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गउड़ी
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- हसत चरन संत टहल कमाईऐ ॥
- एको एकु बखानीऐ बिरला जाणै स्वादु ॥
- एकादसी निकटि पेखहु हरि रामु ॥
- दुरमति हरी सेवा करी भेटे साध क्रिपाल ॥
- दुआदसी दानु नामु इसनानु ॥
- तीनि गुणा महि बिआपिआ पूरन होत न काम ॥
- त्रउदसी तीनि ताप संसार ॥
- चारि कुंट चउदह भवन सगल बिआपत राम ॥
- चउदहि चारि कुंट प्रभ आप ॥
- आतमु जीता गुरमती गुण गाए गोबिंद ॥
- अमावस आतम सुखी भए संतोखु दीआ गुरदेव ॥
· थिती · राग गउड़ी
हसत चरन संत टहल कमाईऐ ॥
हसत चरन संत टहल कमाईऐ ॥
नानक इहु संजमु प्रभ किरपा पाईऐ ॥10॥
नानक इहु संजमु प्रभ किरपा पाईऐ ॥10॥
हिन्दी अर्थ: हाथों से संत जनों के चरणों की टहल की जाती है। हे नानक! ये (ऊपर बताई) जीवन-जुगति परमात्मा की कृपा से ही प्राप्त होती है। 10।
· थिती · राग गउड़ी
एको एकु बखानीऐ बिरला जाणै स्वादु ॥
सलोकु ॥
एको एकु बखानीऐ बिरला जाणै स्वादु ॥
गुण गोबिंद न जाणीऐ नानक सभु बिसमादु ॥11॥
एको एकु बखानीऐ बिरला जाणै स्वादु ॥
गुण गोबिंद न जाणीऐ नानक सभु बिसमादु ॥11॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु (हे भाई!) सिर्फ एक परमात्मा की ही सिफत सालाह करनी चाहिए (सिफत सालाह में ही आत्मिक आनंद है पर) इस आत्मिक आनंद को कोई दुर्लभ मनुष्य ही पाता है। (परमात्मा के गुण गायन करने से आत्मिक आनंद तो मिलता है; पर) गुणों (के बयान करने) से परमात्मा का सही स्वरूप नहीं समझा जा सकता (क्योंकि) हे नानक! वह तो सारा आश्चर्य रूप है। 11।
· थिती · राग गउड़ी
एकादसी निकटि पेखहु हरि रामु ॥
पउड़ी ॥
एकादसी निकटि पेखहु हरि रामु ॥
इंद्री बसि करि सुणहु हरि नामु ॥
मनि संतोखु सरब जीअ दइआ ॥
इन बिधि बरतु संपूरन भइआ ॥
धावत मनु राखै इक ठाइ ॥
मनु तनु सुधु जपत हरि नाइ ॥
सभ महि पूरि रहे पारब्रहम ॥
नानक हरि कीरतनु करि अटल एहु धरम ॥11॥
एकादसी निकटि पेखहु हरि रामु ॥
इंद्री बसि करि सुणहु हरि नामु ॥
मनि संतोखु सरब जीअ दइआ ॥
इन बिधि बरतु संपूरन भइआ ॥
धावत मनु राखै इक ठाइ ॥
मनु तनु सुधु जपत हरि नाइ ॥
सभ महि पूरि रहे पारब्रहम ॥
नानक हरि कीरतनु करि अटल एहु धरम ॥11॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (हे भाई!) परमात्मा को (सदा अपने) नजदीक (बसता) देखें। यही है एकादशी (का व्रत।) अपनी इंद्रियों को काबू में रख के परमात्मा का नाम सुना करें, (जो मनुष्य अपने) मन में संतोष (धारण करता है और) सब जीवों के साथ दया-प्यार वाला सलूक करता है। इस तरीके से (जीवन गुजारते हुए उसका) व्रत सफल हो जाता है (भाव, यही है असल व्रत)। (इस तरह के व्रत से वह मनुष्य विकारों की तरफ) दौड़ते (अपने) मन को एक ठिकाने पे टिकाए रखता है। परमात्मा का (नाम) जपते हुए (परमात्मा के) नाम में (जुड़ने से) उसका मन पवित्र हो जाता है। उसका हृदय पवित्र हो जाता है। हे नानक! जो प्रभू सारे जगत में हर जगह व्यापक है। उस प्रभू की सिफत सालाह करते रहें। यह ऐसा धर्म है जिसका फल जरूर मिलता है। 11।
· थिती · राग गउड़ी
दुरमति हरी सेवा करी भेटे साध क्रिपाल ॥
सलोकु ॥
दुरमति हरी सेवा करी भेटे साध क्रिपाल ॥
नानक प्रभ सिउ मिलि रहे बिनसे सगल जंजाल ॥12॥
दुरमति हरी सेवा करी भेटे साध क्रिपाल ॥
नानक प्रभ सिउ मिलि रहे बिनसे सगल जंजाल ॥12॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु जो भाग्यशाली मनुष्य दया-के-धर गुरू से मिल लिए और जिन्होंने गुरू के द्वारा बताई हुई सेवा की। उन्होंने (अपने अंदर से) खोटी मति दूर कर ली। हे नानक! जो लोग परमात्मा के चरणों में जुड़े रहते हैं। उनके (माया के मोह के) सारे बंधन नाश हो जाते हैं। 12।
· थिती · राग गउड़ी
दुआदसी दानु नामु इसनानु ॥
पउड़ी ॥
दुआदसी दानु नामु इसनानु ॥
हरि की भगति करहु तजि मानु ॥
हरि अंम्रित पान करहु साधसंगि ॥
मन त्रिपतासै कीरतन प्रभ रंगि ॥
कोमल बाणी सभ कउ संतोखै ॥
पंच भू आतमा हरि नाम रसि पोखै ॥
गुर पूरे ते एह निहचउ पाईऐ ॥
नानक राम रमत फिरि जोनि न आईऐ ॥12॥
दुआदसी दानु नामु इसनानु ॥
हरि की भगति करहु तजि मानु ॥
हरि अंम्रित पान करहु साधसंगि ॥
मन त्रिपतासै कीरतन प्रभ रंगि ॥
कोमल बाणी सभ कउ संतोखै ॥
पंच भू आतमा हरि नाम रसि पोखै ॥
गुर पूरे ते एह निहचउ पाईऐ ॥
नानक राम रमत फिरि जोनि न आईऐ ॥12॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (हे भाई! ख़लकति की) सेवा करें। परमात्मा का नाम जपें। और, जीवन पवित्र रखें। (मन में से) अहंकार त्याग के परमात्मा की भगती करते रहें। साध-संगति में मिल के आत्मिक जीवन देने वाला प्रभू का नाम रस पीते रहें। परमात्मा के प्रेम रंग में रंग के परमात्मा की सिफत सालाह करने से मन (दुनिया के पदार्थों से विकारों से) तृप्त रहता है। (सिफत सालाह की) मीठी वाणी हरेक (इंद्रिय) को आत्मिक आनंद देती है। सिफत सालाह की बरकति से मन पाँच तत्वों के ‘सतो’ अंश की घाड़त में घड़ा जा के परमात्मा के नाम-रस में प्रफुल्लित होता है। हे नानक! पूरे गुरू से ये दाति यकीनी तौर पर मिल जाती है। और, परमात्मा का नाम सिमरने से फिर जोनियों में नहीं आते। 12।
· थिती · राग गउड़ी
तीनि गुणा महि बिआपिआ पूरन होत न काम ॥
सलोकु ॥
तीनि गुणा महि बिआपिआ पूरन होत न काम ॥
पतित उधारणु मनि बसै नानक छूटै नाम ॥13॥
तीनि गुणा महि बिआपिआ पूरन होत न काम ॥
पतित उधारणु मनि बसै नानक छूटै नाम ॥13॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु जगत माया के तीन गुणों के दबाव में आया रहता है (इस वास्ते कभी भी इसकी) वासनाएं पूरी नहीं होती। हे नानक! वह मनुष्य (इस माया के पंजे में से) बच निकलता है जिसके मन में परमात्मा का नाम बस जाता है जिसके मन में वह परमात्मा आ बसता है जो विकारों में गिरे हुए मनुष्यों को विकारों में से बचाने की समर्था वाला है। 13।
· थिती · राग गउड़ी
त्रउदसी तीनि ताप संसार ॥
पउड़ी ॥
त्रउदसी तीनि ताप संसार ॥
आवत जात नरक अवतार ॥
हरि हरि भजनु न मन महि आइओ ॥
सुख सागर प्रभु निमख न गाइओ ॥
हरख सोग का देह करि बाधिओ ॥
दीरघ रोगु माइआ आसाधिओ ॥
दिनहि बिकार करत स्रमु पाइओ ॥
नैनी नीद सुपन बरड़ाइओ ॥
हरि बिसरत होवत एह हाल ॥
सरनि नानक प्रभ पुरख दइआल ॥13॥
त्रउदसी तीनि ताप संसार ॥
आवत जात नरक अवतार ॥
हरि हरि भजनु न मन महि आइओ ॥
सुख सागर प्रभु निमख न गाइओ ॥
हरख सोग का देह करि बाधिओ ॥
दीरघ रोगु माइआ आसाधिओ ॥
दिनहि बिकार करत स्रमु पाइओ ॥
नैनी नीद सुपन बरड़ाइओ ॥
हरि बिसरत होवत एह हाल ॥
सरनि नानक प्रभ पुरख दइआल ॥13॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (हे भाई!) जगत को तीन किस्म के दुख चिपके रहते हैं (जिसके कारण ये) जनम मरन के चक्कर में पड़ा रहता है। दुखों में ही पैदा होता है। (तीन तापों के कारण मनुष्य के) मन में परमात्मा का भजन नहीं टिकता। पलक झपकने के जितने के समय के वास्ते भी मनुष्य सुखों-के-समुंद्र प्रभू की सिफत सालाह नहीं करता। मनुष्य अपने आप को खुशी-ग़मी का पिण्ड बना के बसाए बैठा है। इसे माया (के मोह) का ऐसा लंबा रोग चिपका हुआ है जो काबू में नहीं आ सकता। (तीनों तापों के असर में मनुष्य) सारा दिन व्यर्थ काम करता-करता थक जाता है। (रात को जब) आँखों में नींद (आती है तब) सपनों में भी (दिन वाली दौड़-भाग की) बातें करता है। परमात्मा को भुला देने के कारण मनुष्य का ये हाल होता है। हे नानक! (कहें, अगर इस दुखदाई हालत से बचना है, तो) दया के श्रोत अकाल-पुरख प्रभू की शरण पड़ें। 13।
· थिती · राग गउड़ी
चारि कुंट चउदह भवन सगल बिआपत राम ॥
सलोकु ॥
चारि कुंट चउदह भवन सगल बिआपत राम ॥
नानक ऊन न देखीऐ पूरन ता के काम ॥14॥
चारि कुंट चउदह भवन सगल बिआपत राम ॥
नानक ऊन न देखीऐ पूरन ता के काम ॥14॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु चारों तरफ और चौदह लोक, सब में ही परमात्मा बस रहा है। हे नानक! (उस परमात्मा के भण्डारों में) कोई कमी नहीं देखी जाती। उसके किए सारे ही काम सफल होते हैं। 14।
· थिती · राग गउड़ी
चउदहि चारि कुंट प्रभ आप ॥
पउड़ी ॥
चउदहि चारि कुंट प्रभ आप ॥
सगल भवन पूरन परताप ॥
दसे दिसा रविआ प्रभु एकु ॥
धरनि अकास सभ महि प्रभ पेखु ॥
जल थल बन परबत पाताल ॥
परमेस्वर तह बसहि दइआल ॥
सूखम असथूल सगल भगवान ॥
नानक गुरमुखि ब्रहमु पछान ॥14॥
चउदहि चारि कुंट प्रभ आप ॥
सगल भवन पूरन परताप ॥
दसे दिसा रविआ प्रभु एकु ॥
धरनि अकास सभ महि प्रभ पेखु ॥
जल थल बन परबत पाताल ॥
परमेस्वर तह बसहि दइआल ॥
सूखम असथूल सगल भगवान ॥
नानक गुरमुखि ब्रहमु पछान ॥14॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ चारों दिशाओं में परमात्मा स्वयं बस रहा है। सारे भवनों में उसका तेज-प्रताप चमकता है। सिर्फ एक प्रभू ही दसों दिशाओं में बसता है। (हे भाई!) धरती-आकाश सब में बसता परमात्मा देखें। पानी, धरती, जंगल, पहाड़, पाताल, इन सभी में ही दया-के-घर प्रभू जी बस रहे हैं। अदृश्य और दृष्टमान सारे ही जगत में भगवान मौजूद है। हे नानक! जो मनुष्य गुरू के बताए राह पर चलता है वह परमात्मा को (सब जगह बसता) पहिचान लेता है। 14।
· थिती · राग गउड़ी
आतमु जीता गुरमती गुण गाए गोबिंद ॥
सलोकु ॥
आतमु जीता गुरमती गुण गाए गोबिंद ॥
संत प्रसादी भै मिटे नानक बिनसी चिंद ॥15॥
आतमु जीता गुरमती गुण गाए गोबिंद ॥
संत प्रसादी भै मिटे नानक बिनसी चिंद ॥15॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु हे नानक! जिस मनुष्य ने गुरू की शिक्षा पर चल के अपने आप को (अपने मन को) बस में किया और परमात्मा की सिफत सालाह की। गुरू की कृपा से उसके सारे डर दूर हो गए और हरेक किस्म की चिंता-फिक्र का नाश हो गया। 15।
· थिती · राग गउड़ी
अमावस आतम सुखी भए संतोखु दीआ गुरदेव ॥
पउड़ी ॥
अमावस आतम सुखी भए संतोखु दीआ गुरदेव ॥
अमावस आतम सुखी भए संतोखु दीआ गुरदेव ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (हे भाई!) जिस मनुष्य को सतिगुरू ने संतोख बख्शा। उसकी आत्मा सुखी हो गई।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 299 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।