Lulla Family

अंग 299

अंग
299
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हसत चरन संत टहल कमाईऐ ॥
नानक इहु संजमु प्रभ किरपा पाईऐ ॥10॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हाथों से संत जनों के चरणों की टहल की जाती है। हे नानक ! ये (ऊपर बताई) जीवन-जुगति परमात्मा की कृपा से ही प्राप्त होती है। 10।
सलोकु ॥
एको एकु बखानीऐ बिरला जाणै स्वादु ॥
गुण गोबिंद न जाणीऐ नानक सभु बिसमादु ॥11॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सलोकु (हे भाई !) सिर्फ एक परमात्मा की ही सिफत सालाह करनी चाहिए (सिफत सालाह में ही आत्मिक आनंद है पर) इस आत्मिक आनंद को कोई दुर्लभ मनुष्य ही पाता है। (परमात्मा के गुण गायन करने से आत्मिक आनंद तो मिलता है; पर) गुणों (के बयान करने) से परमात्मा का सही स्वरूप नहीं समझा जा सकता (क्योंकि) हे नानक ! वह तो सारा आश्चर्य रूप है। 11।
पउड़ी ॥
एकादसी निकटि पेखहु हरि रामु ॥
इंद्री बसि करि सुणहु हरि नामु ॥
मनि संतोखु सरब जीअ दइआ ॥
इन बिधि बरतु संपूरन भइआ ॥
धावत मनु राखै इक ठाइ ॥
मनु तनु सुधु जपत हरि नाइ ॥
सभ महि पूरि रहे पारब्रहम ॥
नानक हरि कीरतनु करि अटल एहु धरम ॥11॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई !) परमात्मा को (सदा अपने) नजदीक (बसता) देखो। यही है एकादशी (का व्रत।) अपनी इंद्रियों को काबू में रख के परमात्मा का नाम सुना करो- (जो मनुष्य अपने) मन में संतोष (धारण करता है और) सब जीवों के साथ दया-प्यार वाला सलूक करता है। इस तरीके से (जीवन गुजारते हुए उसका) व्रत सफल हो जाता है (भाव। यही है असल व्रत)। (इस तरह के व्रत से वह मनुष्य विकारों की तरफ) दौड़ते (अपने) मन को एक ठिकाने पे टिकाए रखता है। परमात्मा का (नाम) जपते हुए (परमात्मा के) नाम में (जुड़ने से) उसका मन पवित्र हो जाता है। उसका हृदय पवित्र हो जाता है। हे नानक ! जो प्रभू सारे जगत में हर जगह व्यापक है। उस प्रभू की सिफत सालाह करता रह। यह ऐसा धर्म है जिसका फल जरूर मिलता है। 11।
सलोकु ॥
दुरमति हरी सेवा करी भेटे साध क्रिपाल ॥
नानक प्रभ सिउ मिलि रहे बिनसे सगल जंजाल ॥12॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सलोकु जो भाग्यशाली मनुष्य दया-के-धर गुरू से मिल लिए और जिन्होंने गुरू के द्वारा बताई हुई सेवा की। उन्होंने (अपने अंदर से) खोटी मति दूर कर ली। हे नानक ! जो लोग परमात्मा के चरणों में जुड़े रहते हैं। उनके (माया के मोह के) सारे बंधन नाश हो जाते हैं। 12।
पउड़ी ॥
दुआदसी दानु नामु इसनानु ॥
हरि की भगति करहु तजि मानु ॥
हरि अंम्रित पान करहु साधसंगि ॥
मन त्रिपतासै कीरतन प्रभ रंगि ॥
कोमल बाणी सभ कउ संतोखै ॥
पंच भू आतमा हरि नाम रसि पोखै ॥
गुर पूरे ते एह निहचउ पाईऐ ॥
नानक राम रमत फिरि जोनि न आईऐ ॥12॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई ! ख़लकति की) सेवा करो। परमात्मा का नाम जपो। और। जीवन पवित्र रखो। (मन में से) अहंकार त्याग के परमात्मा की भगती करते रहो। साध-संगति में मिल के आत्मिक जीवन देने वाला प्रभू का नाम रस पीते रहो। परमात्मा के प्रेम रंग में रंग के परमात्मा की सिफत सालाह करने से मन (दुनिया के पदार्थों से विकारों से) तृप्त रहता है। (सिफत सालाह की) मीठी वाणी हरेक (इंद्रिय) को आत्मिक आनंद देती है। सिफत सालाह की बरकति से मन पाँच तत्वों के ‘सतो’ अंश की घाड़त में घड़ा जा के परमात्मा के नाम-रस में प्रफुल्लित होता है। हे नानक ! पूरे गुरू से ये दाति यकीनी तौर पर मिल जाती है। और। परमात्मा का नाम सिमरने से फिर जोनियों में नहीं आते। 12।
सलोकु ॥
तीनि गुणा महि बिआपिआ पूरन होत न काम ॥
पतित उधारणु मनि बसै नानक छूटै नाम ॥13॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सलोकु जगत माया के तीन गुणों के दबाव में आया रहता है (इस वास्ते कभी भी इसकी) वासनाएं पूरी नहीं होती। हे नानक ! वह मनुष्य (इस माया के पंजे में से) बच निकलता है जिसके मन में परमात्मा का नाम बस जाता है जिसके मन में वह परमात्मा आ बसता है जो विकारों में गिरे हुए मनुष्यों को विकारों में से बचाने की समर्था वाला है। 13।
पउड़ी ॥
त्रउदसी तीनि ताप संसार ॥
आवत जात नरक अवतार ॥
हरि हरि भजनु न मन महि आइओ ॥
सुख सागर प्रभु निमख न गाइओ ॥
हरख सोग का देह करि बाधिओ ॥
दीरघ रोगु माइआ आसाधिओ ॥
दिनहि बिकार करत स्रमु पाइओ ॥
नैनी नीद सुपन बरड़ाइओ ॥
हरि बिसरत होवत एह हाल ॥
सरनि नानक प्रभ पुरख दइआल ॥13॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई !) जगत को तीन किस्म के दुख चिपके रहते हैं (जिसके कारण ये) जनम मरन के चक्कर में पड़ा रहता है। दुखों में ही पैदा होता है। (तीन तापों के कारण मनुष्य के) मन में परमात्मा का भजन नहीं टिकता। पलक झपकने के जितने के समय के वास्ते भी मनुष्य सुखों-के-समुंद्र प्रभू की सिफत सालाह नहीं करता। मनुष्य अपने आप को खुशी-ग़मी का पिण्ड बना के बसाए बैठा है। इसे माया (के मोह) का ऐसा लंबा रोग चिपका हुआ है जो काबू में नहीं आ सकता। (तीनों तापों के असर में मनुष्य) सारा दिन व्यर्थ काम करता-करता थक जाता है। (रात को जब) आँखों में नींद (आती है तब) सपनों में भी (दिन वाली दौड़-भाग की) बातें करता है। परमात्मा को भुला देने के कारण मनुष्य का ये हाल होता है। हे नानक ! (कह, अगर इस दुखदाई हालत से बचना है। तो) दया के श्रोत अकाल-पुरख प्रभू की शरण पड़। 13।
सलोकु ॥
चारि कुंट चउदह भवन सगल बिआपत राम ॥
नानक ऊन न देखीऐ पूरन ता के काम ॥14॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सलोकु चारों तरफ और चौदह लोक – सब में ही परमात्मा बस रहा है। हे नानक ! (उस परमात्मा के भण्डारों में) कोई कमी नहीं देखी जाती। उसके किए सारे ही काम सफल होते हैं। 14।
पउड़ी ॥
चउदहि चारि कुंट प्रभ आप ॥
सगल भवन पूरन परताप ॥
दसे दिसा रविआ प्रभु एकु ॥
धरनि अकास सभ महि प्रभ पेखु ॥
जल थल बन परबत पाताल ॥
परमेस्वर तह बसहि दइआल ॥
सूखम असथूल सगल भगवान ॥
नानक गुरमुखि ब्रहमु पछान ॥14॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- चारों दिशाओं में परमात्मा स्वयं बस रहा है। सारे भवनों में उसका तेज-प्रताप चमकता है। सिर्फ एक प्रभू ही दसों दिशाओं में बसता है। (हे भाई !) धरती-आकाश सब में बसता परमात्मा देखो। पानी। धरती। जंगल। पहाड़।पाताल – इन सभी में ही दया-के-घर प्रभू जी बस रहे हैं। अदृश्य और दृष्टमान सारे ही जगत में भगवान मौजूद है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के बताए राह पर चलता है वह परमात्मा को (सब जगह बसता) पहिचान लेता है। 14।
सलोकु ॥
आतमु जीता गुरमती गुण गाए गोबिंद ॥
संत प्रसादी भै मिटे नानक बिनसी चिंद ॥15॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सलोकु हे नानक ! जिस मनुष्य ने गुरू की शिक्षा पर चल के अपने आप को (अपने मन को) बस में किया और परमात्मा की सिफत सालाह की। गुरू की कृपा से उसके सारे डर दूर हो गए और हरेक किस्म की चिंता-फिक्र का नाश हो गया। 15।
पउड़ी ॥
अमावस आतम सुखी भए संतोखु दीआ गुरदेव ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई !) जिस मनुष्य को सतिगुरू ने संतोख बख्शा। उसकी आत्मा सुखी हो गई।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हाथों से संत जनों के चरणों की टहल की जाती है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।