु देखि निहाल ॥
लाभु मिलै तोटा हिरै साधसंगि लिव लाइ ॥
खाटि खजाना गुण निधि हरे नानक नामु धिआइ ॥6॥
नारद मुनि जन सुक बिआस जसु गावत गोबिंद ॥
रस गीधे हरि सिउ बीधे भगत रचे भगवंत ॥
मोह मान भ्रमु बिनसिओ पाई सरनि दइआल ॥
चरन कमल मनि तनि बसे दरसनु देखि निहाल ॥
लाभु मिलै तोटा हिरै साधसंगि लिव लाइ ॥
खाटि खजाना गुण निधि हरे नानक नामु धिआइ ॥6॥
हिन्दी अर्थ: परमात्मा (सबसे) श्रेष्ठ और (सबसे) ऊँचा है (किसी की उस तक पहुँच नहीं)। अनेकों शेशनाग भी उसके गुणों का अंत नहीं जान सकते। नारद ऋषि। अनेकों मुनिवर। सुखदेव और ब्यास (आदि ऋषि) गोबिंद की सिफत सालाह गाते हैं। भगवान के भगत उसके नाम-रस में भीगे रहते हैं। उसकी याद में परोए रहते हैं और भक्ति में मस्त रहते हैं। जिन मनुष्यों ने दया के घर प्रभू का आसरा ले लिया (उनके अंदर से माया का) मोह। अहंकार और भटकना सब कुछ नाश हो गया। जिन के मन में। हृदय में परमात्मा के सुंदर चरण बस गए। परमात्मा के दर्शन करके उनका तन-मन खिल पड़ा। साधसंगति के द्वारा प्रभू चरणों में सुरति जोड़ के (उच्च आत्मिक जीवन-रूप) लाभ कमा लेते हैं (विकारों की तरफ पड़ने से जो आत्मिक जीवन में कमी आती है। वह) कमी दूर हो जाती है। हे नानक ! आप भी परमात्मा का नाम सिमर। और गुणों के खजाने परमात्मा के नाम का खजाना इकट्ठा कर। 6।
संत मंडल हरि जसु कथहि बोलहि सति सुभाइ ॥
सलोकु ॥
संत मंडल हरि जसु कथहि बोलहि सति सुभाइ ॥
नानक मनु संतोखीऐ एकसु सिउ लिव लाइ ॥7॥
संत मंडल हरि जसु कथहि बोलहि सति सुभाइ ॥
नानक मनु संतोखीऐ एकसु सिउ लिव लाइ ॥7॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु- हे नानक ! संत जन (सदा) परमात्मा की सिफति सालाह उचारते हैं। प्रेम में टिक के सदा कायम रहने वाले प्रभू के गुण बयान करते हैं (क्योंकि) एक परमात्मा (के चरनों) में सुरति जोड़े रखने से मन शांति रहता है। 7।
सपतमि संचहु नाम धनु टूटि न जाहि भंडार ॥
पउड़ी ॥
सपतमि संचहु नाम धनु टूटि न जाहि भंडार ॥
संतसंगति महि पाईऐ अंतु न पारावार ॥
आपु तजहु गोबिंद भजहु सरनि परहु हरि राइ ॥
दूख हरै भवजलु तरै मन चिंदिआ फलु पाइ ॥
आठ पहर मनि हरि जपै सफलु जनमु परवाणु ॥
अंतरि बाहरि सदा संगि करनैहारु पछाणु ॥
सो साजनु सो सखा मीतु जो हरि की मति देइ ॥
नानक तिसु बलिहारणै हरि हरि नामु जपेइ ॥7॥
सपतमि संचहु नाम धनु टूटि न जाहि भंडार ॥
संतसंगति महि पाईऐ अंतु न पारावार ॥
आपु तजहु गोबिंद भजहु सरनि परहु हरि राइ ॥
दूख हरै भवजलु तरै मन चिंदिआ फलु पाइ ॥
आठ पहर मनि हरि जपै सफलु जनमु परवाणु ॥
अंतरि बाहरि सदा संगि करनैहारु पछाणु ॥
सो साजनु सो सखा मीतु जो हरि की मति देइ ॥
नानक तिसु बलिहारणै हरि हरि नामु जपेइ ॥7॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई !) परमात्मा का नाम-धन इकट्ठा करो। नाम-धन के खजाने कभी खत्म नहीं होते। (पर। उस परमात्मा का ये नाम-धन) साध-संगति में रहने से ही मिलता है। जिसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। जिसके स्वरूप के इस पार उस पार का छोर नहीं मिलता। (हे भाई !) स्वै भाव दूर करो। परमात्मा का भजन करते रहो। प्रभू पातशाह की शरण पड़े रहो (जो मनुष्य प्रभू की शरण पड़ा रहता है। वह अपने सारे) दुख दूर कर लेता है। संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है। और मन-चाहा फल प्राप्त कर लेता है। (हे भाई !) जो मनुष्य आठों पहर अपने मन में परमात्मा का नाम जपता है। उसका मानस जनम कामयाब हो जाता है। वह (परमात्मा की हजूरी में) कबूल हो जाता है। जो परमात्मा (हरेक जीव के) अंदर बाहर सदा साथ (बसता) है वह सृजनहार प्रभू उस मनुष्य का मित्र बन जाता है। (हे भाई !) जो मनुष्य (हमें) परमात्मा (का नाम जपने) की मति देता है। वही (हमारा असली) सज्जन है। साथी है। मित्र है। हे नानक ! (कह) जो मनुष्य सदा हरि-नाम जपता है। मैं उससे कुर्बान जाता हूँ। 7।
आठ पहर गुन गाईअहि तजीअहि अवरि जंजाल ॥
सलोकु ॥
आठ पहर गुन गाईअहि तजीअहि अवरि जंजाल ॥
जमकंकरु जोहि न सकई नानक प्रभू दइआल ॥8॥
आठ पहर गुन गाईअहि तजीअहि अवरि जंजाल ॥
जमकंकरु जोहि न सकई नानक प्रभू दइआल ॥8॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु- हे नानक ! अगर आठों पहर (परमात्मा) के गुण गाए जाएं। और अन्य सभी बंधन त्याग दिए जाएं। तो परमात्मा दयावान हो जाता है और जमदूत देख नहीं सकते (मौत का डर नजदीक नहीं फटकता। आत्मिक मौत पास नहीं आ सकती)। 8।
असटमी असट सिधि नव निधि ॥
पउड़ी ॥
असटमी असट सिधि नव निधि ॥
सगल पदारथ पूरन बुधि ॥
कवल प्रगास सदा आनंद ॥
निरमल रीति निरोधर मंत ॥
सगल धरम पवित्र इसनानु ॥
सभ महि ऊच बिसेख गिआनु ॥
हरि हरि भजनु पूरे गुर संगि ॥
जपि तरीऐ नानक नाम हरि रंगि ॥8॥
असटमी असट सिधि नव निधि ॥
सगल पदारथ पूरन बुधि ॥
कवल प्रगास सदा आनंद ॥
निरमल रीति निरोधर मंत ॥
सगल धरम पवित्र इसनानु ॥
सभ महि ऊच बिसेख गिआनु ॥
हरि हरि भजनु पूरे गुर संगि ॥
जपि तरीऐ नानक नाम हरि रंगि ॥8॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (नाम के प्रताप में ही) आठों करामाती ताकतें और दुनिया के नौ खजाने आ जाते हैं। सारे पदार्थ प्राप्त हो जाते हैं। वह बुद्धि मिल जाती है जो कभी गलती नहीं करती। (मन में) सदा चाव ही चाव टिका रहता है। (हृदय का) कमल-फूल खिल जाता है (जैसे सूरज की किरणों से कमल-फूल खिलता है। वैसे ही नाम की बरकति से हृदय खिला रहता है)। (परमात्मा का नाम एक ऐसा) मंत्र है जिस का असर बेकार नहीं जा सकता। (इस मंत्र की बरकति से) जीवन-जुगति पवित्र हो जाती है। (हे भाई ! परमात्मा का नाम ही) सारे धर्मों (का धर्म है। सारे तीर्थ-स्नानों से) पवित्र स्नान है। (नाम-सिमरन ही सारे शास्त्र आदि के दिए ज्ञान से) सबसे ऊँचा और श्रेष्ठ ज्ञान है। हे नानक ! पूरे गुरू की संगति में रह के अगर हरि नाम का भजन किया जाय। परमात्मा के प्रेम रंग में टिक के हरि नाम जप के (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। 8।
नाराइणु नह सिमरिओ मोहिओ सुआद बिकार ॥
सलोकु ॥
नाराइणु नह सिमरिओ मोहिओ सुआद बिकार ॥
नानक नामि बिसारिऐ नरक सुरग अवतार ॥9॥
नाराइणु नह सिमरिओ मोहिओ सुआद बिकार ॥
नानक नामि बिसारिऐ नरक सुरग अवतार ॥9॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु- (जिस मनुष्य ने कभी) परमात्मा का नाम नहीं सिमरा। (वह सदा) विकारों में (दुनिया के पदार्थों के) स्वादों में फंसा रहता है। हे नानक ! अगर परमात्मा का नाम भुला दिया जाए तो नरक-स्वर्ग (भोगने के लिए बार-बार) जनम लेना पड़ता है। 9।
नउमी नवे छिद्र अपवीत ॥
पउड़ी ॥
नउमी नवे छिद्र अपवीत ॥
हरि नामु न जपहि करत बिपरीति ॥
पर त्रिअ रमहि बकहि साध निंद ॥
करन न सुनही हरि जसु बिंद ॥
हिरहि पर दरबु उदर कै ताई ॥
अगनि न निवरै त्रिसना न बुझाई ॥
हरि सेवा बिनु एह फल लागे ॥
नानक प्रभ बिसरत मरि जमहि अभागे ॥9॥
नउमी नवे छिद्र अपवीत ॥
हरि नामु न जपहि करत बिपरीति ॥
पर त्रिअ रमहि बकहि साध निंद ॥
करन न सुनही हरि जसु बिंद ॥
हिरहि पर दरबु उदर कै ताई ॥
अगनि न निवरै त्रिसना न बुझाई ॥
हरि सेवा बिनु एह फल लागे ॥
नानक प्रभ बिसरत मरि जमहि अभागे ॥9॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (उन मनुष्यों की कान-नाक आदिक) नौवों इंद्रियां गंदी हुई रहती हैं। जो मनुष्य परमात्मा का नाम नहीं जपते। वे (मानवता की मर्यादा के) उलट (बुरे) कर्म करते रहते हैं (प्रभू के सिमरन से टूटे हुए मनुष्य) पराई सि्त्रयां भोगते हैं और भले मनुष्यों की निंदा करते रहते हैं। वे कभी पल भर के लिए भी (अपने) कानों से परमात्मा की सिफत सालाह नहीं सुनते। (सिमरन-हीन लोग) अपना पेट भरने की खातिर पराया धन चुराते रहते हैं (फिर भी उनकी) लालच की आग नहीं बुझती (उनके अंदर से) तृष्णा नहीं मिटती। हे नानक ! परमात्मा की सेवा भगती के बिना (उनके सारे उद्यमों को ऊपर बताए हुए) ऐसे फल ही लगते हैं। परमात्मा को बिसारने के कारण वह भाग-हीन मनुष्य नित्य जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। 9।
दस दिस खोजत मै फिरिओ जत देखउ तत सोइ ॥
सलोकु ॥
दस दिस खोजत मै फिरिओ जत देखउ तत सोइ ॥
मनु बसि आवै नानका जे पूरन किरपा होइ ॥10॥
दस दिस खोजत मै फिरिओ जत देखउ तत सोइ ॥
मनु बसि आवै नानका जे पूरन किरपा होइ ॥10॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु- मैं जिधर देखता हूँ। उधर वह (परमात्मा) ही बस रहा है, (पर घर छोड़ के) दसों दिशाओं में मैं ढूँढता फिरा हूँ (जंगल आदि में कहीं भी मन वश में नहीं आता); हे नानक ! (कह, वैसे तो) मन तभी वश में आता है यदि सर्व-गुणों के मालिक परमात्मा की (अपनी) मेहर हो। 10।
दसमी दस दुआर बसि कीने ॥
पउड़ी ॥
दसमी दस दुआर बसि कीने ॥
मनि संतोखु नाम जपि लीने ॥
करनी सुनीऐ जसु गोपाल ॥
नैनी पेखत साध दइआल ॥
रसना गुन गावै बेअंत ॥
मन महि चितवै पूरन भगवंत ॥
दसमी दस दुआर बसि कीने ॥
मनि संतोखु नाम जपि लीने ॥
करनी सुनीऐ जसु गोपाल ॥
नैनी पेखत साध दइआल ॥
रसना गुन गावै बेअंत ॥
मन महि चितवै पूरन भगवंत ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- दसों ही इंद्रियों को मनुष्य अपने काबू में कर लेता है। (जब परमात्मा की कृपा से मनुष्य) परमात्मा का नाम जपता है तो उसके मन में संतोख पैदा होता है। (प्रभू की कृपा से) कानों से सृष्टि के पालनहार प्रभू की सिफतसालाह सुनी जाती है। आँखों से दया के घर गुरू का दर्शन करते हैं। जीभ बेअंत प्रभू के गुण गाने लग पड़ती है। और मनुष्य अपने मन में सर्व-व्यापक भगवान (के गुण) याद करता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २९८ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।