लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 255 · गउड़ी

इस पृष्ठ पर
अंग
255
गउड़ी
अंग बदलें या अंश चुनें · 10 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. अपनी क्रिपा करहु भगवंता ॥
  2. जोर जुलम फूलहि घनो काची देह बिकार ॥
  3. जजा जानै हउ कछु हूआ ॥
  4. झालाघे उठि नामु जपि निसि बासुर आराधि ॥
  5. झझा झूरनु मिटै तुमारो ॥
  6. ञतन करहु तुम अनिक बिधि रहनु न पावहु मीत ॥
  7. पवड़ी ॥
  8. टूटे बंधन जनम मरन साध सेव सुखु पाइ ॥
  9. टहल करहु तउ एक की जा ते ब्रिथा न कोइ ॥
  10. ठाक न होती तिनहु दरि जिह होवहु सुप्रसंन ॥

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

अपनी क्रिपा करहु भगवंता ॥

अंग 254 से चला आ रहा अंश

अपनी क्रिपा करहु भगवंता ॥
छाडि सिआनप बहु चतुराई ॥
संतन की मन टेक टिकाई ॥
छारु की पुतरी परम गति पाई ॥
नानक जा कउ संत सहाई ॥23॥

हिन्दी अर्थ: हे भगवान! अपनी मेहर करें। हे मन! सारी चतुराई समझदारी छोड़ के संत जनों का आसरा पकड़ें। उसका भी ये शरीर चाहे मिट्टी का पुतला है। पर इसी में वह ऊँची से ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है। हे नानक! संत जन जिस मनुष्य की सहायता करते हैं। 23।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

जोर जुलम फूलहि घनो काची देह बिकार ॥

सलोकु ॥
जोर जुलम फूलहि घनो काची देह बिकार ॥
अहंबुधि बंधन परे नानक नाम छुटार ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ जो लोग दूसरों पर धक्का जुल्म करके बहुत मान करते हैं। (शरीर तो उनका भी नाशवंत है) उनका नाशवान शरीर व्यर्थ चला जाता है। वे ‘मैं बड़ा’ ‘मैं बड़ा’ करने वाली मति के बंधनों में जकड़े जाते हैं। हे नानक! इन बंधनों से प्रभू का नाम ही छुड़ा सकता है। 1।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

जजा जानै हउ कछु हूआ ॥

पउड़ी ॥
जजा जानै हउ कछु हूआ ॥
बाधिओ जिउ नलिनी भ्रमि सूआ ॥
जउ जानै हउ भगतु गिआनी ॥
आगै ठाकुरि तिलु नही मानी ॥
जउ जानै मै कथनी करता ॥
बिआपारी बसुधा जिउ फिरता ॥
साधसंगि जिह हउमै मारी ॥
नानक ता कउ मिले मुरारी ॥24॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जो मनुष्य ये समझने लग जाता है कि मैं बड़ा बन गया हूँ। वह इस अहंकार में ऐसे बंध जाता है जैसे तोता (चोगे के) भुलेखे में नलिनी से पकड़ा जाता है। जब मनुष्य ये समझता है कि मैं भगत हो गया हूँ। मैं ज्ञानवान बन गया हूँ। तो आगे से प्रभू ने उसके इस अहंकार का मूल्य रक्ती भर भी नहीं डालना होता। जब मनुष्य ये समझ लेता है कि मैं बढ़िया धार्मिक व्याख्यान कर लेता हूँ तो फिर वह एक फेरी वाले व्यापारी की तरह ही धरती पर चलता फिरता है (जैसे फेरी वाला सौदा औरों को ही बेचता है, वैसे ही ये खुद भी कोई आत्मिक लाभ नहीं कमाता)। हे नानक! जिस मनुष्य ने साध-संगति में जा के अपने अहंकार का नाश किया है। उसे परमात्मा मिलता है। 24।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

झालाघे उठि नामु जपि निसि बासुर आराधि ॥

सलोकु ॥
झालाघे उठि नामु जपि निसि बासुर आराधि ॥
कार्हा तुझै न बिआपई नानक मिटै उपाधि ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक! (कहें, हे भाई!) अमृत बेला में उठ के प्रभू का नाम जपें (इतना ही नहीं) दिन रात हर वक्त याद करें। कोई चिंता-फिक्र आपके पर जोर नहीं डाल सकेगा। आपके अंदर से वैर-विरोध झगड़े वाला स्वभाव ही मिट जाएगा। 1।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

झझा झूरनु मिटै तुमारो ॥

पउड़ी ॥
झझा झूरनु मिटै तुमारो ॥
राम नाम सिउ करि बिउहारो ॥
झूरत झूरत साकत मूआ ॥
जा कै रिदै होत भाउ बीआ ॥
झरहि कसंमल पाप तेरे मनूआ ॥
अंम्रित कथा संतसंगि सुनूआ ॥
झरहि काम क्रोध द्रुसटाई ॥
नानक जा कउ क्रिपा गुसाई ॥25॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ आपका (हर किस्म का) चिंता-फिक्र मिट जाएगा। (हे वणजारे जीव!) परमात्मा के नाम का व्यापार करें। प्रभू से विछुड़ा हुआ आदमी चिंता-फिक्र में ही आत्मिक मौत मरता रहता है। क्योंकि उसके हृदय में (परमात्मा को बिसार के) माया का प्यार बना होता है। हे भाई! आपके मन में से सारे पाप विकार झड़ जाएंगे। सत्संग में जा के परमात्मा की आत्मिक जीवन देने वाली सिफत सालाह सुनने से। उसके काम-क्रोध आदि सारे वैरीयों का नाश हो जाता है। हे नानक! जिस मनुष्य पर सृष्टि का मालिक प्रभू मेहर करता है (और उसके अंदर नाम बसता है।) 25।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

ञतन करहु तुम अनिक बिधि रहनु न पावहु मीत ॥

सलोकु ॥
ञतन करहु तुम अनिक बिधि रहनु न पावहु मीत ॥
जीवत रहहु हरि हरि भजहु नानक नाम परीति ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे मित्र! (बेशक) अनेकों तरह के यत्न आप करके देखें। (यहां सदा के लिए) टिके नहीं रह सकते। हे नानक! (कहें) यदि प्रभू के नाम से प्यार डालेंगे। अगर सदैव हरी नाम सिमरेंगे, तो आत्मिक जीवन मिलेगा। 1।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

पवड़ी ॥

पवड़ी ॥
ञंञा ञाणहु द्रिड़ु सही बिनसि जात एह हेत ॥
गणती गणउ न गणि सकउ ऊठि सिधारे केत ॥
ञो पेखउ सो बिनसतउ का सिउ करीऐ संगु ॥
ञाणहु इआ बिधि सही चित झूठउ माइआ रंगु ॥
ञाणत सोई संतु सुइ भ्रम ते कीचित भिंन ॥
अंध कूप ते तिह कढहु जिह होवहु सुप्रसंन ॥
ञा कै हाथि समरथ ते कारन करनै जोग ॥
नानक तिह उसतति करउ ञाहू कीओ संजोग ॥26॥

हिन्दी अर्थ: पवड़ी ॥ (हे भाई!) बात अच्छी तरह समझ लें कि ये दुनिया वाले मोह नाश हो जाएंगे। कितने (जीव जगत से) चले गए हैं। ये गिनती ना मैं करता हूं। ना कर सकता हूँ। जो कुछ मैं (आँखों से) देख रहा हूँ। वह नाशवंत है। (फिर) पक्की प्रीति किस के साथ डाली जाए? हे मेरे चित्त! ये दरुस्त जान कि माया के साथ प्यार झूठा है। ऐसे मनुष्य माया वाली भटकना से बच जाते हैं। ऐसा आदमी ही संत है। वह ही सही जीवन को समझता है। (हे प्रभू!) जिस मनुष्य पर आप मेहरवान होते हैं। उसे मोह के अंध-कूप में से आप निकाल लेते हैं। जिसके हाथ में ही ये करने की स्मर्था है। और जो सारे सबब बनाने के काबिल भी है (यही एक तरीका है। ‘माया रंग’ से बचे रहने का)। हे नानक! (कहें) मैं उस प्रभू की सिफत सालाह करता हूँ। जो (मेहर करके सिफत सालाह करने का ये) सबब मेरे वास्ते बनाता है। 26।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

टूटे बंधन जनम मरन साध सेव सुखु पाइ ॥

सलोकु ॥
टूटे बंधन जनम मरन साध सेव सुखु पाइ ॥
नानक मनहु न बीसरै गुण निधि गोबिद राइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ उसके वह मोह के बंधन टूट जाते हैं जो जनम मरन के चक्कर में डालते हैं। वह मनुष्य गुरू की सेवा करके आत्मिक आनंद प्राप्त करता है। हे नानक! गुणों का खजाना गोबिंद जिस मनुष्य के मन से भूलता नहीं। 1।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

टहल करहु तउ एक की जा ते ब्रिथा न कोइ ॥

पउड़ी ॥
टहल करहु तउ एक की जा ते ब्रिथा न कोइ ॥
मनि तनि मुखि हीऐ बसै जो चाहहु सो होइ ॥
टहल महल ता कउ मिलै जा कउ साध क्रिपाल ॥
साधू संगति तउ बसै जउ आपन होहि दइआल ॥
टोहे टाहे बहु भवन बिनु नावै सुखु नाहि ॥
टलहि जाम के दूत तिह जु साधू संगि समाहि ॥
बारि बारि जाउ संत सदके ॥
नानक पाप बिनासे कदि के ॥27॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (हे भाई!) सिर्फ एक परमात्मा की सेवा भक्ति करें जिसके दर से कोई (जाचक) खाली नहीं जाता। अगर आपके मन में तन में। मुंह में, हृदय में प्रभू बस जाए। तो मुंह मांगा पदार्थ मिलेगा। पर इस सेवा-भक्ति का मौका उसी को मिलता है। जिस पर गुरू दयाल हो। और गुरू की संगति में मनुष्य तब टिकता है। अगर प्रभू स्वयं कृपा करे। हमने सभी जगहें तलाश के देख ली हैं। प्रभू के भजन के बिना आत्मिक सुख कहीं भी नहीं। जो लोग गुरू की हजूरी में स्वयं को लीन कर लेते हैं। उनसे तो यमदूत भी एक किनारे हो जाते हैं (उन्हें तो मौत का डर भी छू नहीं सकता)। हे नानक! (कहें) मैं बारंबार गुरू से कुर्बान जाता हूँ। जो मनुष्य गुरू के दर पर आ गिरता है। उसके कई जन्मों के किए बुरे कर्म के संस्कार नाश हो जाते हैं। 27।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

ठाक न होती तिनहु दरि जिह होवहु सुप्रसंन ॥

सलोकु ॥
ठाक न होती तिनहु दरि जिह होवहु सुप्रसंन ॥
जो जन प्रभि अपुने करे नानक ते धनि धंनि ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ (हे प्रभू!) जिन पर आप मेहर करते हैं। उनके राह में आपके दर पर पहुँचने पर कोई रोक नहीं पैदा होती (कोई विकार उन्हें प्रभू चरणों में जुड़ने से रोक नहीं सकता)। हे नानक! (कहें) वे लोग बड़े भाग्यशाली हैं। जिन्हें प्रभू ने अपने बना लिया है। 1।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 255 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।