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अंग 287

अंग
287
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
अपनी क्रिपा जिसु आपि करेइ ॥
नानक सो सेवकु गुर की मति लेइ ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जिस पर (प्रभू अपनी मेहर करता है)। हे नानक ! वह सेवक सतिगुरू की शिक्षा लेता है 2।
बीस बिसवे गुर का मनु मानै ॥
सो सेवकु परमेसुर की गति जानै ॥
सो सतिगुरु जिसु रिदै हरि नाउ ॥
अनिक बार गुर कउ बलि जाउ ॥
सरब निधान जीअ का दाता ॥
आठ पहर पारब्रहम रंगि राता ॥
ब्रहम महि जनु जन महि पारब्रहमु ॥
एकहि आपि नही कछु भरमु ॥
सहस सिआनप लइआ न जाईऐ ॥
नानक ऐसा गुरु बडभागी पाईऐ ॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जो सेवक अपने सतिगुरू को अपनी श्रद्धा का पूरी तरह से यकीन दिलवा लेता है। वह अकाल-पुरख की अवस्था को समझ लेता है। सतिगुरू (भी) वह है जिसके हृदय में प्रभू का नाम बसता है। (मैं ऐसे) गुरू से कई बार सदके जाता हूँ। (सतिगुरू) सारे खजानों का और आत्मिक जिंदगी का देने वाला है। (क्योंकि) वह आठों पहर अकाल-पुरख के प्यार में रंगा रहता है। (प्रभू का) सेवक (-सतिगुरू) प्रभू में (जुड़ा रहता है) और (प्रभू के) सेवक-सतिगुरू में प्रभू (सदा टिका हुआ है)। गुरू और प्रभू एक रूप हैं। इसमें भुलेखे वाली बात नहीं। हे नानक ! हजारों चतुराईयों से ऐसा गुरू नहीं मिलता। बहुत भाग्यों से मिलता है। 3।
सफल दरसनु पेखत पुनीत ॥
परसत चरन गति निरमल रीति ॥
भेटत संगि राम गुन रवे ॥
पारब्रहम की दरगह गवे ॥
सुनि करि बचन करन आघाने ॥
मनि संतोखु आतम पतीआने ॥
पूरा गुरु अख्यओ जा का मंत्र ॥
अंम्रित द्रिसटि पेखै होइ संत ॥
गुण बिअंत कीमति नही पाइ ॥
नानक जिसु भावै तिसु लए मिलाइ ॥4॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गुरू का दीदार (सारे) फल देने वाला है। दीदार करने से पवित्र हो जाते हैं। गुरू के चरण छूने से उच्च अवस्था और स्वच्छ रहन-सहन हो जाता है। गुरू की संगति में रहने से प्रभू के गुण गा सकते हैं। और अकाल-पुरख की दरगाह में पहुँच हो जाती है। गुरू के बचन सुन के कान तृप्त हो जाते हैं। मन में संतोष आ जाता है और आत्मा पतीज जाती है। सतिगुरू पूरन पुरखु है। उसका उपदेश भी सदा के लिए अटॅल है। (जिस की ओर) अमर करने वाली नजर से देखता है वही संत हो जाता है। सतिगुरू के गुण बेअंत हैं। मूल्य नहीं पड़ सकता। हे नानक ! जो जीव (प्रभू को) अच्छा लगता है। उसे गुरू के साथ मिलाता है। 4।
जिहबा एक उसतति अनेक ॥
सति पुरख पूरन बिबेक ॥ काहू बोल न पहुचत प्रानी ॥
अगम अगोचर प्रभ निरबानी ॥
निराहार निरवैर सुखदाई ॥
ता की कीमति किनै न पाई ॥
अनिक भगत बंदन नित करहि ॥
चरन कमल हिरदै सिमरहि ॥
सद बलिहारी सतिगुर अपने ॥
नानक जिसु प्रसादि ऐसा प्रभु जपने ॥5॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (मनुष्य की) जीभ एक है पर पूरन पुरख सदा स्थिर व्यापक प्रभू के अनेकों गुण हैं। मनुष्य किसी बोल के द्वारा (प्रभू के गुणों तक) नहीं पहुँच सकता। प्रभू पहुँच से परे है। वासना-रहित है। और मनुष्य की शारीरिक इंद्रियों की उस तक पहुँच नहीं। अकाल-पुरख को किसी खुराक की जरूरत नहीं। प्रभू वैर-रहित है (बल्कि। सबको) सुख देने वाला है। कोई जीव उस (के गुणों) का मूल्य नहीं पा सका। अनेकों भक्त सदा (प्रभू को) नमस्कार करते हैं। और उसके कमल समान (सुंदर) चरणों को अपने हृदय में सिमरते हैं। हे नानक ! (कह) जिस गुरू की मेहर से ऐसे प्रभू को जप सकते हैं। मैं अपने उस गुरू से सदा सदके जाता हूँ। 5।
इहु हरि रसु पावै जनु कोइ ॥
अंम्रितु पीवै अमरु सो होइ ॥
उसु पुरख का नाही कदे बिनास ॥ जा कै मनि प्रगटे गुनतास ॥
आठ पहर हरि का नामु लेइ ॥
सचु उपदेसु सेवक कउ देइ ॥
मोह माइआ कै संगि न लेपु ॥
मन महि राखै हरि हरि एकु ॥
अंधकार दीपक परगासे ॥
नानक भरम मोह दुख तह ते नासे ॥6॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: कोई विरला मनुष्य ही प्रभू के नाम का स्वाद लेता है (और जो लेता है) वह नाम-अमृत पीता है और अमर हो जाता है। जिसके मन में गुणों के खजाने प्रभू का प्रकाश होता है। उसका कभी नाश नहीं होता (भाव। वह बार बार मौत का शिकार नहीं होता)। (सतिगुरू) आठों पहर प्रभू का नाम सिमरता है। और अपने सेवक को भी यही सच्चा उपदेश देता है। माया के मोह से उसका कभी लगाव नहीं होता। वह सदा अपने मन में एक प्रभू को टिकाता है। हे नानक ! (जिसके अंदर से) (नाम-रूपी) दीए से (अज्ञानता का) अंधेरा (हट के) प्रकाश हो जाता है। उसके भुलेखे और मोह के (कारण पैदा हुए) दुख दूर हो जाते हैं। 6।
तपति माहि ठाढि वरताई ॥
अनदु भइआ दुख नाठे भाई ॥
जनम मरन के मिटे अंदेसे ॥
साधू के पूरन उपदेसे ॥
भउ चूका निरभउ होइ बसे ॥
सगल बिआधि मन ते खै नसे ॥
जिस का सा तिनि किरपा धारी ॥
साधसंगि जपि नामु मुरारी ॥
थिति पाई चूके भ्रम गवन ॥
सुनि नानक हरि हरि जसु स्रवन ॥7॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: तपश में (बसते हुए भी। प्रभू ने हमारे अंदर) ठंड वरता दी है, सुख ही सुख हो गया है, दुख भाग गए हैं और जनम मरन के (चक्कर में पड़ने के) डर फिक्र मिट गए हैं, हे भाई ! (यह सब) गुरू के पूरे उपदेश से हुआ । (सारा) डर खत्म हो गया है अब निडर बसते हैं रोग नाश हो के मन से बिसर गए हैं,और जिस गुरू के बने थे, उसने (हमारे पर) कृपा की है, (यह सब) सत्संग में प्रभू का नाम जप के हुआ (हमारे) भुलेखे और भटकनें समाप्त हो गई हैं। हे नानक ! प्रभू का यश कानों से सुन के (हमने) शांति हासिल कर ली है 7।
निरगुनु आपि सरगुनु भी ओही ॥
कला धारि जिनि सगली मोही ॥
अपने चरित प्रभि आपि बनाए ॥
अपुनी कीमति आपे पाए ॥
हरि बिनु दूजा नाही कोइ ॥
सरब निरंतरि एको सोइ ॥
ओति पोति रविआ रूप रंग ॥
भए प्रगास साध कै संग ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: वह स्वयं माया के तीनों गुणों से अलग है। त्रिगुणी संसार का रूप भी स्वयं ही है। जिस प्रभू ने अपनी ताकत कायम करके सारे जगत को मोह लिया है। प्रभू ने अपने खेल तमाशे स्वयं ही बनाए हैं। अपनी बुजुर्गी का मूल्य भी खुद ही डालता है। प्रभू के बिना (उस जैसा) और कोई नहीं। सब के अंदर प्रभू स्वयं ही (मौजूद) है। ओत-प्रोत सारे रूपों और रंगों में व्यापक है; ये प्रकाश (भाव। समझ) सतिगुरू की संगति में प्रकाशित होता है।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस पर (प्रभू अपनी मेहर करता है)।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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