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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 289 · गउड़ी

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अंग
289
गउड़ी
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  1. जनम जनम के किलबिख जाहि ॥
  2. गुन गावत तेरी उतरसि मैलु ॥
  3. एको जपि एको सालाहि ॥
  4. फिरत फिरत प्रभ आइआ परिआ तउ सरनाइ ॥
  5. जाचक जनु जाचै प्रभ दानु ॥
  6. प्रभ की द्रिसटि महा सुखु होइ ॥
  7. सेवक की मनसा पूरी भई ॥
  8. सो किउ बिसरै जि घाल न भानै ॥

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

जनम जनम के किलबिख जाहि ॥

अंग 288 से चला आ रहा अंश

जनम जनम के किलबिख जाहि ॥
आपि जपहु अवरा नामु जपावहु ॥
सुनत कहत रहत गति पावहु ॥
सार भूत सति हरि को नाउ ॥
सहजि सुभाइ नानक गुन गाउ ॥6॥

हिन्दी अर्थ: इस तरह कई जन्मों के पाप नाश हो जाएंगे। (प्रभू का नाम) आप खुद जपें। और औरों को जपने के लिए प्रेरित करें। (नाम) सुनते हुए, उच्चारते हुए और निर्मल रहन-सहन रखते हुए उच्च अवस्था बन जाएगी। प्रभू का नाम ही सब पदार्थों से उक्तम पदार्थ है; (इसलिए) हे नानक! आत्मिक अडोलता में टिक के प्रेम से प्रभू के गुण गाएँ। 6।

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

गुन गावत तेरी उतरसि मैलु ॥

गुन गावत तेरी उतरसि मैलु ॥
बिनसि जाइ हउमै बिखु फैलु ॥
होहि अचिंतु बसै सुख नालि ॥
सासि ग्रासि हरि नामु समालि ॥
छाडि सिआनप सगली मना ॥
साधसंगि पावहि सचु धना ॥
हरि पूंजी संचि करहु बिउहारु ॥
ईहा सुखु दरगह जैकारु ॥
सरब निरंतरि एको देखु ॥
कहु नानक जा कै मसतकि लेखु ॥7॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई!) प्रभू के गुण गाते हुए आपकी (विकारों की) मैल उतर जाएगी। और अहंम् रूपी विष का पसारा भी मिट जाएगा। बेफिक्र हो जाएँगे और सुखी जीवन व्यतीत होगा (आप) हर दम प्रभू के नाम को याद करें। हे मन! सारी चतुराई छोड़ दें। सदा साथ निभने वाला धन सतिसंग में मिलेगा। प्रभू के नाम की राशि संचित करें, यही व्यवहार करें। इस जीवन में सुख मिलेगा और प्रभू की दरगाह में आदर होगा। सब जीवों के अंदर एक अकाल-पुरख को ही देखें। (पर) हे नानक! कहें, (यह काम वही मनुष्य करता है) जिसके माथे पर भाग्य हैं। 7।

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

एको जपि एको सालाहि ॥

एको जपि एको सालाहि ॥
एकु सिमरि एको मन आहि ॥
एकस के गुन गाउ अनंत ॥
मनि तनि जापि एक भगवंत ॥
एको एकु एकु हरि आपि ॥
पूरन पूरि रहिओ प्रभु बिआपि ॥
अनिक बिसथार एक ते भए ॥
एकु अराधि पराछत गए ॥
मन तन अंतरि एकु प्रभु राता ॥
गुर प्रसादि नानक इकु जाता ॥8॥19॥

हिन्दी अर्थ: एक प्रभू को ही जपें और एक प्रभू की ही सिफत करें। एक को सिमरें और हे मन! एक प्रभू के मिलने की तमन्ना रखें। एक प्रभू के ही गुण गाएँ। मन में और शारीरिक इंद्रियों से एक भगवान को ही जपें। (सब जगह) प्रभू खुद ही खुद है। सब जीवों में प्रभू ही बस रहा है। (जगत के) अनेकों पसारे एक प्रभू से ही पसरे हुए हैं। एक प्रभू को सिमरने से पाप नाश हो जाते हैं। जिस मनुष्य के मन और शरीर में एक प्रभू ही परोया गया है। हे नानक! उस ने गुरू की कृपा से उस एक प्रभू को पहचान लिया है। 8। 19।

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

फिरत फिरत प्रभ आइआ परिआ तउ सरनाइ ॥

सलोकु ॥
फिरत फिरत प्रभ आइआ परिआ तउ सरनाइ ॥
नानक की प्रभ बेनती अपनी भगती लाइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे प्रभू! भटकता भटकता मैं आपकी शरण आ पड़ा हूँ। हे प्रभू! नानक की ये विनती है कि मुझे अपनी भक्ति में जोड़ें। 1।

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

जाचक जनु जाचै प्रभ दानु ॥

असटपदी ॥
जाचक जनु जाचै प्रभ दानु ॥
करि किरपा देवहु हरि नामु ॥
साध जना की मागउ धूरि ॥
पारब्रहम मेरी सरधा पूरि ॥
सदा सदा प्रभ के गुन गावउ ॥
सासि सासि प्रभ तुमहि धिआवउ ॥
चरन कमल सिउ लागै प्रीति ॥
भगति करउ प्रभ की नित नीति ॥
एक ओट एको आधारु ॥
नानकु मागै नामु प्रभ सारु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी ॥ हे प्रभू! (यह) मंगता (याचक) दास (आपके नाम का) दान मांगता है; हे हरी! कृपा करके (अपना) नाम दें। मैं साधु जनों के पैरों की खाक मांगता हूँ। हे पारब्रहम! मेरी इच्छा पूरी करें। मैं सदा ही प्रभू के गुण गाऊँ। हे प्रभू! मैं हर दम आपको ही सिमरूँ। प्रभू के कमल (जैसे सुंदर) चरनों से मेरी प्रीति लगी रहे और सदा ही प्रभू की भक्ति करता रहूँ। (प्रभू का नाम ही) एक ही मेरी ओट है और एक ही आसरा है। नानक प्रभू का श्रेष्ठ नाम मांगता है। 1।

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

प्रभ की द्रिसटि महा सुखु होइ ॥

प्रभ की द्रिसटि महा सुखु होइ ॥
हरि रसु पावै बिरला कोइ ॥
जिन चाखिआ से जन त्रिपताने ॥
पूरन पुरख नही डोलाने ॥
सुभर भरे प्रेम रस रंगि ॥
उपजै चाउ साध कै संगि ॥
परे सरनि आन सभ तिआगि ॥
अंतरि प्रगास अनदिनु लिव लागि ॥
बडभागी जपिआ प्रभु सोइ ॥
नानक नामि रते सुखु होइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: प्रभू की (मेहर की) नजर से बड़ा सुख होता है। (पर) कोई विरला मनुष्य ही प्रभू के नाम का स्वाद चखता है जिन्होंने (नाम रस) चखा है वह मनुष्य (माया की ओर से) संतुष्ट हो गए हैं। वह पूर्ण मनुष्य बन गए हैं कभी (माया के फायदे नुकसान में) डोलते नहीं। प्रभू के प्यार के स्वाद की मौज में वह सराबोर (नाको-नाक भरे) रहते हैं। साध जनों की संगति में रह के (उनके अंदर) (प्रभू मिलाप का) चाव पैदा होता है। और सारे (आसरे) छोड़ के वह प्रभू की शरण पड़ते हैं। उनके अंदर प्रकाश हो जाता है और हर समय उनकी लिव (प्रभू चरनों में) लगी रहती है। बहुत भाग्यशालियों ने प्रभू को सिमरा है। हे नानक! प्रभू के नाम में रंगे रहने से सुख होता है। 2।

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

सेवक की मनसा पूरी भई ॥

सेवक की मनसा पूरी भई ॥
सतिगुर ते निरमल मति लई ॥
जन कउ प्रभु होइओ दइआलु ॥
सेवकु कीनो सदा निहालु ॥
बंधन काटि मुकति जनु भइआ ॥
जनम मरन दूखु भ्रमु गइआ ॥
इछ पुनी सरधा सभ पूरी ॥
रवि रहिआ सद संगि हजूरी ॥
जिस का सा तिनि लीआ मिलाइ ॥
नानक भगती नामि समाइ ॥3॥

हिन्दी अर्थ: तब सेवक के मन के फुरने पूरे हो जाते हैं। (माया की ओर से दौड़ समाप्त हो जाती है)। (जब सेवक) अपने गुरू से उक्तम शिक्षा लेता है प्रभू अपने (ऐसे) सेवक पर मेहर करता है। और सेवक को सदा प्रसन्न रखता है। सेवक (माया वाली) जंजीर तोड़ के मुक्त हो जाता है। उसका जनम मरण (का चक्र) का दुख और सहसा खत्म हो जाता है। सेवक की इच्छा और श्रद्धा सफल हो जाती है। उसे प्रभू सब जगह व्यापक अपने अंग संग दिखता है। जिस मालिक का वह सेवक बनता है। वह अपने साथ मिला लेता है। हे नानक! सेवक भगती करके नाम में टिका रहता है। 3।

गुरु अर्जन देव जी · सुखमनी · राग गउड़ी

सो किउ बिसरै जि घाल न भानै ॥

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सो किउ बिसरै जि घाल न भानै ॥
सो किउ बिसरै जि कीआ जानै ॥

हिन्दी अर्थ: (मनुष्य को) वह प्रभू क्यूँ बिसर जाए जो (मनुष्य की करी हुई) मेहनत को व्यर्थ नहीं जाने देता। जो की हुई कमाई को याद रखता है?

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 289 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।