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गउड़ी
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- लाभु मिलै तोटा हिरै हरि दरगह पतिवंत ॥
- तीनि बिआपहि जगत कउ तुरीआ पावै कोइ ॥
- त्रितीआ त्रै गुण बिखै फल कब उतम कब नीचु ॥
- चतुर सिआणा सुघड़ु सोइ जिनि तजिआ अभिमानु ॥
- चतुरथि चारे बेद सुणि सोधिओ ततु बीचारु ॥
- पंच बिकार मन महि बसे राचे माइआ संगि ॥
- पंचमि पंच प्रधान ते जिह जानिओ परपंचु ॥
- खट सासत्र ऊचौ कहहि अंतु न पारावार ॥
- खसटमि खट सासत्र कहहि सिंम्रिति कथहि अनेक ॥
· थिती · राग गउड़ी
लाभु मिलै तोटा हिरै हरि दरगह पतिवंत ॥
लाभु मिलै तोटा हिरै हरि दरगह पतिवंत ॥
राम नाम धनु संचवै साच साह भगवंत ॥
ऊठत बैठत हरि भजहु साधू संगि परीति ॥
नानक दुरमति छुटि गई पारब्रहम बसे चीति ॥2॥
राम नाम धनु संचवै साच साह भगवंत ॥
ऊठत बैठत हरि भजहु साधू संगि परीति ॥
नानक दुरमति छुटि गई पारब्रहम बसे चीति ॥2॥
हिन्दी अर्थ: (आत्मिक जीवन में उन्हें) फायदा ही फायदा होता है और (आत्मिक जीवन में पड़ रही) घाट (उनके अंदर से) निकल जाती है। वे परमात्मा की दरगाह में इज्ज़त वाले हो जाते हैं। (हे भाई!) जो जो मनुष्य परमात्मा का नाम धन इकट्ठा करता है। वे सब भाग्यशाली हो जाते हैं। वह सदा के लिए शाहूकार बन जाते हैं। (हे भाई!) उठते-बैठते हर वक्त परमात्मा का भजन करें और गुरू की संगति में प्रेम पैदा करें। हे नानक! (जिस मनुष्य ने ये उद्यम किया उसकी) खोटी मति नहीं रही। परमात्मा सदा के लिए उसके चित्त में आ बसा। 2।
· थिती · राग गउड़ी
तीनि बिआपहि जगत कउ तुरीआ पावै कोइ ॥
सलोकु ॥
तीनि बिआपहि जगत कउ तुरीआ पावै कोइ ॥
नानक संत निरमल भए जिन मनि वसिआ सोइ ॥3॥
तीनि बिआपहि जगत कउ तुरीआ पावै कोइ ॥
नानक संत निरमल भए जिन मनि वसिआ सोइ ॥3॥
हिन्दी अर्थ: सलोक: हे नानक! जगत (के जीवों) पर (माया के) माया के तीन गुण अपना जोर डाल के रखते हैं। कोई विरला मनुष्य वह चौथी अवस्था प्राप्त करता है जहाँ वह परमात्मा से जुड़ा रहता है। जिन मनुष्यों के मन में वह परमात्मा ही सदा बसता है। वह संत जन पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। 3।
· थिती · राग गउड़ी
त्रितीआ त्रै गुण बिखै फल कब उतम कब नीचु ॥
पउड़ी ॥
त्रितीआ त्रै गुण बिखै फल कब उतम कब नीचु ॥
नरक सुरग भ्रमतउ घणो सदा संघारै मीचु ॥
हरख सोग सहसा संसारु हउ हउ करत बिहाइ ॥
जिनि कीए तिसहि न जाणनी चितवहि अनिक उपाइ ॥
आधि बिआधि उपाधि रस कबहु न तूटै ताप ॥
पारब्रहम पूरन धनी नह बूझै परताप ॥
मोह भरम बूडत घणो महा नरक महि वास ॥
करि किरपा प्रभ राखि लेहु नानक तेरी आस ॥3॥
त्रितीआ त्रै गुण बिखै फल कब उतम कब नीचु ॥
नरक सुरग भ्रमतउ घणो सदा संघारै मीचु ॥
हरख सोग सहसा संसारु हउ हउ करत बिहाइ ॥
जिनि कीए तिसहि न जाणनी चितवहि अनिक उपाइ ॥
आधि बिआधि उपाधि रस कबहु न तूटै ताप ॥
पारब्रहम पूरन धनी नह बूझै परताप ॥
मोह भरम बूडत घणो महा नरक महि वास ॥
करि किरपा प्रभ राखि लेहु नानक तेरी आस ॥3॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ माया के तीनों गुणों के प्रभाव में जीवों को विषौ-विकार रूपी फल ही मिलते हैं। कभी कोई (थोड़े समय के लिए) अच्छी अवस्था पाते हैं कभी नीची अवस्था में गिर पड़ते हैं। जीवों को नर्क-स्वर्ग (दुख-सुख भोगने पड़ते हैं) बहुत भटकना लगी रहती है। और मौत का सहिम सदा उनकी आत्मिक मौत का कारण बना रहता है। (तीन गुणों के अधीन जीवों की उम्र) अहंकार में बीतती है। कभी खुशी, कभी ग़मी, कभी सहम, ये चक्र (उनके वास्ते सदा बना रहता है)। जिस परमात्मा ने पैदा किया है। उससे गहरी सांझ नहीं डालते और (तीर्थ-स्नान वगैरा) और और धार्मिक कर्मों (यत्नों) के बारे में वह सदा सोचते रहते हैं। दुनिया के रसों (चस्कों) के कारन जीव को मन के रोग। शरीर के रोग व अन्य झगड़े-झमेले चिपके ही रहते हैं। कभी इसके मन का दुख-कलेश मिटता ही नहीं। (रसों में फंसा मनुष्य) पूरन पारब्रहम मालिक प्रभू के प्रताप को नहीं समझता। बेअंत दुनिया माया के मोह और भटकना में गोते खा रही है। भारी नरकों (दुखों) में दिन काट रही है। (इससे बचने के लिए) हे नानक! (अरदास करें और कहें) हे प्रभू! किरपा करके मेरी रक्षा करें। मुझे आपकी (सहायता की) आस है। 3।
· थिती · राग गउड़ी
चतुर सिआणा सुघड़ु सोइ जिनि तजिआ अभिमानु ॥
सलोकु ॥
चतुर सिआणा सुघड़ु सोइ जिनि तजिआ अभिमानु ॥
चारि पदारथ असट सिधि भजु नानक हरि नामु ॥4॥
चतुर सिआणा सुघड़ु सोइ जिनि तजिआ अभिमानु ॥
चारि पदारथ असट सिधि भजु नानक हरि नामु ॥4॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ (नाम की बरकति से) जिस मनुष्य ने (अपने मन में से) अहंकार दूर कर लिया है। वही है अक्लमंद। सयाना और सुजान। हे नानक! परमात्मा का नाम (सदा) जपते रहें (इसी में ही दुनिया के) चारों पदार्थ और (जोगियों वाली) आठों करामाती ताकतें। 4।
· थिती · राग गउड़ी
चतुरथि चारे बेद सुणि सोधिओ ततु बीचारु ॥
पउड़ी ॥
चतुरथि चारे बेद सुणि सोधिओ ततु बीचारु ॥
सरब खेम कलिआण निधि राम नामु जपि सारु ॥
नरक निवारै दुख हरै तूटहि अनिक कलेस ॥
मीचु हुटै जम ते छुटै हरि कीरतन परवेस ॥
भउ बिनसै अंम्रितु रसै रंगि रते निरंकार ॥
दुख दारिद अपवित्रता नासहि नाम अधार ॥
सुरि नर मुनि जन खोजते सुख सागर गोपाल ॥
मनु निरमलु मुखु ऊजला होइ नानक साध रवाल ॥4॥
चतुरथि चारे बेद सुणि सोधिओ ततु बीचारु ॥
सरब खेम कलिआण निधि राम नामु जपि सारु ॥
नरक निवारै दुख हरै तूटहि अनिक कलेस ॥
मीचु हुटै जम ते छुटै हरि कीरतन परवेस ॥
भउ बिनसै अंम्रितु रसै रंगि रते निरंकार ॥
दुख दारिद अपवित्रता नासहि नाम अधार ॥
सुरि नर मुनि जन खोजते सुख सागर गोपाल ॥
मनु निरमलु मुखु ऊजला होइ नानक साध रवाल ॥4॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ चारों ही वेद सुन के (हमने तो यह) निर्णय किया है, (यही) असल विचार (की बात मिली) है कि परमातमा का श्रेष्ठ नाम जप जप के सारे सुख मिल जाते हैं, सुखों का खजाना प्राप्त हो जाता है। (परमातमा का नाम) नरकों से बचा लेता है। सारे दुख दूर कर देता है। (नाम की बरकति से) अनेकों ही कलेश मिट जाते हैं। (जिस मनुष्य के हृदय में) परमातमा की सिफत सालाह का प्रवेश रहता है। उसकी आत्मिक मौत मिट जाती है। वह जमों से निजात प्राप्त कर लेता है। अगर निरंकार प्रभू के प्रेम रंग में रंगे जाएं तो (मन में से हरेक किस्म का) डर नाश हो जाता है और आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (हृदय में) रच-मिच जाता है। परमात्मा के नाम के आसरे दुख। गरीबी और विकारों से पैदा हुई मलीनता, ये सब नाश हो जाते हैं। हे नानक! दैवी गुणों वाले मनुष्य और ऋषि लोग जिस सुखों-के-समुंद्र सृष्टि-के-पालनहार प्रभू की तलाश करते हैं। वह गुरू की चरण-धूड़ प्राप्त करने से मिल जाता है (और जिस मनुष्य को मिल जाता है उसका) मन पवित्र हो जाता है (लोक-परलोक में उसका) मुंह रौशन होता है। 4।
· थिती · राग गउड़ी
पंच बिकार मन महि बसे राचे माइआ संगि ॥
सलोकु ॥
पंच बिकार मन महि बसे राचे माइआ संगि ॥
साधसंगि होइ निरमला नानक प्रभ कै रंगि ॥5॥
पंच बिकार मन महि बसे राचे माइआ संगि ॥
साधसंगि होइ निरमला नानक प्रभ कै रंगि ॥5॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक! जो मनुष्य माया (के मोह) में मस्त रहते हैं। उनके मन में काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार (पाँचों विकार) टिके रहते हैं। पर जो मनुष्य गुरू की संगति में (रह के) परमात्मा के प्रेम रंग में रंगा रहता है। वह पवित्र जीवन वाला हो जाता है। 5।
· थिती · राग गउड़ी
पंचमि पंच प्रधान ते जिह जानिओ परपंचु ॥
पउड़ी ॥
पंचमि पंच प्रधान ते जिह जानिओ परपंचु ॥
कुसम बास बहु रंगु घणो सभ मिथिआ बलबंचु ॥
नह जापै नह बूझीऐ नह कछु करत बीचारु ॥
सुआद मोह रस बेधिओ अगिआनि रचिओ संसारु ॥
जनम मरण बहु जोनि भ्रमण कीने करम अनेक ॥
रचनहारु नह सिमरिओ मनि न बीचारि बिबेक ॥
भाउ भगति भगवान संगि माइआ लिपत न रंच ॥
नानक बिरले पाईअहि जो न रचहि परपंच ॥5॥
पंचमि पंच प्रधान ते जिह जानिओ परपंचु ॥
कुसम बास बहु रंगु घणो सभ मिथिआ बलबंचु ॥
नह जापै नह बूझीऐ नह कछु करत बीचारु ॥
सुआद मोह रस बेधिओ अगिआनि रचिओ संसारु ॥
जनम मरण बहु जोनि भ्रमण कीने करम अनेक ॥
रचनहारु नह सिमरिओ मनि न बीचारि बिबेक ॥
भाउ भगति भगवान संगि माइआ लिपत न रंच ॥
नानक बिरले पाईअहि जो न रचहि परपंच ॥5॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (जगत में) वह संत जन श्रेष्ठ माने जाते हैं जिन्होंने इस जगत पसारे को (ऐसे) समझ लिया है (कि ये) फूलों की सुगंधि (जैसा है और भले ही) अनेकों रंगों वाला है (फिर भी) है सारा नाशवंत और ठॅगी ही। जगत को (सही जीवन-जुगति) सूझती नहीं। ये समझता नहीं। और (सही जीवन-जुगति के बारे में) कोई विचार नहीं करता। जगत (आम तौर पर) अज्ञान में मस्त रहता है। स्वादों में मोह लेने वाले रसों में बेधित रहता है। मनुष्य अनेकों ही कर्म करता रहा। वह जनम मरन के चक्कर में पड़ा रहा। वह अनेको जोनियों में भटकता रहा। मनुष्य ने सृजनहार करतार का सिमरन नहीं किया। अपने मन में विचार के (भले-बुरे काम की) परख नहीं पैदा की। जिन पर माया अपना रक्ती भर भी प्रभाव नहीं डाल सकती। और जो भगवान से प्रेम करते हैं भगवान की भगती करते हैं। हे नानक! (जगत में ऐसे लोग) दुर्लभ ही मिलते हैं जो इस जगत-पसारे (के मोह) में नहीं फंसते। 5।
· थिती · राग गउड़ी
खट सासत्र ऊचौ कहहि अंतु न पारावार ॥
सलोकु ॥
खट सासत्र ऊचौ कहहि अंतु न पारावार ॥
भगत सोहहि गुण गावते नानक प्रभ कै दुआर ॥6॥
खट सासत्र ऊचौ कहहि अंतु न पारावार ॥
भगत सोहहि गुण गावते नानक प्रभ कै दुआर ॥6॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ छे शास्त्र ऊँचा (पुकार के) कहते हैं कि परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। परमात्मा की हस्ती का इस पार का और उस पार का छोर नहीं मिल सकता। हे नानक! परमात्मा की भक्ति करने वाले बंदे परमात्मा के दर पर उस के गुण गाते सुंदर लगते हैं। 6।
· थिती · राग गउड़ी
खसटमि खट सासत्र कहहि सिंम्रिति कथहि अनेक ॥
पउड़ी ॥
खसटमि खट सासत्र कहहि सिंम्रिति कथहि अनेक ॥
खसटमि खट सासत्र कहहि सिंम्रिति कथहि अनेक ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ छे शास्त्र (परमात्मा का स्वरूप) बयान करते हैं। अनेको स्मृतियां (भी) बयान करती हैं (पर कोई उसके गुणों का अंत नहीं पा सकता)।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 297 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।