अंग
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गउड़ी
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रचि रचना अपनी कल धारी ॥
रचि रचना अपनी कल धारी ॥
अनिक बार नानक बलिहारी ॥8॥18॥
अनिक बार नानक बलिहारी ॥8॥18॥
हिन्दी अर्थ: सृष्टि रच के प्रभू ने अपनी सक्ता (इस सृष्टि में) टिकाई है। हे नानक ! (कह) मैं कई बार (ऐसे प्रभू से) सदके हूँ। 8। 18।
साथि न चालै बिनु भजन बिखिआ सगली छारु ॥
सलोकु ॥
साथि न चालै बिनु भजन बिखिआ सगली छारु ॥
हरि हरि नामु कमावना नानक इहु धनु सारु ॥1॥
साथि न चालै बिनु भजन बिखिआ सगली छारु ॥
हरि हरि नामु कमावना नानक इहु धनु सारु ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ (प्रभू के) भजन के बिना (और कोई चीज मनुष्य के) साथ नहीं जाती। सारी माया (जो मनुष्श् कमाता रहता है। जगत से चलने के वक्त इसके वास्ते) राख के समान है। हे नानक ! अकाल-पुरख का नाम (सिमरन) की कमाई करना ही (सबसे) बढ़िया धन है (यही मनुष्य के साथ निभता है)। 1।
संत जना मिलि करहु बीचारु ॥
असटपदी ॥
संत जना मिलि करहु बीचारु ॥
एकु सिमरि नाम आधारु ॥
अवरि उपाव सभि मीत बिसारहु ॥
चरन कमल रिद महि उरि धारहु ॥
करन कारन सो प्रभु समरथु ॥
द्रिड़ु करि गहहु नामु हरि वथु ॥
इहु धनु संचहु होवहु भगवंत ॥
संत जना का निरमल मंत ॥
एक आस राखहु मन माहि ॥
सरब रोग नानक मिटि जाहि ॥1॥
संत जना मिलि करहु बीचारु ॥
एकु सिमरि नाम आधारु ॥
अवरि उपाव सभि मीत बिसारहु ॥
चरन कमल रिद महि उरि धारहु ॥
करन कारन सो प्रभु समरथु ॥
द्रिड़ु करि गहहु नामु हरि वथु ॥
इहु धनु संचहु होवहु भगवंत ॥
संत जना का निरमल मंत ॥
एक आस राखहु मन माहि ॥
सरब रोग नानक मिटि जाहि ॥1॥
हिन्दी अर्थ: अष्टपदी ॥ संतों से मिल के (प्रभू के गुणों का) विचार करो। एक प्रभू को सिमरो और प्रभू के नाम का आसरा (लो)। हे मित्र ! और सारे उपाय छोड़ दो और प्रभू के कमल (जैसे सुंदर) चरण हृदय में टिकाओ। वह प्रभू (सब कुछ खुद) करने (और जीवों से) करवाने की क्षमता रखता है। उस प्रभू का नाम-रूपी (खूबसूरत) पदार्थ अच्छी तरह से संभाल लो। (हे भाई !) (नाम-रूप) ये धन संचित करो और भाग्यशाली बनो। संतों का यही पवित्र उपदेश है। अपने मन में एक (प्रभू की) आस रखो। हे नानक ! (इस प्रकार) सारे रोग मिट जाएंगे। 1।
जिसु धन कउ चारि कुंट उठि धावहि ॥
जिसु धन कउ चारि कुंट उठि धावहि ॥
सो धनु हरि सेवा ते पावहि ॥
जिसु सुख कउ नित बाछहि मीत ॥
सो सुखु साधू संगि परीति ॥
जिसु सोभा कउ करहि भली करनी ॥
सा सोभा भजु हरि की सरनी ॥
अनिक उपावी रोगु न जाइ ॥
रोगु मिटै हरि अवखधु लाइ ॥
सरब निधान महि हरि नामु निधानु ॥
जपि नानक दरगहि परवानु ॥2॥
सो धनु हरि सेवा ते पावहि ॥
जिसु सुख कउ नित बाछहि मीत ॥
सो सुखु साधू संगि परीति ॥
जिसु सोभा कउ करहि भली करनी ॥
सा सोभा भजु हरि की सरनी ॥
अनिक उपावी रोगु न जाइ ॥
रोगु मिटै हरि अवखधु लाइ ॥
सरब निधान महि हरि नामु निधानु ॥
जपि नानक दरगहि परवानु ॥2॥
हिन्दी अर्थ: (हे मित्र !) जिस धन की खातिर (आप) चारों तरफ उठ दौड़ते हैं वह धन प्रभू की सेवा से मिलेगा। हे मित्र ! जिस सुख की आपको सदा चाहत रहती है। वह सुख संतों की संगति में प्यार करने से (मिलता है)। जिस शोभा के लिए आप नेक कमाई करते हैं। वह शोभा (कमाने के लिए) आप हरी की शरण पड़। (जो अहंकार का) रोग अनेकों तरीकों से दूर नहीं होता वह रोग प्रभू के नाम-रूपी दवाई के इस्तेमाल से मिट जाता है। सारे (दुनियावी) खजानों में प्रभू का नाम (बढ़िया) खजाना है। हे नानक ! (नाम) जप, दरगाह में कबूल (होगा)। 2।
मनु परबोधहु हरि कै नाइ ॥
मनु परबोधहु हरि कै नाइ ॥
दह दिसि धावत आवै ठाइ ॥
ता कउ बिघनु न लागै कोइ ॥
जा कै रिदै बसै हरि सोइ ॥
कलि ताती ठांढा हरि नाउ ॥
सिमरि सिमरि सदा सुख पाउ ॥
भउ बिनसै पूरन होइ आस ॥
भगति भाइ आतम परगास ॥
तितु घरि जाइ बसै अबिनासी ॥
कहु नानक काटी जम फासी ॥3॥
दह दिसि धावत आवै ठाइ ॥
ता कउ बिघनु न लागै कोइ ॥
जा कै रिदै बसै हरि सोइ ॥
कलि ताती ठांढा हरि नाउ ॥
सिमरि सिमरि सदा सुख पाउ ॥
भउ बिनसै पूरन होइ आस ॥
भगति भाइ आतम परगास ॥
तितु घरि जाइ बसै अबिनासी ॥
कहु नानक काटी जम फासी ॥3॥
हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! अपने) मन को प्रभू के नाम से जगाओ। (नाम की बरकति से) दसों दिशाओं में दौड़ता (ये मन) ठिकाने आ जाता है। उस मनुष्य को कोई मुश्किल नहीं आती। जिसके हृदय में वह प्रभू बसता है। कलियुग गर्म (आग) है (भाव। विकार जीवों को जला रहे हैं) प्रभू का नाम ठंडा है। उसे सदा सिमरो और सुख पाओ। (नाम सिमरने से) डर उड़ जाता है। और आस पूरी हो जाती है (भाव- ना ही मनुष्य आशाएं बाँधता फिरता है ना ही उन आशाओं के टूटने का कोई डर होता है) (क्योंकि) प्रभू की भक्ति से प्यार करके आत्मा चमक जाती है। (जो सिमरता है) उसके (हृदय) घर में अविनाशी प्रभू आ बसता है। हे नानक ! कह (कि नाम जपने से) जमों की फाही कट जाती है। 3।
ततु बीचारु कहै जनु साचा ॥
ततु बीचारु कहै जनु साचा ॥
जनमि मरै सो काचो काचा ॥
आवा गवनु मिटै प्रभ सेव ॥
आपु तिआगि सरनि गुरदेव ॥
इउ रतन जनम का होइ उधारु ॥
हरि हरि सिमरि प्रान आधारु ॥
अनिक उपाव न छूटनहारे ॥
सिंम्रिति सासत बेद बीचारे ॥
हरि की भगति करहु मनु लाइ ॥
मनि बंछत नानक फल पाइ ॥4॥
जनमि मरै सो काचो काचा ॥
आवा गवनु मिटै प्रभ सेव ॥
आपु तिआगि सरनि गुरदेव ॥
इउ रतन जनम का होइ उधारु ॥
हरि हरि सिमरि प्रान आधारु ॥
अनिक उपाव न छूटनहारे ॥
सिंम्रिति सासत बेद बीचारे ॥
हरि की भगति करहु मनु लाइ ॥
मनि बंछत नानक फल पाइ ॥4॥
हिन्दी अर्थ: जा मनुष्य पारब्रहम की सिफति-रूप सोच सोचता है वह सचमुच मनुष्य है। पर जो पैदा हो के (सिर्फ) मर जाता है (और बंदगी नहीं करता) वह बिल्कुल कच्चा है। प्रभू का सिमरन करने से जनम मरन के चक्र समाप्त हो जाते हैं। स्वैभाव त्याग के सतिगुरू की शरण पड़ इस तरह कीमती मानस जन्म सफल हो जाता है (इसलिए। हे भाई !) प्रभू को सिमर (यही) प्राणों का आसरा है। अनेको उपाय करनेसे (आवगवन से) बच नहीं सकते। स्मृतियां-शास्त्र-वेद (आदिक) विचारने से (और ऐसे ही) मन लगा के केवल प्रभू की ही भक्ति करो। (जो भगती करता है) हे नानक ! उसको मन-इच्छित फल मिल जाते हैं। 4।
संगि न चालसि तेरै धना ॥
संगि न चालसि तेरै धना ॥
तूं किआ लपटावहि मूरख मना ॥
सुत मीत कुटंब अरु बनिता ॥
इन ते कहहु तुम कवन सनाथा ॥
राज रंग माइआ बिसथार ॥
इन ते कहहु कवन छुटकार ॥
असु हसती रथ असवारी ॥
झूठा डंफु झूठु पासारी ॥
जिनि दीए तिसु बुझै न बिगाना ॥
नामु बिसारि नानक पछुताना ॥5॥
तूं किआ लपटावहि मूरख मना ॥
सुत मीत कुटंब अरु बनिता ॥
इन ते कहहु तुम कवन सनाथा ॥
राज रंग माइआ बिसथार ॥
इन ते कहहु कवन छुटकार ॥
असु हसती रथ असवारी ॥
झूठा डंफु झूठु पासारी ॥
जिनि दीए तिसु बुझै न बिगाना ॥
नामु बिसारि नानक पछुताना ॥5॥
हिन्दी अर्थ: हे मूर्ख मन ! धन आपके साथ नहीं जा सकता। आप क्यों इससे लिपटे बैठे हैं? पुत्र-मित्र-परिवार व स्त्री इनमें से। बता- कौन आपका साथ देने वाला है? माया के आडंबर, राज और रंग-रलीयां - बता इनमें से किस के साथ (मोह डालने से) सदा के लिए (माया से) मुक्ति मिल सकती है? घोड़े, हाथी, रथों की सवारी करनी -ये सब झूठा दिखावा है। ये आडंबर रचाने वाला भी बिनसनहार है (विनाशवान है)। मूर्ख मनुष्य उस प्रभू को नहीं पहिचानता जिसने ये सारे पदार्थ दिए हैं। और। नाम को भुला के, हे नानक ! (आखिर) पछताता है। 5।
गुर की मति तूं लेहि इआने ॥
गुर की मति तूं लेहि इआने ॥
भगति बिना बहु डूबे सिआने ॥
हरि की भगति करहु मन मीत ॥
निरमल होइ तुम॑ारो चीत ॥
चरन कमल राखहु मन माहि ॥
भगति बिना बहु डूबे सिआने ॥
हरि की भगति करहु मन मीत ॥
निरमल होइ तुम॑ारो चीत ॥
चरन कमल राखहु मन माहि ॥
हिन्दी अर्थ: हे अंजान ! सतिगुरू की मति ले (भाव - शिक्षा पर चल) बड़े समझदार-समझदार लोग भी भक्ती के बिना (विकारों में ही) डूब जाते हैं। हे मित्र मन ! प्रभू की भगती कर। इस तरह आपकी सुरति पवित्र होगी। (हे भाई !) प्रभू के कमल (जैसे सुंदर) चरण अपने मन में परो के रख।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २८८ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।